रात बहुत शांत थी…इतनी शांत कि सांसों की आवाज़ भी शोर लग रही थी।हवेली की तीसरी मंज़िल पर एक कमरा था—जहाँ दीवारों का रंग नीला नहीं, बल्कि डर था।आईने के सामने खड़ी लड़की की आँखें…नीली नहीं थीं…वे ऐसी थीं जैसे किसी की आत्मा को चीर कर देख सकती हों।उसके होंठों पर खून लगा था।ताज़ा।गरम।उसने अपनी उँगलियों से होंठ छुए…और आँखें बंद कर लीं।“आज फिर प्यास पूरी नहीं हुई…”1अनाया मल्होत्रा—लोग उसे एक आम लड़की समझते थे।शांत, पढ़ी-लिखी, सभ्य।लेकिन किसी को नहीं पता था…कि अनाया की नसों में खून की पुकार बहती थी।बचपन से।जब वह सात साल की थी,उस रात उसने अपनी