इस बार देर नही कड़क सर्दी में वह छोटी लड़की कभी यहां तो कभी वहां अपनी किस्मत आजमा रही थी। उसके कपड़े जगह-जगह से फटे पड़े थे। स्वैटर के नाम पर उसके शरीर पर मात्र चंद धागों का ताना-बाना ही रह चुका था। उसके आगे व पीछे दोनों ओर बड़े-बड़े छेद हो चुके थे और बाजू नीचे की ओर लटक चुके थे। बालों की हालत देखकर लगता था जैसे इन्हे सालों से धोया ही न गया हो। मैल ने उन्हे गोंद की भांति अपने शिकंजे में जकड़ रखा था। वह बार-बार अपना सिर खुजाए जा रही थी। ठंड से फटा