Trishana

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बस यही उलझने हैं मेरी। तुम बताओ मैं कहाँ गलत हूँ। कहाँ मेरे चरित्र में खोट है। सिर्फ इसलिए कि मैं खुश रहना चाहती हूँ मैं क्यों दुनिया के तानों का शिकार बनुँ। मेरा मन यह सब स्वीकार करने को अब तैयार नहीं। आदमी के लिए तो यह सब बन्धन नहीं होते। चरित्रवान न होते हुए भी आराम से जीवन व्यतीत करता है। शादीशुदा होते हुए भी पर स्त्री को ध्यान में रखता है तो भी उस पर कोई उँगली नहीं उठाता। बीवी स्वर्ग सिधार गए तो साल भी निकलने नहीं देता और दूसरा ब्याह कर लेता है। तब भी