लघुकथा कहानियाँ पढ़े और PDF में डाउनलोड करे

Stories and books have been a fundamental part of human culture since the dawn of civilization, acting as a powerful tool for communication, education, and entertainment. Whether told around a campfire, written in ancient texts, or shared through modern media, Short Stories in hindi books and stories have the unique ability to transcend time and space, connecting people across generations and cult...Read More


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स्वाभिमान - लघुकथा - 41 By सीमा जैन 'भारत'

-“शादी का लहंगा लेने के लिए ताई-ताऊ जी को साथ लेने की
क्या ज़रूरत है बेटा?”
-“माँ, हमारा बजट तो तुम जानती हो ना!”
- “सपना, तुमनें हमेशा मेरी बात को समझा है फ़िर आज किसी से उम्मीद...

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प्यार एक जींदगी का राझ By Shaimee oza Lafj

प्यार एक जिंदगी का  राझ......प्यार या नशा भी बहुत अदभुत होता है.किसी के लीए मर जाना, प्यार भी इश्वर की। तरह निर्मल पवित्र होता है कीसे कब कीसके साथ हो जाए पता न चलता .कभी प्या...

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हुआंग चाउ की बेटी - 2 By Sax Rohmer

मुझे इसीकी आशंका थी, चीफ इंस्पेक्टर केरी ने कहा। उसने अपनी टोपी अपने सर पर थोड़ी और ऊपर खिसकाई और मुर्दाघर के स्लैब पर रखी वीभत्स लाश का मुआइना किया। अन्य दो पुलिस अधिकारी - एक वर्...

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एक थी सीता - 3 By MB (Official)

सूर्योदय (पूर्व) के समीपस्थ द्वीपों को सागर की गहनतम गहराई आवृत किये हैं। लम्बे सुनहले बालों वाली सागर-कन्याओं से घिरा एक युवक का मृत शरीर मोतियों पर पड़ा था। संगीतमय माधुर्य के सा...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 40 By Seema Bhatia

रात के बारह बजे थे। बिस्तर के दो कोनों दूर दूर पर पड़े दोनों मन से भी निरंतर दूर होते जा रहे थे। मोहन के दम्भी स्वभाव के आगे सरल सविता बेबस हो जाती थी। जरा जरा सी बात पर नुक्स निकाल...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 39 By Savita Mishra

आज रिटायर हो गया सुगन्धा
अरे! कैसे-क्यों ? तबियत तो ठीक है न ! अभी आपकी नौकरी के तो चार महीने बाकी हैं
नहीं रे ! 'प्यार' से रिटायर हुआ हूँ
आप भी! इस बुढ़ापे...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 38 By Savita Indra Gupta

दरवाजे पर पंकज को देख, पल भर को आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। खड़ी की खड़ी रह गयी ... नि:शब्द, हतप्रभ। सात फेरों के बंधन के बावजूद, पिछले तीस वर्षों से दोनों के बीच में अबोला था। इस बीच...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 37 By Sangita Mathur

प्रोफेसर नरेन्‍द्र शर्माजी गांव बडे भाई के पास गए तो वहां उनकी पुश्‍तैनी खेती बाड़ी और दुकान जोरों से चलते देख अत्‍यंत प्रभावित हुए। वैसे तो नरेन्‍द्रजी अपना हिस्‍सा पहले ही लेकर अल...

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तक़ी कातिब By Saadat Hasan Manto

लखनऊ और वली के जाहिल और ख़ुद सर क़ातिबों से मेरा जी जला हुआ था। एक था उस को जा व बेजा पेश डालने की बुरी आदत थी। मौत को मूत और सोत को सूत बना देता था। मैंने बहुत समझाया मगर वो न समझा...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 36 By Sangeeta Gandhi

“ऑन्टी हम कल से सिर्फ बर्तन धोएंगे। रसोई का बाकी काम न करेंगे ।”
“ क्यों ,क्या दिक्कत है? तुम्हें बर्तनों के लिए 600 देते हैं। रसोई साफ करने ,सब्जी काटने के अलग से 200 देते हैं न...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 35 By Sandhya Tiwari

