Moral Stories Books and Novels are free to read and download

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यादों के झरोखों से-निश्छल प्रेम By Asha Saraswat

छोटे-छोटे बल्बों की झालरों से घर और दरवाज़े झिलमिला रहे थे ।जैसे हर नन्हा बल्ब दुल्हन की ख़ुशी का इज़हार कर रहा हो।मैं उन्हें निहारकर उनमें अपनी मॉं के हंसते मुस्कुराते चेहरे को मह...

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जहाँ ईश्वर नहीं था By Gopal Mathur

गोपाल माथुर 1 आँख कुछ देर से खुली. बाहर सुबह जैसा कुछ भी नहीं लगा, हालांकि सूरज निकल चुका था, पर वह घने बादलों के पीछे कैद था. बारिश बादलों में लौट गईं थीं और हवाएँ भी थक कर पेड़ों...

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भारत के गावों में स्वतंत्रा संग्राम By Brijmohan sharma

यह लघु उपन्यास ग्रामीण भारत में स्वतंत्रता व गांधीजी के आन्दोलन के प्रति अलख जगाने की लोमहर्षक अनकही दस्तान है I

२ स्वतत्रता सेनानी द्वारा हरिजन उत्थान का प्रयास करने पर जाति वा...

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अनमोल सौगात By Ratna Raidani

"मम्मी मम्मी!" पवित्रा ने घर में घुसते हुए उत्साह से आवाज़ लगायी। किन्तु उसे घर का वातावरण कुछ बोझिल सा महसूस हुआ। मुकेश हमेशा की तरह टी.वी. पर घटिया और साजिशों से भरे पारिव...

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मेरा पति तेरा पति By Jitendra Shivhare

आधी रात में दरवाजे की बैल बज उठी।

स्वाति ने कमलेश को जगाया।

"सुनो! उठो! देखो बाहर कोई आया है।"

"इतनी रात में कौन आया होगा।" कमलेश ने उंगलियों से आंख मलते ह...

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एक यात्रा समानान्तर By Gopal Mathur

वह घिसटने लगती है. सारा थकान हमेशा पाँवों में ही क्यों उतर आती है ? कन्धे पर लटका छोटा सा बैग भी बोझ लगने लगता है. थकान.... टूटन...... भीतर ही भीतर कुछ घुटने लगता है.

वह व्यर्थ...

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अजीब दास्तां है ये.. By Ashish Kumar Trivedi

शारदा हाउसिंग सोसाइटी में आज की सुबह भी वैसी थी जैसे रोज़ होती थी। अखबार वाले, दूध, अंडा और ब्रेड सप्लाई करने वाले सोसाइटी में प्रवेश कर रहे थे।

लगभग हर फ्लैट में स्कूल जाने वाल...

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कोड़ियाँ - कंचे By Manju Mahima

राजस्थान के हाड़ौती क्षेत्र में बूंदी से कुछ ही (41) किलोमीटर दूर जहाजपुर गाँव की हवेली में बना पोलिटेक्निक कॉलेज के सभी छात्र मुख्य द्वार बनाने की तैयारी में लगे थे, दोनों ओर स्तम्...

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आखिर कब तक By Heena_Pathan

नमस्कार पाठक मित्रों आज हम आपको आखिर कब तक होने वाली प्रथाओं के बारे में बताएंगे यह प्रथा सदियों से चली आ रही है आज भले ही देश और दुनिया इतनी विकसित हो गई हो फिर भी प्रथाएं 2020 मे...

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बेनज़ीर - दरिया किनारे का ख्वाब By Pradeep Shrivastava

भाग -१ काशी नगरी के पॉश एरिया में उनका अत्याधुनिक खूबसूरत मकान है। जिसके पोर्च में उन की बड़ी सी लग्जरी कार खड़ी होती है। एक छोटा गार्डेन नीचे है, तो उससे बड़ा पहले फ्लोर पर है। जहां...

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यादों के झरोखों से-निश्छल प्रेम By Asha Saraswat

छोटे-छोटे बल्बों की झालरों से घर और दरवाज़े झिलमिला रहे थे ।जैसे हर नन्हा बल्ब दुल्हन की ख़ुशी का इज़हार कर रहा हो।मैं उन्हें निहारकर उनमें अपनी मॉं के हंसते मुस्कुराते चेहरे को मह...

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वह घिसटने लगती है. सारा थकान हमेशा पाँवों में ही क्यों उतर आती है ? कन्धे पर लटका छोटा सा बैग भी बोझ लगने लगता है. थकान.... टूटन...... भीतर ही भीतर कुछ घुटने लगता है.

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