सर्वश्रेष्ठ सामाजिक कहानियां कहानियाँ पढ़ें और PDF में डाउनलोड करें

उजाला ही उजाला
द्वारा Pavitra Agarwal

उजाला ही उजाला पवित्रा अग्रवाल जैसे ही मैं अस्पताल के पास पहुंचा मि. सरीन मुझे अस्पताल के मुख्य द्वार पर ही मिल गए. उनके चहरे पर संतोष के भाव ...

दी लॉक डाउन टेल्स :कुछ खट्टी कुछ मीठी - 1 - सौतन से छुटकारा
द्वारा RISHABH PANDEY

दी लॉक डाउन टेल्स इसके अंतर्गत देश व्यापी लॉक डाउन के समय की कुछ कहानियों का संग्रह है।। आज की पहली कहानी सौतन से छुटकारा आपके सामने है.....एक सरकारी ...

आखा तीज का ब्याह - 10
द्वारा Ankita Bhargava

आखा तीज का ब्याह (10) श्वेता का अंदाज़ा गलत नहीं था तिलक सच में बहुत परेशान था| उसने अवसादग्रस्त होकर खुदको पूरी तरह शराब में डूबा दिया था| कोई ...

दास्तानगो - 2
द्वारा Priyamvad

दास्तानगो प्रियंवद २ राजाओं, नवाबों, सामंतों के ब्राह्मण मुंशी या दीवान उनकी जागीरों की आमदनी और खर्च का हिसाब किताब भी रखते थे। वे इन जागीरों की देखभाल या ...

30 शेड्स ऑफ बेला - 17
द्वारा Jayanti Ranganathan

30 शेड्स ऑफ बेला (30 दिन, तीस लेखक और एक उपन्यास) Day 17by Era Tak इरा टाक मन ना भये दस-बीस बेला के मन में पद्मा को लेकर एक ...

राम रचि राखा - 6 - 5
द्वारा Pratap Narayan Singh
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राम रचि राखा (5) पंद्रह दिनों बाद जब मुन्नर जेल से छूटे तो उनकी हालत किसी मानसिक रोगी जैसी थी। मन में अनिश्चितता ने घर कर लिया था। कुछ ...

सुरतिया - 2
द्वारा vandana A dubey
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अचानक गुड्डू को याद आया कि उसके स्कूल में भी तो लोककला पेंटिंग होने वाली है, वो भी नेशनल लेबल की!! यदि बाउजी कोलाज़ जानते हैं, तो और भी ...

बात बस इतनी सी थी - 12
द्वारा Dr kavita Tyagi
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बात बस इतनी सी थी 12. माता जी और मंजरी को लेकर सोचते-सोचते मेरी नजर एक बार फिर खाने की प्लेट से जा टकराई । मैंने मंजरी से कहा ...

उलझन - 2
द्वारा Amita Dubey
  • 300

उलझन डॉ. अमिता दुबे दो शाम को मम्मी-पापा अनुज अंकल से मिलने उनके घर गये। सौमित्र किताब खोलकर बालकनी में बैठ गया लेकिन उसका पढ़ने में मन नहीं लग ...

वापसी.
द्वारा Ranjana Prakash
  • 762

वापसी अभी सूरज देवता प्रकट भी नहीं हुए थे के पूरा घर ॐकार के दिव्य स्वर से निनादित होने लगा था इस घर की भोर ऐसी ही सुरीली होती ...

गूगल बॉय - 6
द्वारा Madhukant
  • 210

गूगल बॉय (रक्तदान जागृति का किशोर उपन्यास) मधुकांत खण्ड - 6 सुबह-सुबह नारायणी रसोई में नाश्ता बना रही थी। गोपाल व गूगल भी नाश्ता करने के लिये वहीं आ ...

एनीमल फॉर्म - 8
द्वारा Suraj Prakash
  • 111

एनीमल फॉर्म जॉर्ज ऑर्वेल अनुवाद: सूरज प्रकाश (8) कुछ दिन बीतने के बाद, प्राणदण्डों से उपजा आतंक धुंधला पड़ चुका था। कुछेक पशुओं को याद था, या उन्होंने सोचा ...

जिंदगी मेरे घर आना - 9
द्वारा Rashmi Ravija
  • 414

जिंदगी मेरे घर आना भाग – ९ और अभी कैसे घूर रहा है, खा ही जाएगा जैसे। मन नहीं था तो क्यों आया? नहीं ले आता, तो कोई मर ...

इक समंदर मेरे अंदर - 11
द्वारा Madhu Arora
  • 126

इक समंदर मेरे अंदर मधु अरोड़ा (11) जब उनका परिवार पारस नगर पहुंचा और पिताजी बिल्डर के कार्यालय में गये तो उसने हंसकर कहा – ‘वेलकम सर जी ..वो ...

जय हिन्द की सेना - 12
द्वारा Mahendra Bhishma
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जय हिन्द की सेना महेन्द्र भीष्म ग्यारह नीले आकाश के नीचे अपने हवेलीनुमा घर की सबसे ऊँची छत पर श्वेत साड़ी में दरी के ऊपर बैठी शृंगार रहित होने ...