भइया ने माँ के पैर छुए तो माँ स्नेह विगलित स्वर में बोलीं
अच्छे रहो, सुखी रहो, तरक्की करो।
पापा के पैर छूने पर पापा ने कहा जुग जुग जियो बेटा । चिंरजीवी हो। यशस्वी हो।
त...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 34 By Ratnkumar Sambhria

भरी जवानी में विधवा हो गई रमिया को जमींदार की टहलुवई पति से विरासत में मिली। उसके लिए श्रम और भूख एक-दूसरे के पर्याय थे। दिनभर खटना नियति होने के बावजूद रमिया ने एक गुस्ताखी की। वह...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 33 By Rachana Agarwal Gupta

आज बच्चों को पढ़ाते वक़्त, अचानक अपने आप से मुलाकात हो गई।
अरे सुमन क्या हुआ, सिर्फ दस मिनट बचे हैं टेस्ट खत्म होने में, जल्दी पूरा करो
जी...जी मैम, बस यह थ्योरम नही बन रहा
म...

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डर लगता है By SURENDRA ARORA

कहानी डर लगता है " क्यूँ किया है फिर से फोन ? मजबूर...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 32 By Pranjal Shrivastav

प्राइवेट इंस्टीट्यूट में इंटरव्यू के बाद राधिका को रुकने के लिए कहा गया था। पाँच सालों की बेरोजगारी और तंगहाली ने उच्च शिक्षित राधिका के आत्मविश्वास को हिला दिया था फिर भी उसने इस...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 31 By Pradeep Mishra

‘भारत छोड़ो आन्दोलन’ की तपिश को किशोरावस्था में उन्होंने बड़े करीब से महसूस किया था संगी – साथियों के साथ ‘अंग्रेजो भारत छोड़ो”… ‘वन्देमातरम” के नारे लगाये थे निर्भीकता का पहला पा...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 30 By Madhu Jain

शाम होने को आई, शोभा सुबह से बिन कुछ खाये पिये ही अपने कमरे में लेटी है।
कोई भी उसके कमरे में नहीं आया। न ही आज खाने के लिए उससे पूछां, और यह जानने की कोशिश भी नहीं की कि उसकी तबि...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 29 By Madhav Nagda

जब से उसका स्थानान्तरण आदेश आया है सब मन ही मन खूब पुलकित हैं खूबीचन्द चपरासी से लेकर बड़े बाबू खेमराज तक सब कैसी होगी वह? युवा अधेड़ या वृद्ध? फैशनेबल या सीधी-सादी? दिलफेंक या ग...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 28 By डा.कुसुम जोशी

प्रवीन गुस्से से भरा बैठा था, चीखता हुआ बोला अन्तिम बार कह रहा हूं शशि ! मेरी बात तुम्हें मान लेनी चाहिये.. वरना ठीक नही होगा ।
क्या ठीक नही होगा..बचा ही क्या है अब..इस मजबूरी औ...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 27 By डॉ. कुमारसम्भव जोशी

अरे! चाय आज ही आएगी या इनको अपनी चाय खुद के घर से ही लाने का बोल दूँ.
चाय लाने में जरा सी देरी होने पर ही अजय ने अपने दोस्त मानव की उपस्थिति की परवाह किए बगैर रचना को बुरी तरह लत...

