कचरे का सोना

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शहर की उस विशाल कचरा पट्टी के मुहाने पर सड़ांध का साम्राज्य था। हवा में एक ऐसी भारी गंध घुली रहती थी, जो नए आदमी का गला घोंट दे, लेकिन वहाँ रहने वालों के लिए वह हवा ही उनकी सांसों का आधार थी। सूरज की पहली किरण जब कचरे के पहाड़ों पर गिरती, तो कांच के टुकड़े और प्लास्टिक की थैलियां किसी बेशकीमती खजाने की तरह चमकने लगती थीं।"ओए कालू! हाथ तेज़ चला, वरना आज फिर भूखा सोएगा," एक कर्कश आवाज गूँजी।यह झबरू था, जिसकी उम्र तो चालीस के पार थी, लेकिन चेहरे पर झुर्रियों और कालिख ने उसे साठ