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मेरे हिस्से की धूप By Zakia Zubairi

मेरे हिस्से की धूप ज़किया ज़ुबैरी (1) गरमी और उस पर बला की उमस! कपड़े जैसे शरीर से चिपके जा रहे थे। शम्मों उन कपड़ों को संभाल कर शरीर से अलग करती, कहीं पसीने की तेज़ी से गल न जाएँ।...

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निर्वाण By Jaishree Roy

निर्वाण (1) 15 अगस्त, 2016 आमफावा फ्लोटिंग मार्केट की सीढ़ियों पर उस दिन हम देर तक बैठे रहे थे। हम यानी मैं और माया- माया मोंत्री! बिना अधिक बात किए। दिसंबर की यह एक धूप नहायी सुबह...

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हर्ज़ाना By Anjali Deshpande

हर्ज़ाना अंजली देशपांडे (1) घंटी बजी, नौकर ने दरवाज़ा खोला और वापस आकर कहा, “चार लोग हैं साब.” उनके चेहरे की हर झुर्री प्रफुल्लित हो उभर आई. वे इतनी तत्परता से उठे कि रीढ़ ने प्रतिवाद...

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उधड़ा हुआ स्वेटर By Sudha Arora

उधड़ा हुआ स्वेटर सुधा अरोड़ा (1) यों तो उस पार्क को लवर्स पार्क कहा जाता था पर उसमें टहलने वाले ज्यादातर लोगों की गिनती वरिष्ठ नागरिकों में की जा सकती थी. युवाओं में अलस्सुबह उठने, ज...

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बिद्दा बुआ By Roop Singh Chandel

बिद्दा बुआ (1) आवाज बुआ की ही थी, जिन्हें सारा गांव बिद्दा बुआ कहकर पुकारता है "उठो भाइयो भोर भया, कुछ काम करो मत सोओ तुम. जो सोवत है सो खोवत है, जो जागत है सो पावत है." पूरे छः मह...

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बेचारी ईडियट... ! By Zakia Zubairi

बेचारी ईडियट... ! ज़किया ज़ुबैरी (1) लाल पीली और नीली रौशनियाँ... गोल गोल छोटे बड़े रंगीन शीशे के चहुं ओर लटकते हुए कुमकुमे... कमरे में बैठे सभी पुरुषों एवं महिलाओं के जीवट ठहाके......

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पी.के. By Roop Singh Chandel

पी.के. (1) बालभवन के पास चाय की दुकान पर वह मित्र के साथ चाय पी रहा था. उनके हाथों में चाय के छोटे गिलास थे और वे दुकान और सड़क के बीच दुकान के निकट ही बातों में मशगूल थे. लंबे समय...

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उजाले की ओर By Jaishree Roy

उजाले की ओर जयश्री रॉय (1) दोपहर का धूल भरा आकाश इस समय पीला दिख रहा है। सूरज एकदम माथे पर- एक फैलता-सिकुड़ता हुआ बड़ा-सा सफेद धब्बा! हवा अब रह-रह कर आंच देने लगी है! रूना चेहरे पर द...

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गिनी पिग्स By Neelam Kulshreshtha

गिनी पिग्स नीलम कुलश्रेष्ठ (1) [ आजकल सारा विश्व कोरोना वायरस के भय से आक्रांत है। सारे विश्व के वैज्ञानिक प्रयोगशाला में इसे ठीक करने की दवाई व वैक्सीनेशन खोज रहे हैं। ये दवाइयां...

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बाबुल मोरा... By Zakia Zubairi

बाबुल मोरा.... ज़किया ज़ुबैरी (1) “मां मैने कह दिया, मैं यह घर नहीं छोड़ूंगी।” “क्यों नहीं छोड़ेगी और कैसे नहीं छोड़ेगी..?” “क्योंकि यह मेरा भी घर है।” “यह किसने कह दिया तुझ से..?”...

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मेरे हिस्से की धूप By Zakia Zubairi

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निर्वाण By Jaishree Roy

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हर्ज़ाना By Anjali Deshpande

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उधड़ा हुआ स्वेटर By Sudha Arora

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बिद्दा बुआ By Roop Singh Chandel

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उजाले की ओर By Jaishree Roy

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