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एपिसोड: 'विरासत का विष और अदृश्य शत्रु'खन्ना मेंशन की सुबह आज पहले जैसी...
part -3सुहानी मोबाइल को देखे जा रही थी।स्क्रीन पर वही शब्द रुके हुए थे—“H...
नियति का रक्त-अभिषेक और महाप्रस्थानकहते हैं कि विनाश से ठीक पहले की खामोशी सबसे...
: : प्रकरण - 37 : : मैं खुद एक लेखक था. अपने मित्...
रात…एक बार फिर पूरी हवेली नींद में डूबी हुई थी। पर इस बार कार्तिक नहीं सोया था।...
मटन बिरयानी की खुशबू अब भी हवा में तैर रही थी। मंत्री जगनमोहन दयाल ने उँगलियाँ ध...
अध्याय 3 : ज़िंदा तस्वीर का सचकमरे में सन्नाटा इतना गहरा था कि अंजलि को अपनी ही...
भूल-123 पुरुषोत्तम दास टंडन के प्रति दुर्व्यवहार और कैसे नेहरू ने निरंकुश शासन क...
---कल और आज लेखक: विजय शर्मा एरी प्रस्तावनायादें कभी पुरानी नहीं होतीं। वे हमार...
कहानियां लिखी जाती है, पढ़ी भी जाती है, किरदार एक के बाद एक आते जाते है, कुछ समझ...
उस वक़्त मैं तीन साल का था, मेरा बड़ा भाई सुखेश पांच साल का था औऱ मेरी छोटी बहन भाविका केवल छह महिने की थी. उस वक़्त मेरी मा असाध्य बीमारी का शिकार हो गई थी. उन्हें कांदिव...
सुबह के साढ़े पांच बजे थे। शहर की भागदौड़ अभी शुरू नहीं हुई थी, लेकिन भूपेंद्र के घर की रसोई से प्रेशर कुकर की पहली सीटी ने दिन के आगाज़ की घोषणा कर दी थी। खिड़की के बाहर हल्की ओस ज...
शीर्षक: वल्चर – अँधेरे की उड़ान विशेष एपिसोड: “रक्तपंख बनाम नरकवीर” [दृश्य 1 – महानगर का बाहरी इलाका, संध्या] लाल सूरज डूब रहा है। धुएँ से भरी हवा में सायरनों की आवाज़ गूँजती है...
कक्षा में अचानक ठहाकों की आवाज़ गूँज उठी।Sneha ने इधर-उधर देखा तो पाया कि सब बच्चे उसी की ओर घूर-घूरकर देख रहे थे और हँस भी रहे थे।लड़कियाँ Sneha को देख कर अजीब-सी मुस्कान लिए खड़ी...
सुबह की हल्की धूप खिड़की से होकर दिव्या के कमरे में फैल रही थी। अलार्म बजने से पहले ही उसकी आँख खुल गई थी। वह कुछ पल यूँ ही छत को देखती रही, जैसे किसी अधूरे सपने को याद करने की कोश...
गुरु जी डॉ0 सूर्यपाल सिंह से मैं दो वर्ष से सम्पर्क में हूँ। प्रारम्भ में गुरु जी के बोले शब्दों को लिखने के लिए ही आया था। धीरे-धीरे उनके साहित्य को भी पढ़ने में रुचि जगी। उनके बहु...
ये कहानी एक काल्पनिक कहानी है इस कहानी का वास्तविकता से कोई सम्बन्ध नही है ये कहानी केवल मनोरंजन के लिए है इसमे बताये गये सभी किरदार काल्पनिक है . . . . लेखक -MASHAALLHA ये इस क...
मैं अपने बचपन में दादा-दादी की लाड़ली थी।उनकी आँखों का नूर, उनके आँगन की सबसे प्यारी हँसी।घर में अगर कोई सबसे पहले मेरी ओर देखता था,तो वे दादा-दादी ही होते थे।उनके लिए मैं केवल उनक...
आसमान में काले बादल छाए हुए थे ऐसा लग रहा था जैसे आज इंदर देव रूष्ट हो और अपना सारा कोप निकालना चाहते हो,बरसात आने की आशंका में सभी लोग अपना काम जल्दी-जल्दी समेट कर अपने घर पहुंचन...
एक ही शहर, दो दुश्मन और वो पुरानी चोट दरभंगा की तपती दुपहरी में राजवीर राठौर और भानु प्रताप ठाकुर की दोस्ती की मिसाल दी जाती थी। दोनों का रसूख ऐसा कि परिंदा भी पर न मारे। राजवीर स...
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