लघुकथा कहानियाँ पढ़े और PDF में डाउनलोड करे

Stories and books have been a fundamental part of human culture since the dawn of civilization, acting as a powerful tool for communication, education, and entertainment. Whether told around a campfire, written in ancient texts, or shared through modern media, Short Stories in hindi books and stories have the unique ability to transcend time and space, connecting people across generations and cult...Read More


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  • रुही

    पाकिस्तान के मुसलमान किसी भी हिन्दू को जिंदा नहीं छोड़ रहे थे, बच्चों और बूढ़ों को...

  • स्वाभिमान - लघुकथा - 49

    'इस समय कौन आ सकता है?' डोर-बेल की आवाज पर सोचते हुए निशि ने दरवाजा खोला...

  • स्वाभिमान - लघुकथा - 48

    आपलोग सूट में देखना चाहेंगे या साड़ी में ? लड़की के पिता ने निरीह भाव से लड़के के...

सम्बोधन By Krishna manu

आज वह तीन दिनो से चल रहे 'चैट चैट' के खेल का अंत कर देना चाहता था। बहुत हुआ मजाक। उसकी सोच दो दिनो पूर्व की घटना पर केंद्रित हो गई। उस दिन भी रात कुछ गहरी हो चली थी। वह ए...

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कच्चा कहानीकार - अणु कथा By Deepak Shah

अगले दिन संयोजक ने ये कह कर कि, “लेखकों, कवियों को एक अच्छा मंच चाहिए। और समाज को अच्छे लेखक, अच्छे कवि। जो समाज को सही रास्ता दिखा सकें। हम वही मंच हैं।” और सभा शुरू हुई। रमता ने...

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बेईमान - परवेज़ इक़बाल की लघु कथाएं By Parvez Iqbal

भय भूख और भ्रष्टाचार को मुद्दा बना कर चुनाव लड़ रही पार्टी के मुखिया वातानुकूलित मंच से भाषण झाड़ रहे थे और चिलमिलाती धुप में पसीना पोंछते हुवे सोच में डूबा था की काली वर्दीधारी दर्...

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रस्म By Anita Lalit

बर्तन गिरने की आवाज़ से शिखा की आँख खुल गयी। घडी देखी तो आठ बज रहे थे , वह हड़बड़ा कर उठी। "उफ़्फ़ ! मम्मी जी ने कहा था कल सुबह जल्दी उठना है , 'रसोई' की रस्म करनी है, हलवा-पूरी बनाना...

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बेगुनाह गुनेहगार 2 By Monika Verma

अब तक हमने देखा कि एक लड़की सुहानी , अपने मम्मी पापा और छोटा भाई हैरी के साथ रहती है। बहोत बाद परिवार है। लेकिन प्रोपर्टी की वजह से सब मे अनबन्ध चल रही है। इतनी अनबन्ध की शादी व्याह...

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तीन मोटी औरतें By Saadat Hasan Manto

एक का नाम मिसिज़ रचमीन और दूसरी का नाम मिसिज़ सतलफ़ था। एक बेवा थी तो दूसरी दो शौहरों को तलाक़ दे चुकी थी। तीसरी का नाम मिस हिकन था। वो अभी नाकतख़दा थी। इन तीनों की उम्र चालीस के लग...

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उसकी मौत By Ashok Pruthi Matwala

सहसा, सभा में मौजूद एक सज्जन ने मौत का कारण जानते हुये भी अपने पास बैठे दूसरे सज्जन से औपचारिकतावश अपनी सहानुभूति दर्शाते हुये वार्तालाप शुरू किया, वाकई ही बड़ा ज़ुल्म हुआ है भाई सा...

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प्रकृति मैम By Prabodh Kumar Govil

अरे सर, रुटना रुटना ...अविनाश दौड़ता-चिल्लाता आया।
-क्या हुआ? मैं पीछे देख कर चौंका।
-सर, टन्सेसन मिलेडा।
-अरे कन्सेशन ऐसे नहीं मिलता। मैंने लापरवाही से कहा।
-तो टेसे मिलटा है?...

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रुही By Ved Prakash Tyagi

पाकिस्तान के मुसलमान किसी भी हिन्दू को जिंदा नहीं छोड़ रहे थे, बच्चों और बूढ़ों को निर्दयता से मार रहे थे, जवान औरतों के साथ समूहिक बलात्कार करके उनको बड़े ही घिनौने ढंग से मौत के घाट...

