घर अब पहले जैसा शांत नहीं रहा था।अब हर दीवार पर ताने गूँजते थे।हर सांस पर टोका-टोकी थी।और हर कदम पर सवाल।दादी सास घर की दहलीज़ पर बैठी रहतीं और बस नज़र रखतीं—जैसे चित्रा कोई बहू नहीं, बल्कि कै़दी हो।“अरे बहू!”कड़क आवाज गूँजती।“बच्चे को ऐसे अकेला छोड़ते हैं कहीं? समझ नहीं है तुम्हें?”चित्रा पलटकर बोल सकती थी…पर उसने सिर झुका दिया।आँचल थोड़ा कसकर पकड़ा।और चुपचाप फिर वही काम करने लगी।थोड़ी देर बाद फिर आवाज़—“रसोई ऐसे संभालते हैं?”“माचिस यहाँ क्यों रखी?”“चाकू ऐसे छोड़ दिया?”“अरे तमीज़ नाम की चीज़ है कि नहीं तुममें!?”हर रोज़…हर वक्त…हर साँस…चित्रा सब सुनती…सब सहती…पर कुछ कहती नहीं।उसे