और,, सिद्धार्थ बैरागी हो गया - 2

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ताप आज फिर बढ़ने लगा था..देह बथ रहा था पर आज कोई उसकी सुध लेने वाला नहीं था, वह जानती थी करवट बदल कर सोने की कोशिश करती है बगीचे में सियार की हूँआ-हूँआ रात के सन्नाटे को चीरती हुयी दूर तक जा रही थी पर उसका मन आतीत के सफर से वापस आ चुका था, आँखें अब भी बह रहीं थीं