यशस्विनी - 41

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छठी इंद्री        रोहित जैसे नींद से जाग उठे हों,आश्चर्य से सभी को देखने लगे। स्वामी मुक्तानंद वापस अपने आसन पर पहुंचे। उन्होंने धीर गंभीर वाणी में कहना शुरू किया,"नेहा बेटी! भविष्य में भले ही नितांत आवश्यकता हो जाए लेकिन वर्तमान में मुझे अलग से फोर्थ जेंडर के रूप में धरती पर एक नई प्रजाति का विकास करना उचित प्रतीत नहीं हो रहा है।इससे अनेक सामाजिक, मनोवैज्ञानिक और भावनात्मक खतरे उत्पन्न हो जाएंगे।नर और नारी का सदियों से चला आ रहा शाश्वत और पवित्र रिश्ता,आपसी समझ और दोनों द्वारा मिलकर दायित्वों का पालन अपने आप में श्रेष्ठ है।जब