सांबा : खामोशी का सबसे ऊँचा पहरा— एक ललित लेख

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पहाड़ की उस सूखी, धूप में तपती चट्टान पर एक आदमी बैठा था—चुप, स्थिर, जैसे अपनी ही साँसों की आवाज़ को भी रोक रखा हो।नीचे दूर कहीं गाँव की धूसर परछाइयाँ तैर रही थीं, और ऊपर आकाश एक अजीब-सी सुनसान नीलाई में फैलता जाता था।उस खामोशी में अक्सर एक नाम गूँजता था—“अरे ओ सांबा…!”सांबा—शोले की दुनिया का वह किरदारजो बोलता नहीं था,पर समझ सब लेता था।जो अपनी चुप्पी से इतना गहरा था कि कई बार वह फिल्म के केंद्र से ज़्यादा प्रभावशाली लगता थाएक ऐसा आदमी जो आवाज़ नहीं, नज़र थाहर गिरोह में दो तरह के लोग होते हैं—एक, जो