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चलो दूर कहीं... 14रवि के बेहोश होते ही प्रतीक्षा को लगा जैसे पावर कट हो गया हो.....
Part 9: दूरियाँ जो पास ले आईंकुछ वादे ऐसे होते हैं…जो निभाए जाते हैं, मगर जीने न...
*"सात फेरों का इंतज़ार, सौ सवालों की बरसात"* _ प्रेम कहानी - किरण और मध...
पारितोष ने टुक-टुक को धीरे से उठाया और अपने साथ चल दिया।बिल्ली का छोटा सा शरीर उ...
केशव किसी तरह धक्कामुक्की से निकलते हुए सप्त क्रांति ट्रेन में चढ़ पाया।पुरानी द...
----------------- टाम ज़िंदा है --------------17 वी किश्त पर आधारित.... ...
मै ये नहीं कहती कि हर संगति अच्छी होती है या बुरी, हां पर ये जरूर कहूंगी कि संगत...
मनोरमा देवी के कानों तक यह खबर पहुँच चुकी थी कि उनके राजा बेटे की नौकरी जा चुकी...
मोनिका :- एक रात .... Seriously ? ठिक है मैं ये पैसे वकील को दोना चाहती थी , ता...
New पहचान सांझ ढल चुकी थी। गाँव के कच्चे रास्तों पर धूल बैठने लगी थी और आकाश में...
वो रात, जहाँ सब शुरू हुआ उस रात की खामोशी में एक अजीब सा तूफान छुपा था। हवा ठंडी थी, मगर उसके भीतर एक अनकही बेचैनी थी, जैसे कोई राज धीरे-धीरे परतों से बाहर आने को तैयार हो। शह...
Heroine: शानवी सिंह Hero: कार्तिकेय (दिन में बिल्ली, रात में इंसान) शानवी सिंह को अकेलापन काटने दौड़ता था। बड़े शहर में छोटी सी नौकरी, छोटा सा कमरा और दिन भर का शोर… लेकिन रात...
दुनिया सीधे लोगों की नहीं हैं.... चलाक बनो.. जानकारी उतनी ही इकठी करो जिसको तुम रख सकते हो.. जयादा जानकारी बहुत सेहत के लिए हानिकारक होती हैं.. हाँ मेरी बात अक्सर त्रिपाठी से होती...
सुबह के साढ़े पांच बजे थे। शहर की भागदौड़ अभी शुरू नहीं हुई थी, लेकिन भूपेंद्र के घर की रसोई से प्रेशर कुकर की पहली सीटी ने दिन के आगाज़ की घोषणा कर दी थी। खिड़की के बाहर हल्की ओस ज...
शाम का समय था । जानवी अपने पापा अशोक मुखर्जी से अपने पसंद के लड़के से शादी करने की जिद कर रही थी । जिस कारण से अशोक अपनी एकलौती बेटी जानवी को डांटता है । अशोक धनबाद शहर का एक जाना...
15 अक्टूबर 2003 को दिल्ली की अस्पताल में मेरा जम्म हुआ था. उस वक़्त वक़्त तेज बारिश हो रही थी.मुझे देखकर मेरे माता पीता खुश हो गये थे. मैं काफ़ी शरारती थी. नर्स ने मुझे प...
एक ही शहर, दो दुश्मन और वो पुरानी चोट दरभंगा की तपती दुपहरी में राजवीर राठौर और भानु प्रताप ठाकुर की दोस्ती की मिसाल दी जाती थी। दोनों का रसूख ऐसा कि परिंदा भी पर न मारे। राजवीर स...
दस वर्षीया पारुल दौड़ती जा रही है। नदी के किनारे-किनारे। रेत पैरों में चुभ रही है, मगर वह हँस रही है। बालों में दो चोटियाँ हैं, हरी फ्रॉक हवा में लहरा रही है। पैरों में...
कुहासों की गलियों में से गुज़रते हुए जीवन की गठरी न जाने कितनी बार नीचे गिरी, कितनी बार खुली, कितनी बार बिखरी और समेटी गई लेकिन गठरी की गाँठ बड़ी कमज़ोर रही फिर चिंदी बनकर उड़ने से उसम...
बॉस… आपने जैसा कहा था, काम हो गया है… वह उसी तरह एक पैर पर दूसरा पैर रखे, उस घने अंधेरे कमरे में कुर्सी को आगे-पीछे झुलाते हुए बैठा था। छह फीट से भी लंबा उसका शरीर मानो उस अंधेरे...
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