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सच्चा इंसान By Nagendra Dutt Sharma

यह कोई उस समय की बात है जब मैं नवी कक्षा का छात्र था। किराये के जिस मकान में हम रहते थे वहाँ से मेरा स्कूल कोई डेढ़-दो किलोमीटर की दूरी पर था। स्कूल उस समय ज्यादातर विद्यार्थी पैदल...

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एक अपवित्र रात - 7 By MB (Official)

पिकारेस्क नॉबेल का जनक और स्पेन का सर्वाधिक प्रतिभाशाली कथाकार सर्वाण्टीज़ (1547-1616) जिन्दगी भर गरीबी और गुमनामी से जूझता रहा। अपने जमाने को समझने में सर्वाण्टीज़ किस कदर सफल रहा...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 56 By Upasna Siag

जब से बहेलिये ने चिड़िया को अपना कर देख भाल करने का फैसला किया है तभी से चिड़िया सहमी हुई तो थी ही, लेकिन में विचारमग्न भी थी । वह कैसे भूल जाती बहेलिये का अत्याचार - दुराचार । उ...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 55 By Nisha chandra

क्या करे अनी, समझ नहीं पा रही है ।क्या पापा से मर्सिडिज के लिए बोल दे या हमेशा के लिए समीर को छोड़कर पिता के घर चली जाये। इकलौती सन्तान है और करोड़ो की वारिस, पिता से कहकर मर्सिडिज...

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स्नेह By Anjali Dhabhai

मां कितने जतन से अपने बच्चों को पालपोस कर बड़ा करती हैं। वो चाहे अकेली हो या परिवार के साथ पर वो अपने बच्चों को परवरिश देती हैं ,पर क्या बच्चे अपनी एक माँ को ढंग से रख पाते हैं वो प...

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हुआंग चाउ की बेटी - 10 By Sax Rohmer

डरहम ने धीरे से हुआंग चाउ के ट्रेज़र हाउस की छत की जाली हटाई। वह किसी तरह के जाल और खतरों के लिए तैयार था। कोई भी सयाना व्यक्ति, उसके - डरहम के मजबूरी में पीछे छोड़े गए प्रमाणों को द...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 54 By Krishanlata Yadav

नौकर के रूप में काम पाने आए युवक से नियोक्ता ने प्रश्न किया, ‘तुम्हारा नाम ?’
‘दीनदयाल।’
‘दीनदयाल यानी दीनू ?’
‘दीनू नहीं, सर, दीनदयाल।’
‘सर नहीं, मालिक बोलो। नौकरों की ज़ुबान...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 53 By Asha sharma

सुनो लड़के! जरा इस गार्डन की साफ़-सफाई कर दोगे? कितने पैसे लोगे?” बाहर गली में कबाड़ वाले लड़के की आवाज सुनकर रजनी बाहर आई.

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स्वाभिमान - लघुकथा - 52 By Vinita Rahurikar

“क्या भाई साहब आपके लिए रिश्तों से बढकर पैसा हो गया? कैसा जमाना आ गया है. सब अपने स्वार्थ में ऐसे डूबे हैं की किसी की परेशानियों से तो लेना-देना ही नहीं रहा...खा थोड़े ही न रहा हूँ...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 51 By Lata Agrawal

“व्शी ....!!! जानेमन ! अकेले- अकेले कहाँ चल दीं ...हमसे कहा होता ...संग चल देते ” कराटे क्लास से घर जा रही प्रतिभा को सुनसान रास्ते में कुछ मनचलों ने रोक लिया सीटी बजाते हुए वे...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 49 By VIRENDER VEER MEHTA

'इस समय कौन आ सकता है?' डोर-बेल की आवाज पर सोचते हुए निशि ने दरवाजा खोला, सामने रवि था। वर्षों बाद पति को देख वह समझ नही सकी कि वह क्या करे? खामोशी से रास्ता देते हुए अंदर...

