सामाजिक कहानियां कहानियाँ पढ़े और PDF में डाउनलोड करे

Stories and books have been a fundamental part of human culture since the dawn of civilization, acting as a powerful tool for communication, education, and entertainment. Whether told around a campfire, written in ancient texts, or shared through modern media, Moral Stories in hindi books and stories have the unique ability to transcend time and space, connecting people across generations and cult...Read More


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  • लाइफ़ @ ट्विस्ट एन्ड टर्न. कॉम - 16

    ईश्वर के क्या आँख है जो देखता ? देखता तो क्यों बोझिल जीवन ढोते हैं जो सहृदय रहे...

  • कन्यादान

    'नीहारिका का कन्यादान मैं और सीमा नहीं बल्कि तुम और सविता करोगे क्योंकि तुम...

  • मेरा क्या कसूर

    फ्री पीरियड में कॉलेज लाइब्रेरी में बैठकर किताबें पढ़ना मेरा प्रिय श...

लाइफ़ @ ट्विस्ट एन्ड टर्न. कॉम - 16 By Neelam Kulshreshtha

ईश्वर के क्या आँख है जो देखता ? देखता तो क्यों बोझिल जीवन ढोते हैं जो सहृदय रहे आजीवन ? ईश्वर के अंधे होने का प्रमाण है इस समाज के आईने पर वो बूढ़ी माँ वृद्धा आश्रम में दिन गिन रह...

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टांगें By Pritpal Kaur

कनिका ने कांपते हुए अपने घुटने ढके और वेटर का बेसब्री से इंतजार करने लगी. इस वक़्त वह साउथ दिल्ली के एक पॉश रेस्तरां में अपने कुछ मित्रों के साथ शाम के खाने का आनंद ले रही थी.
अक्ट...

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ईमानदार बेईमानी By Ajay Amitabh Suman

अरोड़ा साहब का कपड़ों के इंपोर्ट और एक्सपोर्ट का दिल्ली में बहुत बड़ा कारोबार था। अक्सर वो चीन के व्यापारियों से संपर्क करके उनसे कपड़ों के एक्सपोर्ट का आर्डर लेते, फिर अपनी फैक्ट्र...

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कन्यादान By Shikha Kaushik

'नीहारिका का कन्यादान मैं और सीमा नहीं बल्कि तुम और सविता करोगे क्योंकि तुम दोनों को ही नैतिक रूप से ये अधिकार है .'' सागर के ये कहते ही समर ने उसकी ओर आश्चर्य से देखा...

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थैंक यू पापा By Rajan Dwivedi

बस किसी छोटे से कस्बे के पास से गुजर रही थी| कोई बाज़ार था शायद जहाँ कुछ लोग सड़क के किनारे पटरी पर लगी दूकानों से खरीद्दारी कर रहे थे| बस तेज रफ़्तार से भागी जा रही थी कि अचानक ड्राई...

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मेरा क्या कसूर By Dr. Vandana Gupta

फ्री पीरियड में कॉलेज लाइब्रेरी में बैठकर किताबें पढ़ना मेरा प्रिय शगल है। आज एक पत्रिका में कहानी पढ़कर मैं सिहर उठी। बहुत ही सुंदर शैली में लिखी कहानी थी, किन्तु उसका...

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परिणीता - 10 By Sarat Chandra Chattopadhyay

शेखर ने असम्भव समझकर ललिता को पाने की आशा छोड़ दी। कर्इ दिन उसे डर अनुभव होता रहा। वह एकाएक सोचने लगता कि कहीं ललिता आकर सब बातें कहकर भण्डफोड़ न कर दे, उसकी बातों का जवाब न देना प...

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घोंघे By Arpan Kumar

साहित्य में नए-नए कदम रखे अरुण कौशल ने छपने-छपाने की दुनिया में प्रवेश कर लिया था। अपने से वरिष्ठ साथियों की रचनाओं को पढ़कर और उसमें हाशिए और सर्वहारा वर्ग के प्रति ध्वनित होती उनक...

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नीम का पेड़ By Rajesh Bhatnagar

ज़िन्दगी की हज़ारों षामों की तरह ही आज की शाम भी ढलने को थी । सूरज उसके आंगन के नीम के पेड़ के पीछे छिपने को था । बस पेड़ की ओट में आते-आते ही दिन का उजाला खत्म होने लगता है । मगर कल.....

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चैन By Pritpal Kaur

ऐसी ही एक अंजान सी बुझी बुझी सी शाम को वह अपने घर से निकल कर बाहर सड़क पर आ गयी थी. उसे नहीं पता था कि उसे कहाँ जाना है. वह तो बस घर से निकल आयी थी. उस घर से, जहाँ जाते हुए उसका मन...

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प्रश्न-कुंडली By Geeta Shri

प्रेम, खौफ, धोखा, दुनिया, रचना, सपना, आकांक्षा, डर, प्रकृति, पानी, बारिश, धूप, बादल, आकाश, पृथ्वी, सौंदर्य, शोख, चंचल, दिल, कविता, लय, गीत, मंदिर, देवता, आशा...
वह कागज पर लिखती च...

