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हर सुबह एक नई शुरुआत लेकर आती है, लेकिन आर्य की ज़िंदगी में ऐसा नहीं था। जब उसकी...
हेलो दोस्तों, मैं आपकी कहानीकार काजल सोम। तो मैं आपको आज एक कहानी सुनाऊंगी शिवां...
कहानी बंटवारा "ममा ये कैसा खाना है?हमसे नहीं खाया जा रहा।" रीशु झुंझला कर कहा...
हर बड़ा इंसान, अपने अंदर एक छोटा बच्चा हमेशा संभाल कर रखता है। कान्हा की शख्सियत...
ऋगुवेद सूक्ति--(२७) की व्याख्या मन्त्र —“मा प्रगाम पथोवयम्” ऋग्वेद_ १०.५७.१भाव...
जब राजन ने कहा विदेशी युवतीयों के दाढ़ी और मूंछें वाले युवक बहुत पसंद आते हैं इत...
वेदांत 2.0 का 0–9 मॉडल एक ऐसा संरचनात्मक ढाँचा प्रस्तुत करता है जो साधारण दशमलव...
रुद्रा वहां से सिधा पि के के पास चला जाता है , पि के रुद्रा का बेसब्री से अंतजार...
अंतर्जगत का रूपांतरण और मांसाहार का सच: एक आध्यात्मिक व पर्यावरणवादी दृष्टिकोण ~...
श्री अंदर चली गई । हरि और श्री सोफे पर आ कर बैठ गए हरि ने लैपटॉप ओपन किया और श्र...
घंटाभर चलकर बस रुकती है। मैं और राणा हैरान-से होकर उतरते हैं कि यह भला कौन-सी जगह हुई। बिल्कुल अनजान-सी। सोचते हैं कि कंडक्टर ने हमें सही जगह ही उतारा होगा। वह जानता था कि हमें बाल...
ढोलक की थापों के साथ बन्ना घोड़ी गाने वाली का सुर भी तार-सप्तक नापने लगता था। बीच-बीच में कहीं सुर धीमा पड़ता तो नसीबन खाला की हाँक...अरे, सुबह कुछ खाया-पीया नहीं क्या लड़कियों...? बि...
घर में उत्सव जैसा माहौल था सभी के चेहरों पर उत्साह झलक रहा था बड़की चाची. रामपुर वाली चाची, पचरूखिया वाली चाची, सभी दोगहा में जा कर द्वार पर बैठे युवक को झाँक-झाँक देख कर निहाल...
चाँद किसी बदमाश बच्चे सा पेड़ की फुनगी पर जा टँगा था...गोल मटोल से चेहरे पर शरारती मुस्कान लिए हुए...जैसे अभी अभी लाद-फाँद कर कमरे में फेंक से दिए गए बंटी बाबू की हालत का पूरा मज़ा ल...
किशोर उपन्यास ‘खुशियों की आहट’ का सार यह कहानी है एक किशोर छात्र, मोहित,की। मोहित के मम्मी-पापा नौकरी करते हैं। पापा नौकरी करने के साथ - साथ बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाते हैं। मम्मी क...
कई दिनो से सोच रही हूँ, कोई कहानी लिखूँ। आप भी सोचेंगे, ये कहानी लिखने का आइडिया मेरे दिमाग़ में आया कहाँ से...? मैं ठहरी एक आम सी, सीधे-साधे ढंग से अपनी गृहस्थी चलाने वाली साधारण औ...
देश को आज़ाद कराना आसान नही था बहुत त्याग और संघर्ष के बाद इस देश को आज़ादी नसीब हुई। आजादी बेशकीमती थी क्योंकि लाखों लोगों ने इसे पाने के लिए बिना कुछ सोंचे समझें अपनी जान न्योछावर...
नर्स ने आकर मुझे झकझोरा तो सहसा मैं जैसे एक बहुत गहरे कुऍ से बाहर आई। दो पल को तो समझ ही नहीं आया, मैं हूँ कहाँ...फिर एक झटके से सब साफ़ हो गया...। मैं माँ के साथ थी...इंटेन्सिव केय...
अमिता फूट फूट कर रो रही थी अब उसे अपने किये पर पश्चाताप हो रहा था शायद उसे उन बुजुर्गों की हाय लगी थी जिसे रोता बिलखता वह छोड़ आई थी कितना रोका था उन लोगों ने पर उसने उनकी एक...
आज पूरे बारह साल बाद इस कमरे के उस खुले हिस्से पर बैठी हूँ, जिसके लिए बरसों बाद भी कोई सही शब्द नहीं खोज पाई...। कुछ-कुछ छज्जे जैसा, पर छज्जा तो बिलकुल नहीं था वो...। छज्जे में तो...
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