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एक थी सीता - 7 By MB (Official)

नैवेयर की रानी मार्गराइट का रचनाकाल सोलहवीं शताब्दी का मध्य माना गया है। अपने मित्रों के बीच कहानियाँ सुनने-सुनाने का उसे बहुत शौक था। उसके कहानी-संग्रह ‘हेप्टामेरॉन’ को ‘फ्रेंच डे...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 48 By Vijayanand Singh

आपलोग सूट में देखना चाहेंगे या साड़ी में ? लड़की के पिता ने निरीह भाव से लड़के के पिता से पूछा। वे लोग आज शगुन को देखने आए हुए थे।
शगुन ऊब गयी थी अपनी बार-बार की इस नुमाइश से।वह सो...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 47 By Sushma Gupta

तुम्हें क्या लगता है, आज वो आऐगा ?
रास्ते की तरफ खुलती खिड़की ने घर की बैठक के दरवाज़े से पूछा।
हाँ, आज वो जरूर आऐगा ।
तुम्हे इतना यकीन कैसे है?
पाँच दशक से देख रहा हूँ,...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 46 By Surinder Kaur

इलाहाबाद से रांची के लिए खुली ट्रेन तेज गति से आगे की ओर भाग रही थी। खिड़की से बाहर देख रहे पांडे जी के दिमाग का पहिया बाहरी दृश्यों के साथ- साथ पीछे की ओर जाने लगा।सीट पर साथ में...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 45 By SURENDRA ARORA

शंकर के तबादले की खबर आग की तरह सारे दफ्तर में फ़ैल गयी. शंकर, साहब की आँख की किरकिरी था. वह अकेले दम साहब के पक्षपाती, दमनकारी और गैरकानूनी कामों का विरोध करता था.

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स्वाभिमान - लघुकथा - 44 By Sunita Tyagi

काफी देर से बिस्तर पर लेटे हुए वे दोनों गहन चिंता में डूबे हुए एकटक छत की ओर ताक रहे थे ।
सुनो जी !आपकी फैक्ट्री में हड़ताल कब तक चलेगी । देखो ना तीन महीने हो गये पगार मिले हुए ।...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 43 By Shobha Rastogi

“सुनो ! तुम मुझे तुम्हारे वियोग के गहरे अहसास में अर्धचेतन-सा छोड़ गए थे। अपना जीवन स्वाहा करने की मंशा लिए मैंने जाना कि नवांकुर फूट गया है। तब से अब तक पल-पल, क्षण क्षण तुम्हे नैन...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 42 By Seema Shivhare suman

आप यहां! अब यहां क्या लेने आए हो? पूरे दो साल हो गए अपनी जिंदगी और दिल से निकाले हुए, क्या देखने आए हो? जिंदा हूं ! या मर गई हूं! या अपनी रखेल के लिए कुछ मांगने आए हो। दो साल से मय...

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सम्बोधन By Krishna manu

आज वह तीन दिनो से चल रहे 'चैट चैट' के खेल का अंत कर देना चाहता था। बहुत हुआ मजाक। उसकी सोच दो दिनो पूर्व की घटना पर केंद्रित हो गई। उस दिन भी रात कुछ गहरी हो चली थी। वह ए...

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भय भूख और भ्रष्टाचार को मुद्दा बना कर चुनाव लड़ रही पार्टी के मुखिया वातानुकूलित मंच से भाषण झाड़ रहे थे और चिलमिलाती धुप में पसीना पोंछते हुवे सोच में डूबा था की काली वर्दीधारी दर्...

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उसकी मौत By Ashok Pruthi Matwala

सहसा, सभा में मौजूद एक सज्जन ने मौत का कारण जानते हुये भी अपने पास बैठे दूसरे सज्जन से औपचारिकतावश अपनी सहानुभूति दर्शाते हुये वार्तालाप शुरू किया, वाकई ही बड़ा ज़ुल्म हुआ है भाई सा...

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प्रकृति मैम By Prabodh Kumar Govil

अरे सर, रुटना रुटना ...अविनाश दौड़ता-चिल्लाता आया।
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पाकिस्तान के मुसलमान किसी भी हिन्दू को जिंदा नहीं छोड़ रहे थे, बच्चों और बूढ़ों को निर्दयता से मार रहे थे, जवान औरतों के साथ समूहिक बलात्कार करके उनको बड़े ही घिनौने ढंग से मौत के घाट...

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सच्चा इंसान By Nagendra Dutt Sharma

यह कोई उस समय की बात है जब मैं नवी कक्षा का छात्र था। किराये के जिस मकान में हम रहते थे वहाँ से मेरा स्कूल कोई डेढ़-दो किलोमीटर की दूरी पर था। स्कूल उस समय ज्यादातर विद्यार्थी पैदल...

