मानवता के झरोखे

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जीवन के वास्तविक अर्थ को भूलकर अर्थ(धन) के पीछे दौड़ते हुए व्यक्ति मानवता को भूलते जा रहे हैं । मानवीय मूल्य विघटित हो रहे हैं और जीवन-दर्शन निरन्तर बदलता जा रहा हैं। इसी विडंबना को लेकर यह कहानी की रचना की गयी है।