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: : प्रकरण -39 : : उस रात को पार्टी के बाद कहते ह...
बाहर मुंबई की कभी न थमने वाली रफ़्तार थी और केबिन के अंदर एक गला घोंटने वाली खाम...
धीरे-धीरे Sneha की आँखों में नींद उतर आई।सुबह जब उसकी नींद खुली, तो उसने देखा कि...
काली गुस्से अपने दांत भिंचते हूए कहता है ---काली :- " आ....ह , थक गया हूँ मैं इन...
[ 12. और अधिक भूल और उनसे संबंधित पहलू ](बी1) नेहरू ने उपहार-स्वरूप दी काबो घाटी...
तीसरे वर्ष ऐसा हुआ कि मैंने जुलाई में ही बीए भाग एक का प्रवेश सम्पन्न कर 25 जला...
Car के अंदर, रात का समय, हल्की हल्की हवा चल रही है।Kabir ड्राइव कर रहा है। Karan...
यह कहानी “मैं दादा-दादी की लाड़ली” का चौथा भाग है।बचपन की मासूमियत और अधूरे प्या...
मौत की खाई और मन की आँखें"सिया और रोबोटिक सूट पहने उसके अंकल उस अंतहीन खाई में ग...
तभी जेठानी अंदर आई।हाथ में चाय।चेहरे पर माँ जैसी चिंता की एक्टिंग।“अरे… थक गई हो...
Heroine: शानवी सिंह Hero: कार्तिकेय (दिन में बिल्ली, रात में इंसान) शानवी सिंह को अकेलापन काटने दौड़ता था। बड़े शहर में छोटी सी नौकरी, छोटा सा कमरा और दिन भर का शोर… लेकिन रात...
अमावस्या की रात थी और रात के 11 बज रहे थे । भानपुर गांव का एक तांत्रिक अपनी तात्रिकं साधना करने के लिए सुंदरवन की तरफ जा रहा था । गांव मे ये मान्यता थी के जो कोई भी तात्रिकं अमावस्...
इस कहानी के सभी पात्र काल्पनिक है इसका किसी जीवित, जंतु, मानव संसाधन से कोई लेना देना नही है अगर ऐसा होता है तो ये मात्र एक सयोग होगा ,,, जय हिन्द, इस कहानी को लिखने का उद्देश्य क...
कुहासों की गलियों में से गुज़रते हुए जीवन की गठरी न जाने कितनी बार नीचे गिरी, कितनी बार खुली, कितनी बार बिखरी और समेटी गई लेकिन गठरी की गाँठ बड़ी कमज़ोर रही फिर चिंदी बनकर उड़ने से उसम...
यह कहानी है हमारे ब्रह्मांड R3G7 की... एक ऐसा ब्रह्मांड जो अब अपनी आखिरी सांसें गिन रहा था। तबाही का समय निकट था, लेकिन पृथ्वी के लोग अभी भी अनजान थे। पृथ्वी पर सात राज्य थे, जि...
शीर्षक: वल्चर – अँधेरे की उड़ान विशेष एपिसोड: “रक्तपंख बनाम नरकवीर” [दृश्य 1 – महानगर का बाहरी इलाका, संध्या] लाल सूरज डूब रहा है। धुएँ से भरी हवा में सायरनों की आवाज़ गूँजती है...
मलनाड की सुबह हमेशा खास होती है। जब कोहरे की चादर को चीरकर सूर्य की पहली किरणें धरती पर आती हैं, तो दुनिया किसी जादुई सपने जैसी लगती है। लेकिन अर्जुन के लिए, यह एक अलग ही दुनिया थी...
सुबह के साढ़े पांच बजे थे। शहर की भागदौड़ अभी शुरू नहीं हुई थी, लेकिन भूपेंद्र के घर की रसोई से प्रेशर कुकर की पहली सीटी ने दिन के आगाज़ की घोषणा कर दी थी। खिड़की के बाहर हल्की ओस ज...
दरिया, परिंदे और वो अजनबी अज़ीम …. वह ज़ोया को जाते हुए देखता है और सोचता है— "यह कैसी अजनबी थी जो आई तो एक शोर की तरह थी (महंगी गाड़ी, रुतबा), पर छोड़ एक खामोशी गई। क्या यह...
एक ही शहर, दो दुश्मन और वो पुरानी चोट दरभंगा की तपती दुपहरी में राजवीर राठौर और भानु प्रताप ठाकुर की दोस्ती की मिसाल दी जाती थी। दोनों का रसूख ऐसा कि परिंदा भी पर न मारे। राजवीर स...
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