बस एक कदम.... ज़किया ज़ुबैरी (1) “नहीं मैं नहीं आऊंगी।” शैली को अपनी आवाज़ में भरे आत्मविश्वास पर स्वयं ही यक़ीन नहीं हो पा रहा था।... और वह ख़ामोश हो गई। टेलिफ़ोन के दूसरे छोर से आवाज़ छन छन कर बाहर आ रही थी, “हलो, हलो, फ़ोन बंद मत कीजिये... प्लीज़! ” “नहीं, मैं फ़ोन बन्द नहीं कर रही... मगर... मैं आऊंगी नहीं – इस दफ़ा आवाज़ में उतनी सख़्ती नहीं थी। “मगर आप तो... आपने तो वादा किया था... एक बार आने में कोई नुक़सान थोड़े ही हो जाएगा आपका।” .... शैली की सोच उसे परेशान करने लगी है।