सामाजिक कहानियां कहानियाँ पढ़े और PDF में डाउनलोड करे

Stories and books have been a fundamental part of human culture since the dawn of civilization, acting as a powerful tool for communication, education, and entertainment. Whether told around a campfire, written in ancient texts, or shared through modern media, Moral Stories in hindi books and stories have the unique ability to transcend time and space, connecting people across generations and cult...Read More


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वीर छत्रपति संभाजी महाराज से जुड़ी कुछ बातें By Maha Dev

भारत को वीरों की भूमि ऐसे ही नहीं कहते, यहां पर ना जाने कितने वीर पुरुष और महिलाएं हुई हैं जिन्होंने अपने धर्म और कर्म को बचाने के लिए अपने प्राण भी न्यौछावर कर दिए। उन्हीं वीरों म...

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अदृश्य हमसफ़र - 22 By Vinay Panwar

कमरे में गहन शांति का वास हो गया था। इतनी की सुई भी गिरती तो उसकी भी आवाज सुनाई देती।
दोनो ही अपनी अपनी मानसिक यायावरी में उलझते जा रहे थे। अनुराग अभी भी अपने मन की बातें कहने में...

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दस दरवाज़े - 10 By Subhash Neerav

बैटरसी, लंदन का महत्वपूर्ण इलाका है। यहाँ बड़े-बड़े दफ़्तर है, स्टोर हैं और दुनिया के खूबसूरत फूलों वाला पॉर्क भी है। बैटरसी के इलाके की स्विंग रोड भी काफ़ी प्रसिद्ध है। यह एक तरफ दरिय...

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कुंजड़-कसाई By Anwar Suhail

'कुंजड़-कसाइयों को तमीज कहाँ... तमीज का ठेका तो तुम्हारे सैयदों ने जो ले रक्खा है?' मुहम्मद लतीफ कुरैशी उर्फ एम एल कुरैशी बहुत कम बोला करते। कभी बोलते भी तो कफन फाड़कर बोलते। ऐसे क...

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दूसरा हनीमून By r k lal

"दूसरा हनीमून" आर 0 के 0 लाल भले ही यह मेरा पुनर्विवाह है, मगर शादी की तैयारी ठीक पहले वाली की तरह की जा रही थी। कभी सोचा ही न था कि दुबारा ये सब करना होगा। पहली शादी के समय...

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सिर्फ हमारे लिए By Dr. Vandana Gupta

आज भी वही फूलों की खुशबू, नीली रोशनी और उसी छः बाई छः के बेड पर हम दोनों, बीच में पसरी खामोशी.. सब कुछ वैसा ही, पैंतीस साल पहले की तरह... तब अनछुए अहसासों को छूने का प्रयास क...

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और,, सिद्धार्थ बैरागी हो गया - 2 By Meena Pathak

ताप आज फिर बढ़ने लगा था..देह बथ रहा था पर आज कोई उसकी सुध लेने वाला नहीं था, वह जानती थी करवट बदल कर सोने की कोशिश करती है बगीचे में सियार की हूँआ-हूँआ रात के सन्नाटे को चीरती ह...

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कुछ आवाज़ें मरती नहीं By प्रियंका गुप्ता

मैं मरने वाली थी...आज नहीं तो कल, पर मेरा मरना तय था...। मरूँगी कैसे, ये भी पता था मुझे...। कितनी अजीब बात थी न...जिसकी ज़िन्दगी के खज़ाने का खात्मा होने वाला था, जिसकी पूँजी थी, उसे...

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फोन की घंटी - 2 By Saroj Prajapati

रात के खाने की तैयारी कर ही रही थी कि फोन की घंटी बज उठी। मैं बिना फोन देखे ही समझ गई कि पापा का होगा । तभी बेटा चिल्लाया " मम्मी नाना जी का फोन है ।" मैंने उसे कहा तुम रिसीव करो ज...

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काले कवर की डायरी और एक नाम By प्रियंका गुप्ता

हम उसी शाम मिले थे...। बहुत सारी उदास शामों की तरह वो भी तो एक अटपटी सी शाम थी...और पता नहीं क्यों उस दिन लाल बाग जाने का इरादा त्याग कर मैं सैंकी टैंक आ गया था...। वहाँ किनारे लगी...

