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यजुर्वेद सूक्ति (3) की व्याख्या परिमाग्ने दुश्चरिताद बयजुर्वेद--4/28भावार्थ--हे...
---------------रूद्रिका अपने कमरे मे चहल कदमी कर रही थी। उसका चेहरा तमतमाया हुआ...
️ किले का आखिरी पहरेदारसाल 1672...अरावली की पहाड़ियों के बीच बना देवगढ़ का किला...
इस खबर ने कमरे में मौजूद हर शख्स को पत्थर बना दिया। पंडित शास्त्री केवल एक पुजार...
*शीर्षक: हां हम अंध भक्त हैं देश सबसे पहले है मोदी का विरोध सह लेंगे लेकिन देशद्...
एपिसोड 43 समाधि का श्राप और अंधेरे की शहर की बेचैनीसमाधि के अंतिम द्वार से लौटने...
ऑफिस का शुरुआती माहौलकांच के बड़े केबिन में विराट बैठा हुआ था।फाइलें खुली थीं, ल...
अधूरी किताब: एक रूहानी दास्तानएपिसोड 42: सातवाँ द्वारप्रतिध्वनि झील का काला जल अ...
लेखक की कलम से…कहानियाँ सहज ही मन से जुड़ जाया करती हैं। पढ़ते-पढ़ते किरदार अपने...
(एम्बुलेंस के सायरन की आवाज़ जो धीमे-धीमे एक हाई-पिच टोन में बदल रही है। आर्यन क...
औघड़ का दान प्रदीप श्रीवास्तव भाग-1 सीमा अफनाई हुई सी बहुत जल्दी में अपनी स्कूटी भगाए जा रही थी। अमूमन वह इतनी तेज़ नहीं चलती। मन उसका घर पर लगा हुआ था जहां दोनों बेटियां और पति कब क...
घनी सी रात में वो थरथराई सी हाइवे पर खड़ी थी , हर आते जाते मुसाफिर को हाथ देती l उसके बिखरे से बाल और स्याह सफेद सलवार सूट शायद राहगीरों को रुकने नहीं देना चाहता था l कई कहानियाँ थी...
मेरी राह्गिरी (1) शुरुआत मैंने वक़्त की धार में एक पैर छुआ कर देखा था और मेरा पैर दहक गया था बुरी तरह. ये नदी मेरी ख्वाहिशों ने गढ़ी थी. मैं नींद में डूबा बेखबर ख्वाबों से हार कर सोन...
जून का महीना। उफ! ऊपर से ये गरमी। रात हो या दिन दोनों में उमस जो कम होने का नाम नहीं ले रही थी। दिन की चिलचिलाती धूप की तपिस से रात को घर की दीवारें चूल्हें पर रखे हुए तवे की तरह म...
होटल टाशकेंट के बाहर चारों तरफ बर्फ फैली हुई थी। सामने के पार्क में मरियल धूप का एक टुकड़ा बर्फ से लड़ने की कोशिश कर रहा था। सुशांत अभी ऊंघ रहा था। तय नहीं कर पा रहा था कि बिस्तर छोड़...
भगवान की भूल प्रदीप श्रीवास्तव भाग-1 मां ने बताया था कि जब मैं गर्भ में तीन माह की थी तभी पापा की करीब पांच वर्ष पुरानी नौकरी चली गई थी। वे एक सरकारी विभाग में दैनिक वेतन भोगी कर्म...
“ ॐ सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थसाधिके शरण्ये त्रयम्बके गौरी नारायणी नमोस्तुते !!.......नीचे मंडप में पंडित जी कलश स्थापना कर रहे थे. खिड़की से सिर टेके खड़ी गौरी चुपचाप सारे काम...
मुहल्ले में घूमने-फिरने के बाद रासमणि अपनी नातिन के साथ घर लौट रही थी। गाँव की सड़क कम चौड़ी थी, उस सड़क के एक ओर बंधा पड़ा मेमना (बकरी का बच्चा) सो रहा था। उसे देखते ही बुढ़िया ना...
जीवन मरण के बारे में सोचते हुए हमेशा मन उलझ जाता है चारों ओर बस सवाल ही सवाल नज़र आते हैं मगर उत्तर कहीं नज़र नहीं आता। क्या है यह आत्मा, दिल दिमाग या फिर कुछ और क्या वाकई कुछ लोग मर...
(ऐक अकेली अबला, बेसहारा, बेबस ऐवम गरीब महिला का पाखंउी, जातिवादि, घोर साम्प्रदायिक संकीर्णतावाद से ग्रस्त समाज से संघर्ष की रोमाचक दास्तान । गरीबों के दुःख दर्द को अनसुना करने वाले...
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