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“शिकार की शुरुआत”बारिश पूरी रात होती रही।शिवपुर की सड़कों पर पानी जमा था।सुबह हो...
कमरे की सीलन भरी हवा में छत वाले पुराने पंखे की 'कटर-कटर' आवाज़ किसी उल्ट...
(भारी लोहे के दरवाज़े के खुलने की कर्कश आवाज़। जेल के गलियारे में कैदियों के फुस...
रावल जैत्र सिंह (1213-1253 ईसवी)रावल जैत्रसिंह का जीवन एवं कार्य तीन कारणों से व...
कहानी *चिड़चिड़ा*कभी-कभी सबको प्यार बाँटने वाला भी प्यार के लिए प्यासा रह जाता ह...
अभी सिया अपनी सिसकियों पर काबू पा ही रही थी कि फार्महाउस के गेट पर सायरन की गूँज...
"सुबह के 7:00 बजे थे। मुंबई के ए...
अध्याय 6ओसीडी से मुक्ति की पहली सीढ़ी “जागरूकता।”ओसीडी से मुक्ति की यात्रा की शु...
सुबह का ऑफिस हमेशा की तरह बिज़ी था…पर आज एक अनजाना-सा तनाव हवा में घुला हुआ था।क...
ऑफिस — सीनियर्स के केबिन के अंदर। तीनों सीनियर्स ज़मीन पर बेहोश पड़े हैं। बाकी क...
अहमदाबाद हाइवे, फोर लेन, speed के दीवानोकी भाषामें बोले तो इकदम मखखन रोड. और उसी ऱोड पर इक जगह बहुत भयानक turn आता हैं.accident होने का खतरा :इक धंटे में एक तो होता ही है. मानो अैस...
बचपन के दिन थे- चिंता से मुक्त और कौतूहल से भरे पाँवों के नीचे आसमान बिछ जाता। पंख उग आए..., पंखों को फैलाए हम नाना के आसमान में जाने को बेताब..., हम यानि मैं, माँ और छोटी, वैसे हम...
..... तो एक ठहरी जिद के तहत सुरजू ने निर्णय लिया और गांव में मुनादी पिटा दी.... भूकंप आ गया गांव में.....! गोया सुरजू ने पृथ्वी तल पर घुस कर धीरे से खिसका दी हो प्लेट...., गांव के...
तेलंगाना एक्सप्रेस लेट हो गई है। पौने दस बजे की जगह अब पौने बारह में चलेगी। मैं वेटिंग रूम में बैठा हुआ था। सहसा, एक चिर-परिचित चेहरे पर मेरी नज़र गई। क्षणांश में मैं जान पाया कि ये...
यह कहानी अनुरंजन की कैशोर्य कल्पनाशीलता की है। उसकी अनगढ़ता और दुःसाहस की है। एक ग्रामीण किशोर की अदम्य जिजीविषा भी है यहाँ। जाने क्या है इस कहानी में और जाने क्या नहीं है! कुछ भी ह...
‘‘सलोनी!’’ किवाड़ तो बन्द थे..., अन्दर कैसे घुस गई...! मैंने ही किये थे इन्हीं हथेलियों से .... तुम रोई थी... छटपटाई थी.... तड़फ कर कितना कुछ कह रही थी... आकुल तुम्हारी हिरनी आँखों...
नदी की उंगलियों के निशान हमारी पीठ पर थे। हमारे पीछे दौड़ रहा मगरमच्छ जबड़ा खोले निगलने को आतुर! बेतहाशा दौड़ रही पृथ्वी के ओर-छोर हम दो छोटी लड़कियाँ...! मौत के कितने चेहरे होते हैं अ...
क्षितीज पर सिन्दूरी सांझ उतर रही थी और अंतस में जमा हुआ बहुत कुछ जैसे पिघलता जा रहा था. मन में जाग रही नयी-नयी ऊष्मा से दिलों दिमाग पर जमी बर्फ अब पिघल रही थी. एक ठंडापन जो पसरा हु...
नंदलाल यादव दिल्ली में नौकरी करते हैं और साहिबाबाद में किराए के एक फ्लैट में रहते हैं। लोकल ट्रेन से आना-जाना करते हैं। आई.टी.ओ. पर उतर कर बस से आर.के.पुरम जाते हैं।सुबह शाम सप्ताह...
‘‘मुझे हवा के घूँट पीने हैं....’’ आवाज झमक कर चेतना में गिरती है... सफेद पिलपिले हाथों से चेहरा घुमाने लगा है बेताल - सीधे..... ‘‘लिजलिजे स्पृश के बोझ तले दबी मेरी गर्दन टीसने लगी...
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