पूर्ण-विराम से पहले....!!! - 24
द्वारा Pragati Gupta
  • (19)
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पूर्ण-विराम से पहले....!!! 24. अब शिखा को समीर के जुड़े हुए सभी काम पूरे करने थे| सबसे पहले उसने समीर के अलमारियों में लगे हुए कपड़ों को जगह-जगह पर ...

गवाक्ष - 29
द्वारा Pranava Bharti
  • 108

गवाक्ष 29== स्वरा बंगाल की निवासी थी और बंबई में कार्यरत थी । सत्यनिष्ठ के संस्कार व व्यवहारों के प्रति आकर्षित हो वह उससे प्रेम करने लगी थी । संगीत की ...

बात बस इतनी सी थी - 11
द्वारा Dr kavita Tyagi
  • (12)
  • 414

बात बस इतनी सी थी 11. अगले दिन मैं निर्धारित समय से पहले एयरपोर्ट पर पहुँच गया । मंजरी एयरपोर्ट से बाहर आई, तो मैंने बाँहें फैलाकर उसका स्वागत ...

गूंगा गाँव - 12
द्वारा रामगोपाल तिवारी (भावुक)
  • 87

                              बारह गूंगा गाँव 12       अकाल का स्थिति में जितनी चिन्ता गरीब आदमी को अपने पेट पालने की रहती है उतनी ही तृष्णा घनपतियों को अपनी तिजोरी भरने ...

अंग्रेजियत पर हिंदी दिवस का कटाक्ष
द्वारा AKANKSHA SRIVASTAVA
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हिंदी को वनवास दे दिया,अंग्रेजी को राज हम हिंदुस्तानियों ने सत्तर साल में कैसा गढ़ दिया समाज , बदल गया हिंदी का इतिहास,फिर हावी हो गया अंग्रेजियत का एक ...

सुरतिया - 1
द्वारा vandana A dubey
  • 306

’नमस्ते बाउजी. कैसे हैं?’बाहर बरामदे में बैठे बाउजी यानी रामस्वरूप शर्मा जी, सुधीर के दोस्त आलोक के इस सम्बोधन और उसके पैर छूने के उपक्रम से गदगद हो गये. ’ठीक ...

अरक्षित
द्वारा Deepak sharma
  • 321

अरक्षित उनका घर इन-बिन वैसा ही रहा जैसा मैंने कल्पना में उकेर रखा था| स्थायी, स्वागत-मुद्रा के साथ घनी, विपुल वनस्पति; ऊँची, लाल दीवारों व पर्देदार खुली खिड़कियाँ लिए ...

नश्तर खामोशियों के - 4
द्वारा Shailendra Sharma
  • 183

नश्तर खामोशियों के शैलेंद्र शर्मा 4. किसी स्कूटर के स्टार्ट होने के स्वर से जैसे में नींद से जगी. मरे हुए लम्हों को बार-बार अपने भीतर जिंदा करते हुए,मैं ...

आवरण
द्वारा Raja Singh
  • 348

आवरण राजा सिंह विशेष सोच रहा हैं। आने का सम्भावित समय निकल गया हैं।.........अब तो सात भी बज चुके हैं। शंका-कुशंका डेरा डालने लगी थीं।.........अणिमा अब तक निश्चय ही ...

यारबाज़ - 16 - अंतिम भाग
द्वारा Vikram Singh
  • 285

यारबाज़ विक्रम सिंह (16) घर के अंदर प्रवेश करते ही जैसे ही मैं अपने जूते के तसमें खोलने लगा कि मां ने रसोई से ही मुझे कहना शुरू किया," ...

अपने-अपने इन्द्रधनुष - 6
द्वारा Neerja Hemendra
  • 186

अपने-अपने इन्द्रधनुष (6) काॅलेज से लौटते समय मेरी और चन्द्रकान्ता की इच्छा पुनः कुछ दूर पैदल चलने की हो रही थी। मार्ग में चलते हुए हम दोनों सायं की ...

आखा तीज का ब्याह - 9
द्वारा Ankita Bhargava
  • 303

आखा तीज का ब्याह (9) “ओहो, अब तो हमारी डॉ. वासंती होटल की मालकिन बन गयी है| अगर कभी हम तुम्हारे यहां घूमने आये तो तिलकजी को कह कर ...

30 शेड्स ऑफ बेला - 16
द्वारा Jayanti Ranganathan
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30 शेड्स ऑफ बेला (30 दिन, तीस लेखक और एक उपन्यास) Day 16 by Harish Pathak हरीश पाठक ठहरी हुई शाम बेला के कदम आगे बढ़ने से इंकार कर ...

दास्तानगो - 1
द्वारा Priyamvad
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दास्तानगो प्रियंवद अंतिम फ़्रांसीसी उपनिवेश के अंतिम अवशेषों पर, पूरे चाँद की रात का पहला पहर था जब यह द्घटना द्घटी। समुद्र की काली और खुरदरी चट्टानों पर चिपके ...

राम रचि राखा - 6 - 4
द्वारा Pratap Narayan Singh
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राम रचि राखा (4) सवेरे जब मुन्नर द्वार पर नहीं दिखे तो पहले माई ने सोचा कि दिशा-फराकत के लिए गए होंगे। परन्तु जब सूरज ऊपर चढ़ने लगा फिर ...