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पश्चाताप By Sarvesh Saxena

अभी कुछ ही देर हुई थी दीपक को घर से गए कि सुमन ने फिर से बूढ़ी सास पर तंज कसा, "बेटा चला गया ना, तो अब तुझे कहना पड़ेगा, तीन दिन तो आराम फरमा लिया" यह कहते हुए सुमन, सास के आगे कपड...

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Yatharth Ki Jhadiyan By Yogesh Kanava

रात का सन्नाटा पसरा था । एकदम शान्त माहोल, घड़ी की टिक टिक के अलावा कुछ भी आवाज़ नहीं, बस यूं समझिए कि घड़ी मुस्तैदी से अपनी ड््यूटी पर तैनात है सैकण्ड दर सैकण्ड अपना चक्कर पूरा करती,...

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देशी दारू की भठ्ठी - 2 By shekhar kharadi Idriya

अब बाबू की पत्नी चूपचाप दबे पांव घर की ओर हड़बड़ी में वापस लौट गई, क्योंकि बाबू खाट में बिमार पड़ा था । जो अब जोर जोर से खांस रहा था, तभी उसकी जोरू मटकी पास जाकर कहती है " एक लोटा...

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भूमिजा - 2 By Meena Pathak

फुलमतिया उर्मिला देवी की खास परजा थी वह लगभग रोज ही आती और घर के अनेक छोटे बड़े कार्यों के साथ उनकी सेवा भी कर जाती बदले में ढेरों इनाम ले जाती
भूधर राय के पास अपार संपत्ति तो...

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कलर-ब्लाइण्ड By प्रियंका गुप्ता

वह कलर-ब्लाइण्ड था। आम भाषा में कहा जाए तो वह रंगों को ठीक से पहचान नहीं पाता था...खास तौर से लाल और हरे में अन्तर करना उसके लिए मुश्किल था...लगभग नामुमकिन...। उसे तो सावन का अन्धा...

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अब वो खुश हैं... By प्रियंका गुप्ता

रसोई में बर्तनों की खटर-पटर से नीला की आँख खुल गई। बगल में रखी अलार्म-घड़ी देखी तो हड़बड़ा कर उठ गई...ओ माँ! आज साढ़े छः बजे तक सोती रह गई...। ये अलार्म क्यों नहीं बजा...? पर ये सब सोच...

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साली पर नजर By r k lal

“साली पर नजर” आर0 के0 लाल घर में शादी का माहौल था सौम्या की दीदी की शादी थी इसलिए उसकी कई सहेलियां आई थी। रात में गाना बजाना चल रहा था और सौम्या का डांस भी। सभी सहेलियों...

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जिगोलो By Neelam Samnani

रात जैसे जैसे आगे चलकर वक्त को अपने पहलू से बांधती है वैसे ही और भी काली होती जाती है रात की सबसे बडा हुनर यही है की वक्त को बदलने वाली रेंगती सुई पर घिसकर और काला होना । काली रा...

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दंश. By Asha Pandey Author

सनेही के हाथ से मशीन का हत्था (हैन्डिल) आज फिसल-फिसल जा रहा है । ऐसा तो पहले दिन भी नहीं हुआ था जब बड़े साहब ने उसे मशीन का हत्था हाथ में पकड़ा कर घास काटना सिखाया था । पहली मर्तबा म...

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अपना अपना हिस्सा By Ajay Kumar Awasthi

तकरीबन 50 साल पहले वो इलाका शहर का बाहरी भाग था,जहाँ के रहवासी प्रायः खेतिहर मजदूर थे या फिर कुछेक के पास बहुत थोड़ी जमीन थी,जिसमे वे खेती किया करते थे .उनका रहन सहन ठेठ देहाती थ...

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OUT OF CONTROL - 6 By Raaj

( पिछली कहानी मैं देखा कि एक चमकता दरवाजा जेरी के सामने आया । उनमेसे सात फीट लंबे दो इंसान बाहर आये उन्होंने जेरी को उठाया और दरवाजे मैं वापस चले गए । अब आगे ।)...

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विज्ञापन से प्रताड़ित By r k lal

“विज्ञापन से प्रताड़ित” आर 0 के 0 लाल संजीव अपनी पत्नी के साथ हर्ष के घर मिलने गए थे। उन्हें आश्चर्य हुआ जब हर्ष की टी वी ऑफ मिली। उन्होंने पूंछा – “अभी हाल में ही तो अपने यह बड़ी इ...