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हरिदास By Lakshmi Narayan Panna

एक बार जब खादी ग्रामोद्योग के द्वारा संचालित विभिन्न इकाइयों के मानकों का भौतिक सत्यापन करने की लिए कुछ लोगों की आवश्यक्ता थी और मुझे रोजगार की। सत्यापन का कार्य खादी विभाग ने एक...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 26 By Kapil Shastri

ऐ.सी.थ्री टायर की साइड अपर बर्थ पर उनींदी हो रही प्रभा को आभास था कि कुछ छोटे मोटे स्टेशन्स चुपके से गुजर चुके हैं और अब चाय, गरमागरम चाय, बढ़िया मसाले वाली चाय और पेपर, सुबह का...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 25 By Kanta Roy

स्कूल से आते ही उस दिन लड़का देर तक चिल्लाता रहा कि उसे पॉकेट मनी चाहिए ही चाहिए! क्योंकि उसके सभी सहपाठियों को उनके पिता पॉकेट मनी देते हैं। उसका माली पिता बड़ी मुश्किल से उसके लि...

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फरार By Prashant Vyawhare

फरार वो १९८६ का दौर था जब अंडरवर्ल्ड का बड़ा भाई, उस पावरफुल नेताजी सरकार के कहने पर दुबई भाग गया उसके बाद मुंबई के अंडरवर्ल्ड में खलबली मच गयी. हर छोटा गैंगस्टर भाई की जगह लेना च...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 24 By kanak harlalka

मां कहां हो आप, और यह क्या कर रहीं है ? आपको किस चीज की कमी है । जरा मेरी पोजीशन का भी खयाल रखना चाहिए था । मैं और आपकी बहू दोनों इतने बड़े पोस्ट पर हैं । फिर आप यह सब ..!!

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स्वाभिमान - लघुकथा - 23 By Jyoti Sharma

अरे! तू तो बीमार थी न कमली फिर क्यों आयी?
और आज तो वैसे ही करवा चौथ है। मैं ये जानती हूं कि बीमार होने पर भी तू इसे छोड़ेगी नहीं तो आज और आराम कर लेती घर पर।
'बीबीजी सच कहूँ...

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कार्तिकेय और गणेश By Arpan Kumar

गाँव से आई एक स्वाभिमानी नानी से दूर रहने वाले दो बच्चों के अंततः पश्चाताप में निखरकर बाहर आने की कहानी।यह कहानी बद्‌ए होते बच्चों में इमेज़-कांशसनेस की प्रवृत्ति को दिखलाती है।

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स्वाभिमान - लघुकथा - 22 By Janki Wahie

हथकरघे पर बैठी गौरा को देख, सुबोध चहक कर बोला-
चाची जी, दोनों गलीचे तुरन्त बिक गए।
सुबोध, सच्ची !
आप सुंदर धागों और रंगों को बुनकर, जादुई डिज़ाइन का ऐसा ताना बाना बुनती हो...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 21 By Jahnavi Suman

शामली के पति शैलेंद्र काम के सिलसिले में अक्सर विदेश जाया करते थे, इसलिए उसने अपने बेटे सार्थक का पालन पोषण एक तरह से अकेले ही किया था।
शलेंद्र की रिटायरमेंट के बाद वह खुश थी, कि...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 20 By Harish Kumar Amit

साहब अभी-अभी मंत्री जी की कोठी से लौटकर दफ़्तर के अपने कमरे में आए थे। मंत्री जी ने साहब के विदेश जाने की फाइल पर हस्ताक्षर तो कर दिए थे, मगर ऐसा करने से पहले साहब को जैसे रुला ही द...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 19 By Divya Sharma

क्या कर लोगी तुम इस नौकरी से, कितना कमा लोगी ?
अगर तुम चाहो तो लाखों मे खेल सकती हो
मैं समझी नहीं सर क्या कहना चाह रहे है आप?
समझना क्या है कभी ध्यान से खुद को देखा है आ...

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प्रेम कहानी - टीस By SURENDRA ARORA

टीस - एक प्रेम कहानी शाम होने को थी . धुंधलका उतर रहा था . कमरे में तो उतर भी चुका था . मोबाईल की घंटी बजी तो नजरे स्क्रीन पर गयीं . वहां कनिका का नाम...

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सच्ची श्रद्धा By Sonia Gupta

#my dost gnesha मेरा दोस्त गणेशा – बाल कहानी शीर्षक- सच्ची श्रद्धा ************ “रिया” पांच वर्ष की थी जब उसके माता पिता दोनों एक कार दुर्घटना का शिकार हो गये थे और उसी समय उनकी मृ...

