अन्तिम हस्ताक्षर

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अन्तिम हस्ताक्षर अभी जगदीश जी के रिटायरमेंट में दो महीने बाकी थे और स्टाफ के लोग थे कि पहले से ही उनसे विदाई टोन में बतियाने लगे थे, गोया कि- ‘‘और जगदीश भाई....अब क्या इरादा है ?‘‘ ‘‘तो क्या सोंचा आपने जगदीश भाइ्र्र...जी पी एफ के पैसे कहाँ लगाएंगे?‘‘ ‘‘मेरी मानिए तो लगते ही दोनों बेटियों को निबटा डालिए.....‘‘ ‘‘भई जगदीश बाबू भूल मत जाना, मिलते रहिएगा....‘‘ -ऐसे ही तमाम किस्म के फिक़रे जगदीश बाबु को कचोट डालते। वह कुछ जवाब देने के बजाए मन ही मन उन कथित शुभचिंतकों को गरियाने लगते- ‘‘स्...साले इनका दम क्यूँ निकल रहा है,