समीक्षा: संवेदना की सुगंध और यथार्थ का अन्वेषण‘इत्र में भीगी हथेलियाँ’विनीता राहुरीकरचर्चा.. विवेक रंजन श्रीवास्तव कहानी-संग्रह ‘इत्र में भीगी हथेलियाँ’ समकालीन हिंदी कथा-साहित्य में अपनी विशिष्ट 'तथ्य-केंद्रित' दृष्टि और मानवीय ऊष्मा के कारण एक अनिवार्य हस्तक्षेप है। जहाँ एक ओर स्थापित कहानीकार जैसे प्रेमचंद सामाजिक यथार्थ के चितेरे थे और जैनेंद्र मनोवैज्ञानिक परतों के पारखी, वहीं विनीता जी इन दोनों धाराओं को आधुनिक जीवन की जटिलताओं के साथ जोड़ती अनुभव जन्य कहानी रचती हैं। उनकी कहानियाँ केवल कल्पना का विस्तार नहीं, बल्कि सूक्ष्म पर्यवेक्षण और जीवन के ठोस तथ्यों पर आधारित जीवंत दस्तावेज हैं। रिश्तों में संवेदना और उत्तरदायित्व उनके कथानकों की विशेषता