यह कहानी “मैं दादा-दादी की लाड़ली” का चौथा भाग है।बचपन की मासूमियत और अधूरे प्यार के बाद,अब ज़िंदगी मुझे एक ऐसे मोड़ पर ले आईजहाँ फैसले मेरे नहीं थे।रिश्ते तय किए जा रहे थे,और मुझसे सिर्फ़ चुप रहना उम्मीद किया जा रहा था।अध्याय 4 – रिश्तों का फैसला।स्कूल और कॉलेज के दिन अब पीछे छूट चुके थे।वह समय, जब ज़िंदगी हल्की लगती थी,जब सपने बिना डर के देखे जाते थे।अब ज़िंदगी धीरे-धीरे गंभीर होने लगी थी।हँसी के साथ ज़िम्मेदारियाँ जुड़ने लगी थींऔर भविष्य का नाम सुनते ही मन में सवाल उठने लगे थे।सपने अब केवल प्यार तक सीमित नहीं थे,उनमें