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कौन दिलों की जाने! - 9
by Lajpat Rai Garg Verified icon

कौन दिलों की जाने! नौ मकर संक्रान्ति मौसम ने करवट बदली। कुछ दिन पहले तक जहाँ सर्दी की जगह गर्मी का अहसास होने लगा था, अब दो—तीन दिन से ...

राहबाज - 11
by Pritpal Kaur Verified icon

रोजी की राह्गिरी (11) आसमान में छलांग यूँही अनुराग से मिलते उसके प्रेम में भीगते डूबते-उतरते ऐसे ही जीवंत दिन बीत रहे थे कि मुझे अपनी देह में कुछ ...

रेलगाड़ी में रीछ
by Kailash Banwasi

रेलगाड़ी में रीछ कैलाश बनवासी मैं इलाहाबाद जा रहा था।सारनाथ ए क्सप्रेस से। अकेले। अकेले यात्रा करना बड़ा ‘बोरिंग' काम है।उनके लिए तो और भी कष्टप्रद होता है जो ...

औघड़ का दान - 3
by Pradeep Shrivastava Verified icon
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औघड़ का दान प्रदीप श्रीवास्तव भाग-3 ‘हूं .... तुम्हारी सोफी की ज़िंदगी में बड़े पेंचोखम हैं। मायका-ससुराल नाम की कोई चीज बची नहीं है। ले दे के जुल्फ़ी और ...

अब जाग जाओ
by सिद्धार्थ शुक्ला
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#अब_जाग_जाओ_भाग१हल्की ठंड के मौसम में जब साफ आसमान होता है तो चंद्रमा की चांदनी अपना अलौकिक रूप लिए बरस रही होती है । चांदनी रात में किसी बगीचे में ...

वर्चुअल गर्लफ्रेंड
by r k lal Verified icon
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"वर्चुअल गर्लफ्रेंड" आर0 के0 लाल               दिल्ली से चेन्नई जाने वाली तमिलनाडु एक्सप्रेस के थर्ड एसी कोच के एक कंपार्टमेंट में बीच वाली बर्थ पर एक लड़की अपनी ...

इस दश्‍त में एक शहर था - 6
by Amitabh Mishra
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इस दश्‍त में एक शहर था अमिताभ मिश्र (6) हम वापस अपने कथा सूत्र को पकड़ते हैं। और विनायक भैया के कुछ पहलू जानने की कोशिश करते हैं। विनायक ...

बेघर सच
by Sudha Om Dhingra
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बेघर सच सुधा ओम ढींगरा ''सच तो मैं जानता हूँ। वह सच मैं तुम से उगलवाना चाहता हूँ; जिसे तुम मुझ से छिपा रही हो।'' संजय बड़ी कठोरता से ...

कौन दिलों की जाने! - 8
by Lajpat Rai Garg Verified icon
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कौन दिलों की जाने! आठ सुबह की चाय का समय ही ऐसा समय था, जब रमेश और रानी कुछ समय इकट्ठे बैठते और बातचीत करते थे। लोहड़ी से तीन—चार ...

राहबाज - 10
by Pritpal Kaur Verified icon
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मेरी राह्गिरी (10) नयी दोस्ती मेरा घर अब काफी संभल गया था. निम्मी और मेरे बीच जो दूरी धीरे-धीरे आ गई थी वो काफी हद तक दूर हो गयी ...

औघड़ का दान - 2
by Pradeep Shrivastava Verified icon
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औघड़ का दान प्रदीप श्रीवास्तव भाग-2 जब काम निपटा कर पहुंची बेडरूम में तो साढे़ ग्यारह बज रहे थे। बच्चे, पति सोते मिले। एक-एक कर दोनों बच्चों को उनके ...

ठौर ठिकाना - 1
by Divya Shukla
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ठौर ठिकाना (1) आज दिन भर की भागदौड़ ने बुरी तरह थका दिया था मुझे. घर में घुसते ही पर्स बेड उछाल दिया और सीधे वाशरूम में घुस गई. ...

मुख़बिर - 20
by राज बोहरे
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मुख़बिर राजनारायण बोहरे (20) मुठभेड़ मजबूतसिंह उस दिन अपने कंधे झुकाये जमीन पर आंख गढ़ाये हुए आता दिखा तो हम सबको उत्सुकता हुई । कृपाराम लपक के मजबूतसिंह से ...

परिवर्तन की लहर
by Anju Gupta
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मुक्ता लगभग 25 वर्ष की थी और शहर के नामी कॉलेज में अंग्रेजी विभाग में लेक्चरर थी l विभाग में ज्यादातर लोग बड़ी उम्र के थे , इसलिए उसका ...

राहबाज - 9
by Pritpal Kaur Verified icon
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निम्मी की राह्गिरी (9) वो छिप छिप कर मिलना दोनों डब्बे उठाये अनुराग के बारे में सोचती मैं घर चली आयी थी. घर आ कर माँ को मिठाई वाला ...