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सबूत By Pranav Vishvas

मै गहरी नींद में सो रहा था और रोज़ की तरह अमित आया और चिल्लाया उठ जा भाई आर्डर आ गया है तेरी पोस्टिंग LOC पर हो गयी है, मेरी नज़र टेबल तो रखी मेरी रिस्ट वाच पर गई, देखा 5:16 बज रहे ह...

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क़सूर ? By zeba Praveen

आज एक अजीब सी उदासी छायी थी रामु के चेहरे पर, कल उसकी बेटी के ससुराल से फ़ोन आया था, यह याद दिलाने के लिए कि दहेज़ का पचास हजार अभी देना बाकी हैं | शादी के एक साल होने वाले थे, रामु...

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असली आज़ादी वाली आज़ादी - (भाग-7) By devendra kushwaha

भाग -6 से आगे- मैंने शैलेन्द्र की उत्सुकता को देखते हुए ये तो समझ ही लिया कि शैलेन्द्र बिना पूरी कहानी जाने मानेगा नहीं और वैसे भी अपनी बहन के बारे में जानने का हक़ है उसे पर मैं सि...

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जंगल By Asha Pandey Author

ये कहानी तब की है, जब उसे जंगल में जाकर प्रत्यक्ष शेर, चीता, भालू देखने का शौक उपजा था शहर के किनारे एक होटल था। वह उसी होटल में काम करता था।
जंगल का रास्ता उसी होटल के सामने से...

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स्वचालित वाहनों के सामाजिक और आर्थिक प्रभाव By Utpal Chakraborty

स्वचालित वाहनों के सामाजिक और आर्थिक प्रभाव मूल लेखक - उत्पल चक्रबोर्ती हिंदी सह लेखक - रोहित शर्मा स्वचालित वाहन निस्संदेह दुनिया का भविष्य हैं, लेकिन यह प्रश्न अभी भी बना हुआ...

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उलझते धागे By Asha Pandey Author

ट्रेन छूटने में पन्द्रह मिनट का समय अब भी बाकी है। मैं खिड़की की ओर पीठ टिकाकर बैठी हूँ।
‘‘आ ऽ ई – ओ ऽ ऽ आई, दो ऽ न ऽ ऽ कुछ खाने को‘‘ कहते हुए किसी ने मेरी पीठ को हल्के से ठोंक दिय...

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बाबू By Abhishek Hada

कहानी: बाबू वो दिखने में सीधा साधा था लेकिन मस्ती करने में शैतान का दादा। बेशर्म इतना की कोई कितना ही टोका-टाकी करे उस चिकने घड़े पर कोई असर ना होता था। पर जब भी कोई उसे बाबू कहता त...

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वीर छत्रपति संभाजी महाराज से जुड़ी कुछ बातें By Maha Dev

भारत को वीरों की भूमि ऐसे ही नहीं कहते, यहां पर ना जाने कितने वीर पुरुष और महिलाएं हुई हैं जिन्होंने अपने धर्म और कर्म को बचाने के लिए अपने प्राण भी न्यौछावर कर दिए। उन्हीं वीरों म...

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अदृश्य हमसफ़र - 22 By Vinay Panwar

कमरे में गहन शांति का वास हो गया था। इतनी की सुई भी गिरती तो उसकी भी आवाज सुनाई देती।
दोनो ही अपनी अपनी मानसिक यायावरी में उलझते जा रहे थे। अनुराग अभी भी अपने मन की बातें कहने में...

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दस दरवाज़े - 10 By Subhash Neerav

बैटरसी, लंदन का महत्वपूर्ण इलाका है। यहाँ बड़े-बड़े दफ़्तर है, स्टोर हैं और दुनिया के खूबसूरत फूलों वाला पॉर्क भी है। बैटरसी के इलाके की स्विंग रोड भी काफ़ी प्रसिद्ध है। यह एक तरफ दरिय...

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कुंजड़-कसाई By Anwar Suhail

'कुंजड़-कसाइयों को तमीज कहाँ... तमीज का ठेका तो तुम्हारे सैयदों ने जो ले रक्खा है?' मुहम्मद लतीफ कुरैशी उर्फ एम एल कुरैशी बहुत कम बोला करते। कभी बोलते भी तो कफन फाड़कर बोलते। ऐसे क...