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बातें जरूरी है या आपकी जिंदगी - 2 By Antima Singh

एक शारीरिक शोषण का शिकार हुई लड़की की व्यथा .. माँ जब मैं छोटी थी तो आप कहती थी कि बेटा जब कोई गलत तरीके से टच करे तो जोर से हल्ला मचाना , चुप मत रहना बेटा , आपने ही मुझे गुड टच और...

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मास्को का सच By Ved Prakash Tyagi

मास्को का सच “ललिता! सो गयी क्या?” “नहीं तो, बस ऐसे ही आपकी प्रतीक्षा में बैठे बैठे आँख लग गयी थी।” “हाँ, रात भी काफी हो गयी है, बच्चे भी थक कर सो गए हैं।” “आज आप कहाँ रह गए थे, कभ...

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अमृत और जहर By Ajay Amitabh Suman

भारत की राजधानी दिल्ली में निजामुद्दीन क्षेत्र मेंं निजामुद्दीन बस स्टैंड है। निजामुद्दीन बस स्टैंड से रोड आगे की तरफ इंंडिया गेट की तरफ जाती है।रास्ते में सबसे पहले एक गोलंबर आता...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 18 By Chitra Raghav

विश्वास करो जब मैं घर से निकला था न.. मेरा पोशाक सफेद थी। ये धब्बे मेरे नहीं हैं। घर से मंज़िल तक जो मिला अपना रंग छोड़ गया।
किसका कसूर कहिए, अब का मौसम ही ऐसा है रास्तों पर कीचड़ पह...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 17 By Chandresh Kumar Chhatlani

पिता के अंतिम संस्कार के बाद शाम को दोनों बेटे घर के बाहर आंगन में अपने रिश्तेदारों और पड़ौसियों के साथ बैठे हुए थे। इतने में बड़े बेटे की पत्नी आई और उसने अपने पति के कान में कुछ कह...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 16 By BHOLA NATH SINGH

बेटा एक बड़ी कंपनी में प्रबंधक बन गया। उसने अपनी पसंद से शादी भी कर ली। बहू को एक बच्चा भी हो गया पर बेटे ने खबर तक नहीं दी। अब बच्चा चार वर्ष का हो चला था। अब बेटे को माता-पिता की...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 15 By Bhagwan Vaidya

‘‘अब और विचार न करो, परबतिया। मनीष और बहू कल लौटनेवाले हैं, नागपुर। तुम पारंबी को बैग लेकर तैयार रखना। मैं रामदीन को भेज दूँगी लेने के लिए।’’
‘‘मैं एक शब्द पारंबी से पूछ लेना चाहत...

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मायके का मोह नहीं छूटा तो अपना घर नहीं बसा पाओगी By Sonia chetan kanoongo

विदाई के वक़्त ही वो जैसे दहलीज़ छूट चुकी थी, रस्मों की शुरुआत बढ़ते दिन के साथ शुरू हो रही थी, आज़ादी के पंखों पर जैसे किसी ने चादर डाल दी इतनी भारी साड़ी कल्पना को बोझ के सिवा कोई और...

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ग्यारह वर्ष का समय By Ramchandra Shukla

दिन-भर बैठे-बैठे मेरे सिर में पीड़ा उत्‍पन्‍न हुई : मैं अपने स्‍थान से उठा और अपने एक नए एकांतवासी मित्र के यहाँ मैंने जाना विचारा। जाकर मैंने देखा तो वे ध्‍यान-मग्‍न सिर नीचा किए...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 14 By Ashish Kumar Trivedi

अरे रमा आज काम पर आने में देर कर दी।
रमा के घर में कदम रखते ही अम्मा जी ने पूँछा।
हाँ आज मेरी बिटिया सलोनी का जन्मदिन है। बस उसके लिए ही कुछ बना रही थी। इसलिए देर हो गई।
कित...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 41 By सीमा जैन 'भारत'

-“शादी का लहंगा लेने के लिए ताई-ताऊ जी को साथ लेने की
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-“माँ, हमारा बजट तो तुम जानती हो ना!”
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प्यार एक जींदगी का राझ By Shaimee oza Lafj

प्यार एक जिंदगी का  राझ......प्यार या नशा भी बहुत अदभुत होता है.किसी के लीए मर जाना, प्यार भी इश्वर की। तरह निर्मल पवित्र होता है कीसे कब कीसके साथ हो जाए पता न चलता .कभी प्या...

