परछाईयो के उस पार

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भाग 1बारिश उस रात कुछ ज़्यादा ही बेरहम थी।रेलवे स्टेशन की पुरानी छत से टपकती बूंदें ज़मीन पर गिरकर छोटे-छोटे गड्ढे बना रही थीं, जैसे कोई बीता हुआ सच ज़मीन पर निशान छोड़ रहा हो। प्लेटफॉर्म नंबर तीन लगभग खाली था। दूर कहीं से ट्रेन के हॉर्न की आवाज़ गूँजी और फिर सन्नाटा लौट आया।ज़ारा खान अपने गीले दुपट्टे को कसकर पकड़ते हुए स्टेशन के बाहर खड़ी थी। हवा ठंडी थी, लेकिन उसकी हथेलियाँ पसीने से भीगी हुई थीं। दिल बार-बार सीने से बाहर निकलने को मचल रहा था।उसकी नज़र मोबाइल की स्क्रीन पर टिकी थी।Unknown Number:“अगर तुम्हें अपनी