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चाँदी का कंगनबरसों पुराने राजस्थान के एक छोटे-से कस्बे "चाँदपुर" में एक हवेली थी...
विष अमृत..."आज जाने की ज़िद ना करो, यूं ही पहलू में बैठे रहो।" कनु के स्वर की मध...
माई ने अमाया से कहा, "पिछली बार तोहफे में जो नई डिश (थाली/बर्तन) आई थीं, आज सबक...
Reincarnated as Villainess: The Man Who Hated Her Became Her Obsession वह एक ऐसी...
अंधेरी रात थी ... सब ओर नीरवता छाई थी ... रात के अशुभ पक्षी चीत्कार कर रहे थे .....
अचानक लग झटके साथ भावेश की तन्द्रा टूटी । वो लैण्ड कर चुके थे अहमदाबाद में । यहा...
मैं अभी भी वहीं बैठी थी। मन तो बाहर जाने का था, लेकिन मैंने खुद को रोक लिया था।...
हम अक्सर अपनी असफलताओं के लिए अपनी किस्मत या अपनी मेहनत को दोष देते हैं। लेकिन क...
शीर्षक - *देश के सच्चे नायक और हमारी खामोशी*क्या आप जानते हैं, सोनम वांगचुक जी...
Chapter:--4 scene:-1. सुशांत:--) लो पोहच ही गए. (सब गेस्ट हाउस के अंदर जाते...
रुको राजन ,क्या तुम अक्षरवंशिका के सम्राट अभय हो ?" "कौन हो तुम , ओर हमारे पथ में आकर हमें नाम से बुलाने का दंड जानते हो ?" "तुम्हारा क्रोध ही तुम्हारे निर्दोष...
ऋचा पैंसठ की हो चुकी, बच्चों के शादी-ब्याह --सब संपन्न ! तीसरी पीढ़ी भी बड़ी होने लगी पूरे -पूरे दिन लगी रहती सबकी फ़रमाइशें पूरी करने में बहुत आनंद मिलता उसे फिर बहुत सी बातें...
बहुत दिनो से सोच रहा था कि आज कल के रिश्तों में वो बात क्यूँ नहीं हैं जिस रिश्तों की कहानी मैं अपने पापा माँ या फिर दादादादी से सुनता था ...क्यों अब लोगों की रिश्ते निभाने की चाह स...
मुझे नही पता कि मै ये सब क्यूँ लिख रहा हूँ ! लेकिन दिल कह रहा है बस आखिरी बार ...बस एक बार । शायद इसीलिए मरना छोड़कर लिखने बैठ गया ।जी हाँ , मरना ! मै मरने जा रहा हूँ । पंखे...
रंग थे मेरे पास लेकिन… भाग 1हमारे जिंदगी में कुछ रंग इतने मायने रखते हैं कि जैसे वोही हमारे जीने का जरिया बन जाते हैं । है मेरी भी जिंदगी में ऐसे ही कुछ रंग थे,हा सही पढ़ा थे जो सिर...
1 - पानी 2 - भविष्य 3 - रोशनी
लाहौर से बाबू हरगोपाल आए तो हामिद घर का रहा ना घाट का। उन्हों ने आते ही हामिद से कहा। “लो भई फ़ौरन एक टैक्सी का बंद-ओ-बस्त करो।” हामिद ने कहा। “आप ज़रा तो आराम कर लीजिए। इतना लंबा सफ़...
मैं आज आप को चंद शिकारी औरतों के क़िस्से सुनाऊंगा। मेरा ख़याल है कि आप को भी कभी उन से वास्ता पड़ा होगा। मैं बंबई में था। फिल्मिस्तान से आम तौर पर बर्क़ी ट्रेन से छः बजे घर पहुंच जा...
दो तीन रोज़ से तय्यारे स्याह उक़ाबों की तरह पर फुलाए ख़ामोश फ़िज़ा में मंडला रहे थे। जैसे वो किसी शिकार की जुस्तुजू में हों सुर्ख़ आंधियां वक़तन फ़वक़तन किसी आने वाली ख़ूनी हादिसे का पैग़ाम...
सन इकत्तीस के शुरू होने में सिर्फ़ रात के चंद बरफ़ाए हुए घंटे बाक़ी थे। वो लिहाफ़ में सर्दी की शिद्दत के बाइस काँप रहा था। पतलून और कोट समेत लेटा था, लेकिन इस के बावजूद सर्दी की लहरें...
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