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हुआंग चाउ की बेटी - 2 By Sax Rohmer

मुझे इसीकी आशंका थी, चीफ इंस्पेक्टर केरी ने कहा। उसने अपनी टोपी अपने सर पर थोड़ी और ऊपर खिसकाई और मुर्दाघर के स्लैब पर रखी वीभत्स लाश का मुआइना किया। अन्य दो पुलिस अधिकारी - एक वर्...

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एक थी सीता - 3 By MB (Official)

सूर्योदय (पूर्व) के समीपस्थ द्वीपों को सागर की गहनतम गहराई आवृत किये हैं। लम्बे सुनहले बालों वाली सागर-कन्याओं से घिरा एक युवक का मृत शरीर मोतियों पर पड़ा था। संगीतमय माधुर्य के सा...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 40 By Seema Bhatia

रात के बारह बजे थे। बिस्तर के दो कोनों दूर दूर पर पड़े दोनों मन से भी निरंतर दूर होते जा रहे थे। मोहन के दम्भी स्वभाव के आगे सरल सविता बेबस हो जाती थी। जरा जरा सी बात पर नुक्स निकाल...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 39 By Savita Mishra

आज रिटायर हो गया सुगन्धा
अरे! कैसे-क्यों ? तबियत तो ठीक है न ! अभी आपकी नौकरी के तो चार महीने बाकी हैं
नहीं रे ! 'प्यार' से रिटायर हुआ हूँ
आप भी! इस बुढ़ापे...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 38 By Savita Indra Gupta

दरवाजे पर पंकज को देख, पल भर को आँखों पर विश्वास नहीं हुआ। खड़ी की खड़ी रह गयी ... नि:शब्द, हतप्रभ। सात फेरों के बंधन के बावजूद, पिछले तीस वर्षों से दोनों के बीच में अबोला था। इस बीच...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 37 By Sangita Mathur

प्रोफेसर नरेन्‍द्र शर्माजी गांव बडे भाई के पास गए तो वहां उनकी पुश्‍तैनी खेती बाड़ी और दुकान जोरों से चलते देख अत्‍यंत प्रभावित हुए। वैसे तो नरेन्‍द्रजी अपना हिस्‍सा पहले ही लेकर अल...

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लखनऊ और वली के जाहिल और ख़ुद सर क़ातिबों से मेरा जी जला हुआ था। एक था उस को जा व बेजा पेश डालने की बुरी आदत थी। मौत को मूत और सोत को सूत बना देता था। मैंने बहुत समझाया मगर वो न समझा...

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“ क्यों ,क्या दिक्कत है? तुम्हें बर्तनों के लिए 600 देते हैं। रसोई साफ करने ,सब्जी काटने के अलग से 200 देते हैं न...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 35 By Sandhya Tiwari

भइया ने माँ के पैर छुए तो माँ स्नेह विगलित स्वर में बोलीं
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पापा के पैर छूने पर पापा ने कहा जुग जुग जियो बेटा । चिंरजीवी हो। यशस्वी हो।
त...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 34 By Ratnkumar Sambhria

भरी जवानी में विधवा हो गई रमिया को जमींदार की टहलुवई पति से विरासत में मिली। उसके लिए श्रम और भूख एक-दूसरे के पर्याय थे। दिनभर खटना नियति होने के बावजूद रमिया ने एक गुस्ताखी की। वह...