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दूसरा हनीमून By r k lal

"दूसरा हनीमून" आर 0 के 0 लाल भले ही यह मेरा पुनर्विवाह है, मगर शादी की तैयारी ठीक पहले वाली की तरह की जा रही थी। कभी सोचा ही न था कि दुबारा ये सब करना होगा। पहली शादी के समय...

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सिर्फ हमारे लिए By Dr. Vandana Gupta

आज भी वही फूलों की खुशबू, नीली रोशनी और उसी छः बाई छः के बेड पर हम दोनों, बीच में पसरी खामोशी.. सब कुछ वैसा ही, पैंतीस साल पहले की तरह... तब अनछुए अहसासों को छूने का प्रयास क...

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और,, सिद्धार्थ बैरागी हो गया - 2 By Meena Pathak

ताप आज फिर बढ़ने लगा था..देह बथ रहा था पर आज कोई उसकी सुध लेने वाला नहीं था, वह जानती थी करवट बदल कर सोने की कोशिश करती है बगीचे में सियार की हूँआ-हूँआ रात के सन्नाटे को चीरती ह...

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कुछ आवाज़ें मरती नहीं By प्रियंका गुप्ता

मैं मरने वाली थी...आज नहीं तो कल, पर मेरा मरना तय था...। मरूँगी कैसे, ये भी पता था मुझे...। कितनी अजीब बात थी न...जिसकी ज़िन्दगी के खज़ाने का खात्मा होने वाला था, जिसकी पूँजी थी, उसे...

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फोन की घंटी - 2 By Saroj Prajapati

रात के खाने की तैयारी कर ही रही थी कि फोन की घंटी बज उठी। मैं बिना फोन देखे ही समझ गई कि पापा का होगा । तभी बेटा चिल्लाया " मम्मी नाना जी का फोन है ।" मैंने उसे कहा तुम रिसीव करो ज...

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काले कवर की डायरी और एक नाम By प्रियंका गुप्ता

हम उसी शाम मिले थे...। बहुत सारी उदास शामों की तरह वो भी तो एक अटपटी सी शाम थी...और पता नहीं क्यों उस दिन लाल बाग जाने का इरादा त्याग कर मैं सैंकी टैंक आ गया था...। वहाँ किनारे लगी...

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पश्चाताप By Sarvesh Saxena

अभी कुछ ही देर हुई थी दीपक को घर से गए कि सुमन ने फिर से बूढ़ी सास पर तंज कसा, "बेटा चला गया ना, तो अब तुझे कहना पड़ेगा, तीन दिन तो आराम फरमा लिया" यह कहते हुए सुमन, सास के आगे कपड...

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Yatharth Ki Jhadiyan By Yogesh Kanava

रात का सन्नाटा पसरा था । एकदम शान्त माहोल, घड़ी की टिक टिक के अलावा कुछ भी आवाज़ नहीं, बस यूं समझिए कि घड़ी मुस्तैदी से अपनी ड््यूटी पर तैनात है सैकण्ड दर सैकण्ड अपना चक्कर पूरा करती,...

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देशी दारू की भठ्ठी - 2 By shekhar kharadi Idriya

अब बाबू की पत्नी चूपचाप दबे पांव घर की ओर हड़बड़ी में वापस लौट गई, क्योंकि बाबू खाट में बिमार पड़ा था । जो अब जोर जोर से खांस रहा था, तभी उसकी जोरू मटकी पास जाकर कहती है " एक लोटा...

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भूमिजा - 2 By Meena Pathak

फुलमतिया उर्मिला देवी की खास परजा थी वह लगभग रोज ही आती और घर के अनेक छोटे बड़े कार्यों के साथ उनकी सेवा भी कर जाती बदले में ढेरों इनाम ले जाती
भूधर राय के पास अपार संपत्ति तो...

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कलर-ब्लाइण्ड By प्रियंका गुप्ता

वह कलर-ब्लाइण्ड था। आम भाषा में कहा जाए तो वह रंगों को ठीक से पहचान नहीं पाता था...खास तौर से लाल और हरे में अन्तर करना उसके लिए मुश्किल था...लगभग नामुमकिन...। उसे तो सावन का अन्धा...

