इंसानियत

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जून का महीना था, बेतहाशा गर्मी, चिलचिलाती धूप, सूर्य देव का प्रकोप अपने चरम पर था, जैसे सबकुछ जला देने को आतुर हों |मैं बच्चों को स्कूल से घर छोड़कर, पास की दुकान पर कुछ सामान लेने चली गई |सामान लेकर दुकान से निकल ही रही थी कि मेरी नज़र सड़क के बीचोबीच खड़े एक मासूम बच्चे पर पड़ी, तपती सड़क पर नंगे पाँव खड़ा, कभी एक पाँव ऊपर कर रहा था कभी दूसरा पाँव |गर्म तवे सी जल रही सड़क उसके नन्हें पाँवों को जला रही थी |वैसे तो दोपहर में वो सड़क उतनी व्यस्त नहीं रहती थी, पर