गुमशुदा नोट

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शीर्षक: गुमशुदा नोटलेखक: विजय शर्मा एर्रीशाम का समय था। शहर की सबसे पुरानी गली—गणेश चौक—हल्की-हल्की रोशनी में डूबी हुई थी। चाय की दुकानों से उठती भाप, रिक्शों की खनक, और दुकानदारों की आवाज़ें मिलकर एक परिचित-सी धुन रच रही थीं। इसी गली में, पुराने बरगद के नीचे, रमेश रोज़ की तरह अपनी छोटी-सी किताबों की दुकान समेट रहा था।रमेश की उम्र पैंतालीस के आसपास थी। चेहरा सादा, आँखों में थकान और भीतर कहीं एक अनकही बेचैनी। उसकी दुकान बड़ी नहीं थी—कुछ पुरानी किताबें, दो-चार मैगज़ीन, और अख़बार। पर उसी से उसका घर चलता था। घर में पत्नी सीमा और बारह