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अरे सुमन क्या हुआ, सिर्फ दस मिनट बचे हैं टेस्ट खत्म होने में, जल्दी पूरा करो
जी...जी मैम, बस यह थ्योरम नही बन रहा
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डर लगता है By SURENDRA ARORA

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जब से उसका स्थानान्तरण आदेश आया है सब मन ही मन खूब पुलकित हैं खूबीचन्द चपरासी से लेकर बड़े बाबू खेमराज तक सब कैसी होगी वह? युवा अधेड़ या वृद्ध? फैशनेबल या सीधी-सादी? दिलफेंक या ग...

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क्या ठीक नही होगा..बचा ही क्या है अब..इस मजबूरी औ...

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अरे! चाय आज ही आएगी या इनको अपनी चाय खुद के घर से ही लाने का बोल दूँ.
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ऐ.सी.थ्री टायर की साइड अपर बर्थ पर उनींदी हो रही प्रभा को आभास था कि कुछ छोटे मोटे स्टेशन्स चुपके से गुजर चुके हैं और अब चाय, गरमागरम चाय, बढ़िया मसाले वाली चाय और पेपर, सुबह का...

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फरार By Prashant Vyawhare

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स्वाभिमान - लघुकथा - 24 By kanak harlalka

मां कहां हो आप, और यह क्या कर रहीं है ? आपको किस चीज की कमी है । जरा मेरी पोजीशन का भी खयाल रखना चाहिए था । मैं और आपकी बहू दोनों इतने बड़े पोस्ट पर हैं । फिर आप यह सब ..!!

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अरे! तू तो बीमार थी न कमली फिर क्यों आयी?
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कार्तिकेय और गणेश By Arpan Kumar

गाँव से आई एक स्वाभिमानी नानी से दूर रहने वाले दो बच्चों के अंततः पश्चाताप में निखरकर बाहर आने की कहानी।यह कहानी बद्‌ए होते बच्चों में इमेज़-कांशसनेस की प्रवृत्ति को दिखलाती है।

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स्वाभिमान - लघुकथा - 22 By Janki Wahie

हथकरघे पर बैठी गौरा को देख, सुबोध चहक कर बोला-
चाची जी, दोनों गलीचे तुरन्त बिक गए।
सुबोध, सच्ची !
आप सुंदर धागों और रंगों को बुनकर, जादुई डिज़ाइन का ऐसा ताना बाना बुनती हो...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 21 By Jahnavi Suman

शामली के पति शैलेंद्र काम के सिलसिले में अक्सर विदेश जाया करते थे, इसलिए उसने अपने बेटे सार्थक का पालन पोषण एक तरह से अकेले ही किया था।
शलेंद्र की रिटायरमेंट के बाद वह खुश थी, कि...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 20 By Harish Kumar Amit

साहब अभी-अभी मंत्री जी की कोठी से लौटकर दफ़्तर के अपने कमरे में आए थे। मंत्री जी ने साहब के विदेश जाने की फाइल पर हस्ताक्षर तो कर दिए थे, मगर ऐसा करने से पहले साहब को जैसे रुला ही द...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 19 By Divya Sharma

क्या कर लोगी तुम इस नौकरी से, कितना कमा लोगी ?
अगर तुम चाहो तो लाखों मे खेल सकती हो
मैं समझी नहीं सर क्या कहना चाह रहे है आप?
समझना क्या है कभी ध्यान से खुद को देखा है आ...

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प्रेम कहानी - टीस By SURENDRA ARORA

टीस - एक प्रेम कहानी शाम होने को थी . धुंधलका उतर रहा था . कमरे में तो उतर भी चुका था . मोबाईल की घंटी बजी तो नजरे स्क्रीन पर गयीं . वहां कनिका का नाम...

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सच्ची श्रद्धा By Sonia Gupta

#my dost gnesha मेरा दोस्त गणेशा – बाल कहानी शीर्षक- सच्ची श्रद्धा ************ “रिया” पांच वर्ष की थी जब उसके माता पिता दोनों एक कार दुर्घटना का शिकार हो गये थे और उसी समय उनकी मृ...