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एक अपवित्र रात - 7 By MB (Official)

पिकारेस्क नॉबेल का जनक और स्पेन का सर्वाधिक प्रतिभाशाली कथाकार सर्वाण्टीज़ (1547-1616) जिन्दगी भर गरीबी और गुमनामी से जूझता रहा। अपने जमाने को समझने में सर्वाण्टीज़ किस कदर सफल रहा...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 56 By Upasna Siag

जब से बहेलिये ने चिड़िया को अपना कर देख भाल करने का फैसला किया है तभी से चिड़िया सहमी हुई तो थी ही, लेकिन में विचारमग्न भी थी । वह कैसे भूल जाती बहेलिये का अत्याचार - दुराचार । उ...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 55 By Nisha chandra

क्या करे अनी, समझ नहीं पा रही है ।क्या पापा से मर्सिडिज के लिए बोल दे या हमेशा के लिए समीर को छोड़कर पिता के घर चली जाये। इकलौती सन्तान है और करोड़ो की वारिस, पिता से कहकर मर्सिडिज...

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मां कितने जतन से अपने बच्चों को पालपोस कर बड़ा करती हैं। वो चाहे अकेली हो या परिवार के साथ पर वो अपने बच्चों को परवरिश देती हैं ,पर क्या बच्चे अपनी एक माँ को ढंग से रख पाते हैं वो प...

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डरहम ने धीरे से हुआंग चाउ के ट्रेज़र हाउस की छत की जाली हटाई। वह किसी तरह के जाल और खतरों के लिए तैयार था। कोई भी सयाना व्यक्ति, उसके - डरहम के मजबूरी में पीछे छोड़े गए प्रमाणों को द...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 54 By Krishanlata Yadav

नौकर के रूप में काम पाने आए युवक से नियोक्ता ने प्रश्न किया, ‘तुम्हारा नाम ?’
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‘दीनदयाल यानी दीनू ?’
‘दीनू नहीं, सर, दीनदयाल।’
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स्वाभिमान - लघुकथा - 53 By Asha sharma

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“क्या भाई साहब आपके लिए रिश्तों से बढकर पैसा हो गया? कैसा जमाना आ गया है. सब अपने स्वार्थ में ऐसे डूबे हैं की किसी की परेशानियों से तो लेना-देना ही नहीं रहा...खा थोड़े ही न रहा हूँ...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 51 By Lata Agrawal

“व्शी ....!!! जानेमन ! अकेले- अकेले कहाँ चल दीं ...हमसे कहा होता ...संग चल देते ” कराटे क्लास से घर जा रही प्रतिभा को सुनसान रास्ते में कुछ मनचलों ने रोक लिया सीटी बजाते हुए वे...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 49 By VIRENDER VEER MEHTA

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तुम्हें क्या लगता है, आज वो आऐगा ?
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इलाहाबाद से रांची के लिए खुली ट्रेन तेज गति से आगे की ओर भाग रही थी। खिड़की से बाहर देख रहे पांडे जी के दिमाग का पहिया बाहरी दृश्यों के साथ- साथ पीछे की ओर जाने लगा।सीट पर साथ में...

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स्वाभिमान - लघुकथा - 45 By SURENDRA ARORA

शंकर के तबादले की खबर आग की तरह सारे दफ्तर में फ़ैल गयी. शंकर, साहब की आँख की किरकिरी था. वह अकेले दम साहब के पक्षपाती, दमनकारी और गैरकानूनी कामों का विरोध करता था.

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काफी देर से बिस्तर पर लेटे हुए वे दोनों गहन चिंता में डूबे हुए एकटक छत की ओर ताक रहे थे ।
सुनो जी !आपकी फैक्ट्री में हड़ताल कब तक चलेगी । देखो ना तीन महीने हो गये पगार मिले हुए ।...

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“सुनो ! तुम मुझे तुम्हारे वियोग के गहरे अहसास में अर्धचेतन-सा छोड़ गए थे। अपना जीवन स्वाहा करने की मंशा लिए मैंने जाना कि नवांकुर फूट गया है। तब से अब तक पल-पल, क्षण क्षण तुम्हे नैन...

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आप यहां! अब यहां क्या लेने आए हो? पूरे दो साल हो गए अपनी जिंदगी और दिल से निकाले हुए, क्या देखने आए हो? जिंदा हूं ! या मर गई हूं! या अपनी रखेल के लिए कुछ मांगने आए हो। दो साल से मय...

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