काश! ऐसा होता.....
by Sudha Om Dhingra
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काश! ऐसा होता..... सुधा ओम ढींगरा पति की नौकरी ही ऐसी थी कि देश-देश, शहर-शहर घूमते हुए अंत में, हम भूमण्डल के एक बड़े टुकड़े के छोटे से हिस्से ...

गाली की धिक्कार
by मन्नू भारती
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भारी कदमों के साथ वह आगे बढ़ा। जीवन में यह पहला अवसर नहीं था जब वह अपमानित हुआ या मानसिक प्रताड़ना के दंश ने उसके आंतरिक मन को कटिले ...

औघड़ का दान - 1
by Pradeep Shrivastava Verified icon
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औघड़ का दान प्रदीप श्रीवास्तव भाग-1 सीमा अफनाई हुई सी बहुत जल्दी में अपनी स्कूटी भगाए जा रही थी। अमूमन वह इतनी तेज़ नहीं चलती। मन उसका घर पर ...

वह लड़का
by Dr pradeep Upadhyay
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आज वह पन्द्रह वर्ष के बाद मुझसे मिलने आया था---हाथों में मिठाई का डिब्बा था।जैसे ही मैंने ड्राईंग रूम में प्रवेश किया, वह उठकर खड़ा हो गया, मेरे चरण ...

इस दश्‍त में एक शहर था - 5
by Amitabh Mishra
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इस दश्‍त में एक शहर था अमिताभ मिश्र (5) अब जो दूसरी पत्नी की दो लड़कियां थीं वे बहुत ज़हीन, सुन्दर, पढ़ने लिखने में अव्वल और नौकरियां भी अच्छी ...

कौन दिलों की जाने! - 7
by Lajpat Rai Garg Verified icon
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कौन दिलों की जाने! सात प्रथम जनवरी, नववर्ष का प्रथम प्रभात धुंध या कोहरे का कहीं नामो—निशान नहीं था, जैसा कि इस मौसम में प्रायः हुआ करता है। आकाश ...

लाख़ बहाने
by Vijay 'Vibhor'
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पण्डित भगवानदास जी का भरापूरा परिवार है। परिवार में सात बेटे, बेटों की पत्नीयाँ। पन्द्रह पोते-पोतियों की किलकारियों के संगीत से हर वक्त एक मनोहारी वातावरण घर में बना ...

चिंदी चिंदी सुख थान बराबर दुःख - 4 - अंतिम भाग
by Divya Shukla
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चिंदी चिंदी सुख थान बराबर दुःख (4) जब चार पैसे आने लगे तो सास को बहू भी याद आई | वह भी साल में एक दो चक्कर लगा ही ...

मुख़बिर - 19
by राज बोहरे
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मुख़बिर राजनारायण बोहरे (19) चिट्ठी मैंने सुनाना आरंभ किया । हम लोग दोपहर को एक पेड़ के नीचे बैठे थे कि दूर से धोती कुर्ता पहने बड़े से पग्गड़ ...

लुटलुटी
by Satish Sardana Kumar
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राजबीर थानेदार जाति से जाट था।वह इंसानों और घटनाओं को जातीय खाँचे में फिट करके सोचने का आदी था।वह कोई सीधा थानेदार भर्ती नहीं हुआ था बल्कि कांस्टेबल से ...

राजनीति
by Shikha Kaushik
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शाम ढलने लगी थी .आधा नवम्बर बीत चुका था .सुहानी हवाओं में बर्फ की ठंडक घुलने लगी थी .शॉल ओढ़कर साहिल खिड़की से बाहर के नज़ारों को देखने लगा ...

“उल्लेखनीय भारतीय संस्कृति जो भारत को अद्भुत बनाती हे”
by Narendra Rajput
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भारतीय संस्कृति का उल्लेख सिर्फ देश में नहीं विदेशों में भी किया जाता है। संस्कृति का मान सम्मान भारत में ही होता है जिसके कारण अन्य देश भी भारतीय ...

कौन दिलों की जाने! - 6
by Lajpat Rai Garg Verified icon
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कौन दिलों की जाने! छः 31 दिसम्बर रात को आठ बजे प्रधानमन्त्री जी का राष्ट्र के नाम सन्देश प्रसारित होना था, इसलिये आलोक ने सात बजे ही सामने वाले ...

राहबाज - 8
by Pritpal Kaur Verified icon
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निम्मी की राह्गिरी (8) मैं प्यार हूँ मैं ठन्डे पानी से नहाती हूँ हर रोज़. पानी की धार तेज़ी के साथ मेरे सामने रखी बाल्टी को भर रही है. ...

ठहरी हुई धूप
by Kailash Banwasi
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ठहरी हुई धूप कैलाश बनवासी हमेशा की तरह मम्मी ने ही जगाया था—ए-ए–s s s ई सीटू ! उठो ! ऊँ s s s अ.... वह नींद में कुनमुनाया. ...