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परी....! By Sapna Singh

वह आंखे फाड़-फाड़ कर चारों ओर देख रही थी । . कुछ देर तो लगा था । आंखे चुधियां सी गई हैं । ऐसी रोशनी .. ऐसी सजावट सिर्फ टी.वी. सीरीयलों में देखा था। यहां सबकुछ वैसा ही तो था। वैसी ही...

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एक कारीगर की ख़ामोशी By Arpan Kumar

“भला इतने महँगे वार्डरोब बनवाने की क्या ज़रूरत है हरिराम?” अपने खर्चे से कुछ उकताया हुआ मैंने उससे साफ-साफ पूछा।
“जिनके पास पैसे कम हैं, वे अपने घरों में लोहे की कोई अलमारी लाकर रख...

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कराहती सांझ By Rajesh Bhatnagar

आज राजन की बीमारी को पूरे आठ माह हो चुके थे । जबसे डाक्टरों ने राजन को एड्स होने की संभावना बताई थी तब से ही उसके निकट के रिष्तेदार, अड़ौसी-पड़ौसी कार्यालय के साथी ही नहीं स्वयं उसकी...

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आखर चौरासी - 37 By Kamal

सतनाम बताए जा रहा था, ‘‘वैसे हालात में आस-पडोस के बाकी लोग तो तमाशबीन बने चुपचाप रहे, लेकिन पड़ोस में रहने वाला वह गबरु नौजवान लड़का अपने घर से निकल आया। उसके हाथ में लोहे का एक रॉड...

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दिन के आरे बारे और रात के दिया बारे By Vikash Raj

बचपन में जब भी मैं मां के उम्मीद से ज्यादा पैसा खर्च करता तो मेरी हमेशा एक कहावत कहा करती थी 'दिन के आरे बारे और रात के दिया बारे ' । जिसका अर्थ होता है घर में चूल्हा जला...

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द टाइम्स ऑफ इशरत (पत्र शैली) By इशरत हिदायत ख़ान

मैं रमिया बिहाऱ प्रवास के दौरान दोस्तो को पत्र लिखता रहता था क्योंकि तब मोबाइल की सुविधा नही थी। यह आपको विचित्र लग सकता है कि मैं अपनेपत्र अक्सर अखबार के रूप में लिखता था। इस अखब...

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नया उजाला By Dr. Vandana Gupta

वह बहुत देर से कीचैन हाथ में लिए बैठा था। वह कोई ऐसा वैसा कीचैन नहीं था, बहुत स्पेशल था, कॉलेज के आखिरी दिन अविका ने दिया था। अविका और अवनीश दोनों प्रेमी युगल के रूप में पूरे...

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चहुँ और प्रेम By राज बोहरे

रात में सोते हुए जागने की बीमारी है मुझे। बरसते पानी की ‘टप्प टप्प‘ ध्वनि के बावजूद जब अहाते के बाहरी दरवाजे की कुण्डी खड़की, तो मेरी नींद टूट गई। दो जोड़ी पैर बैठक के दरवाजे तक आत...

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लाइफ़ @ ट्विस्ट एन्ड टर्न. कॉम - 16 By Neelam Kulshreshtha

ईश्वर के क्या आँख है जो देखता ? देखता तो क्यों बोझिल जीवन ढोते हैं जो सहृदय रहे आजीवन ? ईश्वर के अंधे होने का प्रमाण है इस समाज के आईने पर वो बूढ़ी माँ वृद्धा आश्रम में दिन गिन रह...

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टांगें By Pritpal Kaur

कनिका ने कांपते हुए अपने घुटने ढके और वेटर का बेसब्री से इंतजार करने लगी. इस वक़्त वह साउथ दिल्ली के एक पॉश रेस्तरां में अपने कुछ मित्रों के साथ शाम के खाने का आनंद ले रही थी.
अक्ट...

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ईमानदार बेईमानी By Ajay Amitabh Suman

अरोड़ा साहब का कपड़ों के इंपोर्ट और एक्सपोर्ट का दिल्ली में बहुत बड़ा कारोबार था। अक्सर वो चीन के व्यापारियों से संपर्क करके उनसे कपड़ों के एक्सपोर्ट का आर्डर लेते, फिर अपनी फैक्ट्र...

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कन्यादान By Shikha Kaushik

'नीहारिका का कन्यादान मैं और सीमा नहीं बल्कि तुम और सविता करोगे क्योंकि तुम दोनों को ही नैतिक रूप से ये अधिकार है .'' सागर के ये कहते ही समर ने उसकी ओर आश्चर्य से देखा...

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थैंक यू पापा By Rajan Dwivedi

बस किसी छोटे से कस्बे के पास से गुजर रही थी| कोई बाज़ार था शायद जहाँ कुछ लोग सड़क के किनारे पटरी पर लगी दूकानों से खरीद्दारी कर रहे थे| बस तेज रफ़्तार से भागी जा रही थी कि अचानक ड्राई...