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अब वो खुश हैं... By प्रियंका गुप्ता

रसोई में बर्तनों की खटर-पटर से नीला की आँख खुल गई। बगल में रखी अलार्म-घड़ी देखी तो हड़बड़ा कर उठ गई...ओ माँ! आज साढ़े छः बजे तक सोती रह गई...। ये अलार्म क्यों नहीं बजा...? पर ये सब सोच...

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साली पर नजर By r k lal

“साली पर नजर” आर0 के0 लाल घर में शादी का माहौल था सौम्या की दीदी की शादी थी इसलिए उसकी कई सहेलियां आई थी। रात में गाना बजाना चल रहा था और सौम्या का डांस भी। सभी सहेलियों...

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जिगोलो By Neelam Samnani

रात जैसे जैसे आगे चलकर वक्त को अपने पहलू से बांधती है वैसे ही और भी काली होती जाती है रात की सबसे बडा हुनर यही है की वक्त को बदलने वाली रेंगती सुई पर घिसकर और काला होना । काली रा...

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दंश. By Asha Pandey Author

सनेही के हाथ से मशीन का हत्था (हैन्डिल) आज फिसल-फिसल जा रहा है । ऐसा तो पहले दिन भी नहीं हुआ था जब बड़े साहब ने उसे मशीन का हत्था हाथ में पकड़ा कर घास काटना सिखाया था । पहली मर्तबा म...

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अपना अपना हिस्सा By Ajay Kumar Awasthi

तकरीबन 50 साल पहले वो इलाका शहर का बाहरी भाग था,जहाँ के रहवासी प्रायः खेतिहर मजदूर थे या फिर कुछेक के पास बहुत थोड़ी जमीन थी,जिसमे वे खेती किया करते थे .उनका रहन सहन ठेठ देहाती थ...

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OUT OF CONTROL - 6 By Raaj

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विज्ञापन से प्रताड़ित By r k lal

“विज्ञापन से प्रताड़ित” आर 0 के 0 लाल संजीव अपनी पत्नी के साथ हर्ष के घर मिलने गए थे। उन्हें आश्चर्य हुआ जब हर्ष की टी वी ऑफ मिली। उन्होंने पूंछा – “अभी हाल में ही तो अपने यह बड़ी इ...

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सबूत By Pranav Vishvas

मै गहरी नींद में सो रहा था और रोज़ की तरह अमित आया और चिल्लाया उठ जा भाई आर्डर आ गया है तेरी पोस्टिंग LOC पर हो गयी है, मेरी नज़र टेबल तो रखी मेरी रिस्ट वाच पर गई, देखा 5:16 बज रहे ह...

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क़सूर ? By zeba Praveen

आज एक अजीब सी उदासी छायी थी रामु के चेहरे पर, कल उसकी बेटी के ससुराल से फ़ोन आया था, यह याद दिलाने के लिए कि दहेज़ का पचास हजार अभी देना बाकी हैं | शादी के एक साल होने वाले थे, रामु...

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असली आज़ादी वाली आज़ादी - (भाग-7) By devendra kushwaha

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जंगल By Asha Pandey Author

ये कहानी तब की है, जब उसे जंगल में जाकर प्रत्यक्ष शेर, चीता, भालू देखने का शौक उपजा था शहर के किनारे एक होटल था। वह उसी होटल में काम करता था।
जंगल का रास्ता उसी होटल के सामने से...

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स्वचालित वाहनों के सामाजिक और आर्थिक प्रभाव मूल लेखक - उत्पल चक्रबोर्ती हिंदी सह लेखक - रोहित शर्मा स्वचालित वाहन निस्संदेह दुनिया का भविष्य हैं, लेकिन यह प्रश्न अभी भी बना हुआ...

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उलझते धागे By Asha Pandey Author

ट्रेन छूटने में पन्द्रह मिनट का समय अब भी बाकी है। मैं खिड़की की ओर पीठ टिकाकर बैठी हूँ।
‘‘आ ऽ ई – ओ ऽ ऽ आई, दो ऽ न ऽ ऽ कुछ खाने को‘‘ कहते हुए किसी ने मेरी पीठ को हल्के से ठोंक दिय...

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बाबू By Abhishek Hada

कहानी: बाबू वो दिखने में सीधा साधा था लेकिन मस्ती करने में शैतान का दादा। बेशर्म इतना की कोई कितना ही टोका-टाकी करे उस चिकने घड़े पर कोई असर ना होता था। पर जब भी कोई उसे बाबू कहता त...

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