बाँसुरी के सुर

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बांसुरी के सुर सूर्यदेव की तंद्रा अभी टूटी नहीं थी । आसमान सुरमई रंग में रंगा था । पहली किरण ने धरती पर पहला पैर रखा ही था कि सुबह सुबह दरवाजे पर खटखट हुई । इतनी सुबह ! कौन हो सकता है ? मन में झुन्झुलाह्ट हुई । अभी तो नींद भी ढंग से नहीं खुली है । ऐसे में कोई अधीरता से दरवाजा पीटे जा रहा है । उफ़ ! इसे डोर - बैल भी नहीं दिखी क्या ? अब लेटे रहना असम्भव हो गया था । स्लीपर पैरों में फंसा जैसे तैसे दरवाजा खोला ।