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बातें जरूरी है या आपकी जिंदगी - 2 By Antima Singh

एक शारीरिक शोषण का शिकार हुई लड़की की व्यथा .. माँ जब मैं छोटी थी तो आप कहती थी कि बेटा जब कोई गलत तरीके से टच करे तो जोर से हल्ला मचाना , चुप मत रहना बेटा , आपने ही मुझे गुड टच और...

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मास्को का सच By Ved Prakash Tyagi

मास्को का सच “ललिता! सो गयी क्या?” “नहीं तो, बस ऐसे ही आपकी प्रतीक्षा में बैठे बैठे आँख लग गयी थी।” “हाँ, रात भी काफी हो गयी है, बच्चे भी थक कर सो गए हैं।” “आज आप कहाँ रह गए थे, कभ...

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अमृत और जहर By Ajay Amitabh Suman

भारत की राजधानी दिल्ली में निजामुद्दीन क्षेत्र मेंं निजामुद्दीन बस स्टैंड है। निजामुद्दीन बस स्टैंड से रोड आगे की तरफ इंंडिया गेट की तरफ जाती है।रास्ते में सबसे पहले एक गोलंबर आता...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 18 By Chitra Raghav

विश्वास करो जब मैं घर से निकला था न.. मेरा पोशाक सफेद थी। ये धब्बे मेरे नहीं हैं। घर से मंज़िल तक जो मिला अपना रंग छोड़ गया।
किसका कसूर कहिए, अब का मौसम ही ऐसा है रास्तों पर कीचड़ पह...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 17 By Chandresh Kumar Chhatlani

पिता के अंतिम संस्कार के बाद शाम को दोनों बेटे घर के बाहर आंगन में अपने रिश्तेदारों और पड़ौसियों के साथ बैठे हुए थे। इतने में बड़े बेटे की पत्नी आई और उसने अपने पति के कान में कुछ कह...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 16 By BHOLA NATH SINGH

बेटा एक बड़ी कंपनी में प्रबंधक बन गया। उसने अपनी पसंद से शादी भी कर ली। बहू को एक बच्चा भी हो गया पर बेटे ने खबर तक नहीं दी। अब बच्चा चार वर्ष का हो चला था। अब बेटे को माता-पिता की...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 15 By Bhagwan Vaidya

‘‘अब और विचार न करो, परबतिया। मनीष और बहू कल लौटनेवाले हैं, नागपुर। तुम पारंबी को बैग लेकर तैयार रखना। मैं रामदीन को भेज दूँगी लेने के लिए।’’
‘‘मैं एक शब्द पारंबी से पूछ लेना चाहत...

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मायके का मोह नहीं छूटा तो अपना घर नहीं बसा पाओगी By Sonia chetan kanoongo

विदाई के वक़्त ही वो जैसे दहलीज़ छूट चुकी थी, रस्मों की शुरुआत बढ़ते दिन के साथ शुरू हो रही थी, आज़ादी के पंखों पर जैसे किसी ने चादर डाल दी इतनी भारी साड़ी कल्पना को बोझ के सिवा कोई और...

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ग्यारह वर्ष का समय By Ramchandra Shukla

दिन-भर बैठे-बैठे मेरे सिर में पीड़ा उत्‍पन्‍न हुई : मैं अपने स्‍थान से उठा और अपने एक नए एकांतवासी मित्र के यहाँ मैंने जाना विचारा। जाकर मैंने देखा तो वे ध्‍यान-मग्‍न सिर नीचा किए...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 14 By Ashish Kumar Trivedi

अरे रमा आज काम पर आने में देर कर दी।
रमा के घर में कदम रखते ही अम्मा जी ने पूँछा।
हाँ आज मेरी बिटिया सलोनी का जन्मदिन है। बस उसके लिए ही कुछ बना रही थी। इसलिए देर हो गई।
कित...

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