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कम्युनिकेशन स्किल्सबोलने की कला ही सफलता की सीढ़ी हैभाग – 1, 2 और 3️ लेखक : का...
" इधर-उधर घूमने के अलावा कभी घर के कामों पर भी ध्यान दे दिया कर, हमेशा घूमती रहत...
कागज की नावबरसात का महीना था। दिल्ली में पिछले 7 दिन से लगातार बारिश हो रही थी। ...
मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मेरा पूरा शरीर किसी भारी पत्थर के नीचे दब गया हो।मेरी पल...
सिया का सपनासिया स्कूल जाने के लिए घर से निकली ही थी कि अचानक जोर की बारिश शुरू...
पाँच वर्ष बीत गए थे।समय के बारे में सबसे विचित्र बात यही है,जिस दिन हम टूटते हैं...
# एपिसोड 5: जंजीरों की कैद और कर्मों की सजाविक्रम की चिता की आग अभी ठीक से ठंडी...
कमरे में एक घुटन भरा सन्नाटा था. बाहर हल्की- हल्की बारिश हो रही थी, पर कमरे के अ...
Mr. & Ms. FakeEpisode 14 – The Contract Secretअगली सुबह...सिंह हाउस में हमेशा की...
The Council of the Crownराजमहल...एल्डोरिया साम्राज्य का हृदय।संगमरमर के विशाल स्...
सांकल ज़किया ज़ुबैरी (1) क्या उसने अपने गिरने की कोई सीमा तय नहीं कर रखी? सीमा के आंसुओं ने भी बहने की सीमा तोड़ दी है...। इंकार कर दिया रुकने से....। आंसू बेतहाशा बहे जा रहे हैं.....
भीड़ में (1) सुनकर चेहरा खिल उठा था उनका. उम्र से संघर्ष करती झुर्रियों की लकीरें भाग्य रेखाओं की भांति उभर आई थीं. आंखें प्रह्लाद पर टिकाकर पूछा, “कहां तय की लल्लू ने शादी?” “आपको...
अँधेरे का गणित (कहानी पंकज सुबीर) (1) मुँबई जैसे महानगर में जहाँ लोकल ट्रेनें सुबह, दोपहर, शामें अपनी पीठ पर ढोती हैं। वो भला क्या कर रहा है? आईना उससे झूठ बोलता है या सच, कुछ पता...
मैं रोज की तरह मेट्रो स्टेशन अभी पहुंचा ही था कि सामने से मेट्रो आती दिखी | मैंने जल्दी से अपने कानों में इयरफोन ठूंसा और ट्रेन का दरवाज़ा खुलते ही डब्बे में घुस गया | किस्मत अच्छी...
मैं वही हूँ! (1) मैं नया था यहाँ। नई-नई नौकरी ले कर आया था। इलाके की सभी पुरानी और ऐतिहासिक इमारतों की देख-रेख और मरम्मत की ज़िम्मेदारी थी मुझ पर। काम आसान तो नहीं था मगर मुझे पसंद...
एबॉन्डेण्ड - प्रदीप श्रीवास्तव भाग 1 इसे आप कहानी के रूप में पढ़ रहे हैं, लेकिन यह एक ऐसी घटना है जिसका मैं स्वयं प्रत्यक्षदर्शी रहा हूं। चाहें तो आप इसे एक रोचक रिपोर्ट भी कह सकते...
पौधे से कहो, मेरे जन्मदिन पर फूल दे नीला प्रसाद (1) वह सुबह से अपने कमरे में लैपटॉप पर व्यस्त है. मुझसे बात करने भी नहीं आ रही. कोई उदास करने वाली बेचैनी मुझे अपनी गिरफ्त में लेती...
लौट आओ तुम... ! ज़किया ज़ुबैरी (1) “बीबी... ! कहाँ हैं आप... !” ''मैं नीचे हूं आपा... ड्राइंग रूम में।'' “क्या कर रही होगी...शायद... सफ़ाई कर रही होगी...! ” आपा ने...
ब्याह ??? (1) “नैन नक्श तो बडे कंटीले हैं साफ़ सुथरे दिल को चीरने वाले गर जुबान पर भी नियन्त्रण होता तो क्या जरूरत थी फिर से सेज चढने की ।“ “ हाय हाय ! जीजी ये क्या कह दिया ? जो कह...
एक जुलूस के साथ – साथ नीला प्रसाद (1) होटल के डाइनिंग हॉल में दो कोनों पर खड़े हमदोनों की नजरें अनायास मिल गईं। फिर उन नजरों के मिलन से बने पुल पर तेजी से बहती- तैरती, पिघली हुई याद...
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