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  • मेरी अलग दुनिया

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भीड़ में By Roop Singh Chandel

भीड़ में (1) सुनकर चेहरा खिल उठा था उनका. उम्र से संघर्ष करती झुर्रियों की लकीरें भाग्य रेखाओं की भांति उभर आई थीं. आंखें प्रह्लाद पर टिकाकर पूछा, “कहां तय की लल्लू ने शादी?” “आपको...

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अँधेरे का गणित By PANKAJ SUBEER

अँधेरे का गणित (कहानी पंकज सुबीर) (1) मुँबई जैसे महानगर में जहाँ लोकल ट्रेनें सुबह, दोपहर, शामें अपनी पीठ पर ढोती हैं। वो भला क्या कर रहा है? आईना उससे झूठ बोलता है या सच, कुछ पता...

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किस्मत. By Anil Sainger

मैं रोज की तरह मेट्रो स्टेशन अभी पहुंचा ही था कि सामने से मेट्रो आती दिखी | मैंने जल्दी से अपने कानों में इयरफोन ठूंसा और ट्रेन का दरवाज़ा खुलते ही डब्बे में घुस गया | किस्मत अच्छी...

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मैं वही हूँ! By Jaishree Roy

मैं वही हूँ! (1) मैं नया था यहाँ। नई-नई नौकरी ले कर आया था। इलाके की सभी पुरानी और ऐतिहासिक इमारतों की देख-रेख और मरम्मत की ज़िम्मेदारी थी मुझ पर। काम आसान तो नहीं था मगर मुझे पसंद...

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एबॉन्डेण्ड By Pradeep Shrivastava

एबॉन्डेण्ड - प्रदीप श्रीवास्तव भाग 1 इसे आप कहानी के रूप में पढ़ रहे हैं, लेकिन यह एक ऐसी घटना है जिसका मैं स्वयं प्रत्यक्षदर्शी रहा हूं। चाहें तो आप इसे एक रोचक रिपोर्ट भी कह सकते...

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पौधे से कहो, मेरे जन्मदिन पर फूल दे By Neela Prasad

पौधे से कहो, मेरे जन्मदिन पर फूल दे नीला प्रसाद (1) वह सुबह से अपने कमरे में लैपटॉप पर व्यस्त है. मुझसे बात करने भी नहीं आ रही. कोई उदास करने वाली बेचैनी मुझे अपनी गिरफ्त में लेती...

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लौट आओ तुम... ! By Zakia Zubairi

लौट आओ तुम... ! ज़किया ज़ुबैरी (1) “बीबी... ! कहाँ हैं आप... !” ''मैं नीचे हूं आपा... ड्राइंग रूम में।'' “क्या कर रही होगी...शायद... सफ़ाई कर रही होगी...! ” आपा ने...

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ब्याह ??? By Vandana Gupta

ब्याह ??? (1) “नैन नक्श तो बडे कंटीले हैं साफ़ सुथरे दिल को चीरने वाले गर जुबान पर भी नियन्त्रण होता तो क्या जरूरत थी फिर से सेज चढने की ।“ “ हाय हाय ! जीजी ये क्या कह दिया ? जो कह...

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एक जुलूस के साथ – साथ By Neela Prasad

एक जुलूस के साथ – साथ नीला प्रसाद (1) होटल के डाइनिंग हॉल में दो कोनों पर खड़े हमदोनों की नजरें अनायास मिल गईं। फिर उन नजरों के मिलन से बने पुल पर तेजी से बहती- तैरती, पिघली हुई याद...

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मेरे हिस्से की धूप By Zakia Zubairi

मेरे हिस्से की धूप ज़किया ज़ुबैरी (1) गरमी और उस पर बला की उमस! कपड़े जैसे शरीर से चिपके जा रहे थे। शम्मों उन कपड़ों को संभाल कर शरीर से अलग करती, कहीं पसीने की तेज़ी से गल न जाएँ।...

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