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मेरा क्या कसूर By Dr. Vandana Gupta

फ्री पीरियड में कॉलेज लाइब्रेरी में बैठकर किताबें पढ़ना मेरा प्रिय शगल है। आज एक पत्रिका में कहानी पढ़कर मैं सिहर उठी। बहुत ही सुंदर शैली में लिखी कहानी थी, किन्तु उसका...

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परिणीता - 10 By Sarat Chandra Chattopadhyay

शेखर ने असम्भव समझकर ललिता को पाने की आशा छोड़ दी। कर्इ दिन उसे डर अनुभव होता रहा। वह एकाएक सोचने लगता कि कहीं ललिता आकर सब बातें कहकर भण्डफोड़ न कर दे, उसकी बातों का जवाब न देना प...

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घोंघे By Arpan Kumar

साहित्य में नए-नए कदम रखे अरुण कौशल ने छपने-छपाने की दुनिया में प्रवेश कर लिया था। अपने से वरिष्ठ साथियों की रचनाओं को पढ़कर और उसमें हाशिए और सर्वहारा वर्ग के प्रति ध्वनित होती उनक...

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नीम का पेड़ By Rajesh Bhatnagar

ज़िन्दगी की हज़ारों षामों की तरह ही आज की शाम भी ढलने को थी । सूरज उसके आंगन के नीम के पेड़ के पीछे छिपने को था । बस पेड़ की ओट में आते-आते ही दिन का उजाला खत्म होने लगता है । मगर कल.....

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चैन By Pritpal Kaur

ऐसी ही एक अंजान सी बुझी बुझी सी शाम को वह अपने घर से निकल कर बाहर सड़क पर आ गयी थी. उसे नहीं पता था कि उसे कहाँ जाना है. वह तो बस घर से निकल आयी थी. उस घर से, जहाँ जाते हुए उसका मन...

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प्रश्न-कुंडली By Geeta Shri

प्रेम, खौफ, धोखा, दुनिया, रचना, सपना, आकांक्षा, डर, प्रकृति, पानी, बारिश, धूप, बादल, आकाश, पृथ्वी, सौंदर्य, शोख, चंचल, दिल, कविता, लय, गीत, मंदिर, देवता, आशा...
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वह आंखे फाड़-फाड़ कर चारों ओर देख रही थी । . कुछ देर तो लगा था । आंखे चुधियां सी गई हैं । ऐसी रोशनी .. ऐसी सजावट सिर्फ टी.वी. सीरीयलों में देखा था। यहां सबकुछ वैसा ही तो था। वैसी ही...

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एक कारीगर की ख़ामोशी By Arpan Kumar

“भला इतने महँगे वार्डरोब बनवाने की क्या ज़रूरत है हरिराम?” अपने खर्चे से कुछ उकताया हुआ मैंने उससे साफ-साफ पूछा।
“जिनके पास पैसे कम हैं, वे अपने घरों में लोहे की कोई अलमारी लाकर रख...

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आज राजन की बीमारी को पूरे आठ माह हो चुके थे । जबसे डाक्टरों ने राजन को एड्स होने की संभावना बताई थी तब से ही उसके निकट के रिष्तेदार, अड़ौसी-पड़ौसी कार्यालय के साथी ही नहीं स्वयं उसकी...

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आखर चौरासी - 37 By Kamal

सतनाम बताए जा रहा था, ‘‘वैसे हालात में आस-पडोस के बाकी लोग तो तमाशबीन बने चुपचाप रहे, लेकिन पड़ोस में रहने वाला वह गबरु नौजवान लड़का अपने घर से निकल आया। उसके हाथ में लोहे का एक रॉड...

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दिन के आरे बारे और रात के दिया बारे By Vikash Raj

बचपन में जब भी मैं मां के उम्मीद से ज्यादा पैसा खर्च करता तो मेरी हमेशा एक कहावत कहा करती थी 'दिन के आरे बारे और रात के दिया बारे ' । जिसका अर्थ होता है घर में चूल्हा जला...

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द टाइम्स ऑफ इशरत (पत्र शैली) By इशरत हिदायत ख़ान

मैं रमिया बिहाऱ प्रवास के दौरान दोस्तो को पत्र लिखता रहता था क्योंकि तब मोबाइल की सुविधा नही थी। यह आपको विचित्र लग सकता है कि मैं अपनेपत्र अक्सर अखबार के रूप में लिखता था। इस अखब...

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नया उजाला By Dr. Vandana Gupta

वह बहुत देर से कीचैन हाथ में लिए बैठा था। वह कोई ऐसा वैसा कीचैन नहीं था, बहुत स्पेशल था, कॉलेज के आखिरी दिन अविका ने दिया था। अविका और अवनीश दोनों प्रेमी युगल के रूप में पूरे...

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चहुँ और प्रेम By राज बोहरे

रात में सोते हुए जागने की बीमारी है मुझे। बरसते पानी की ‘टप्प टप्प‘ ध्वनि के बावजूद जब अहाते के बाहरी दरवाजे की कुण्डी खड़की, तो मेरी नींद टूट गई। दो जोड़ी पैर बैठक के दरवाजे तक आत...

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