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भाग 4: दंडाधिकरण के सामनेचौराहे का पुराना बरगद वृक्ष सदियों से खड़ा था, पर आज रा...
युवाओं के सपनों के शहर का आईना है - “इलाहाबाद पैसेंजर “ लगभग उन्हीं दिनों (वर्...
भूतों की बारात में झूमर“जब तान, थाप और नृत्य ने अदृश्य जगत को भी बाँध लिया…”डोमन...
जल-छायाहिमालय की गोद में बसा कुमाऊँ का छोटा सा गाँव धारकोट, जहाँ सुबह की हवा में...
साँझ का करघा उस घर की लय घड़ी की सुइयों से नहीं, बल्कि करघे की उस निरंतर होने वा...
Epsiode 1: Ek awaaz सीन 1: मौत का आख़िरी रक़्स (The Final Dance of Death)रात आज...
“किराये के घर की यादें” (लगभग 2000 शब्द), लेखक: विजय शर्मा एरी ---किराये के घर...
ऋगुवेद सूक्ति--(45)की व्याख्या उद्वयं तमसस्परि ज्योतिष्पश्यन्तउत्तरे।ऋग्वेद- 1/1...
Part 7: अंधेरे के बीच नामजब होश और बेहोशी के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है…तो इं...
(काल कोठरी ) -------11 वी किश्त लोगों से जुड़ना, उन्हे...
आधी रात का समय था, पर शहर कभी सोता नहीं था। एम्स के तेरहवीं मंजिल के ऑपरेशन थियेटर की चमचमाती लाइटें अब धुंधली पड़ने लगी थीं। डॉ. आर्यन वर्मा ने अपने हाथों के लेटेक्स दस्ताने उतारक...
वो रात, जहाँ सब शुरू हुआ उस रात की खामोशी में एक अजीब सा तूफान छुपा था। हवा ठंडी थी, मगर उसके भीतर एक अनकही बेचैनी थी, जैसे कोई राज धीरे-धीरे परतों से बाहर आने को तैयार हो। शह...
ये उपन्यास सत्य पर एक ऐसी प्रेरित कहानी है, जो लिखने मे मुझे काफ़ी तकलीफ झेलनी पड़ी। कारण था, बस एक ही स्थान वही रहे और पात्र बदले जाये फिर सोचा नहीं सब कुछ ही सच हो।...
Heroine: शानवी सिंह Hero: कार्तिकेय (दिन में बिल्ली, रात में इंसान) शानवी सिंह को अकेलापन काटने दौड़ता था। बड़े शहर में छोटी सी नौकरी, छोटा सा कमरा और दिन भर का शोर… लेकिन रात...
बॉस… आपने जैसा कहा था, काम हो गया है… वह उसी तरह एक पैर पर दूसरा पैर रखे, उस घने अंधेरे कमरे में कुर्सी को आगे-पीछे झुलाते हुए बैठा था। छह फीट से भी लंबा उसका शरीर मानो उस अंधेरे...
सुबह के साढ़े पांच बजे थे। शहर की भागदौड़ अभी शुरू नहीं हुई थी, लेकिन भूपेंद्र के घर की रसोई से प्रेशर कुकर की पहली सीटी ने दिन के आगाज़ की घोषणा कर दी थी। खिड़की के बाहर हल्की ओस ज...
15 अक्टूबर 2003 को दिल्ली की अस्पताल में मेरा जम्म हुआ था. उस वक़्त वक़्त तेज बारिश हो रही थी.मुझे देखकर मेरे माता पीता खुश हो गये थे. मैं काफ़ी शरारती थी. नर्स ने मुझे प...
दस वर्षीया पारुल दौड़ती जा रही है। नदी के किनारे-किनारे। रेत पैरों में चुभ रही है, मगर वह हँस रही है। बालों में दो चोटियाँ हैं, हरी फ्रॉक हवा में लहरा रही है। पैरों में...
एक ही शहर, दो दुश्मन और वो पुरानी चोट दरभंगा की तपती दुपहरी में राजवीर राठौर और भानु प्रताप ठाकुर की दोस्ती की मिसाल दी जाती थी। दोनों का रसूख ऐसा कि परिंदा भी पर न मारे। राजवीर स...
चारों तरफ एक ऐसी रोशनी थी जो धूप से छनकर, हल्की सी अयान के चेहरे पर पड़ रही थी। अयान रॉय, अपनी कोठी की बालकनी में खड़ा था। हवा में, एक शाही रसूख की महक थी। उसने अपनी शर्ट की आस्तीन...
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