अनबीता व्यतीत ‘‘जाने क्यूँ लगता है कि मैं किसी अजनबी देश में हूँ जहाँ मेरा पासपोर्ट खो गया है। अजब उहापोह की स्थिति आंतर्नाद का अलम है कि कहाँ जाऊँ...कहाँ चली जाऊँ...।‘‘ रश्मि ने नितांत रूआंसे और खोए-खोए स्वर में अपनी व्यथा रख दी थी। रजनी चौंक ही पड़ी- ‘‘ क्यूँ, क्या हो गया ऐसा। क्या हो गया भई...?‘‘ ‘‘मेरा मन उस पति रूपी प्राणी को नहीं स्वीकार पा रहा जिसके संग पाँच वर्ष पहले मेरी अबोधता ने अग्नि के सात फेरे ले लिए थे। वह तब भी एक धनकमाऊ टीचर था अब भी वही है। मैं तब भी एक