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यजुर्वेद सूक्ति (4) की व्याख्या मा भेर्मा संविक्था अऊर्ज धतस्व"यजुर्वेद --6/35 भ...
शीर्षक: " अंतिम चिट्ठी"एक छोटे से पहाड़ी गाँव में रहने वाला सोलह वर्षीय आरव हर र...
जो लोग हमें हमारी कमियाँ बताते हैं, वे हमेशा हमें असहज कर सकते हैं… लेकिन अक्सर...
अध्याय १: बिसात के मोहरे दृश्य १: खाकी का रौब और छिपा हुआ गुलाब रात के करीब दो ब...
मेहमानस्टेशन पर काफी भीड़ थी। सुबह साढ़े 9 बजे भी दिल्ली दौड़ रही थी। यात्री अपन...
---*नॉवेल: "पांच वादों की दुल्हन"* *Chapter 5: प्यार या बदला? ~ 1200 शब्द*आज बुध...
एक आम सी प्रेम कहानी भाग-३लेखिका "अनामिका"भाग-३: पन्नों की खुशबू और एक खट्टी-मीठ...
52----------- ( एक चोट )नसीब आदमी से कया कया नहीं कराता, आदमी कठपुतली है परमात्म...
निर्मला घबराकर कहती है ---निर्मला :- सुनिये ना जी । वो निधी अभी तक घर नही आई है...
हम अक्सर जिंदगी में उन चीजों को हासिल करने के लिए दिन-रात दौड़ रहे हैं, जिन्हें...
मानव में ईश्वरीय आस्था बहुत कुछ ज्ञान-सापेक्ष होती है- जहां मानवीय ज्ञान की सीमा रेखा आ जाती है और अज्ञान के अंधकार का साम्राज्य प्रारम्भ होता है, वहीं मानव ईश्वर का अवलम्ब प्राप्त...
परियों का पेड़ (1) राजू एक लकड़हारे का बेटा था | उसके पिताजी जंगल से पेड़ काटकर लकड़ियाँ लाते | फिर उन्हें बाजार में बेच देते | उसकी माँ लकड़ियों से ही कुछ खिलौने भी बना लेती थी, जिसे ब...
मेगा 325 हरीश कुमार 'अमित' (1) ''वैरी-वैरी हैप्पी बर्थडे, बड़े दादू।'' कहते हुए शशांक ने दादा जी को जगाया. शशांक की आवाज़ सुनते ही बड़े दादा जी एकदम से उठ गए....
भीड़ में (1) सुनकर चेहरा खिल उठा था उनका. उम्र से संघर्ष करती झुर्रियों की लकीरें भाग्य रेखाओं की भांति उभर आई थीं. आंखें प्रह्लाद पर टिकाकर पूछा, “कहां तय की लल्लू ने शादी?” “आपको...
आज ही हरिद्वार से देहरादून आया हूँ। सच में देहरादून की खूबसूरती के बारे में जितना सुना है उससे कहीं ज्यादा खूबसूरत जगह है यह। रास्ते भर प्रकृति की सुंदरता देखता आया पर यहाँ इस पुलि...
अरे सर, रुटना रुटना ...अविनाश दौड़ता-चिल्लाता आया। -क्या हुआ? मैं पीछे देख कर चौंका। -सर, टन्सेसन मिलेडा। -अरे कन्सेशन ऐसे नहीं मिलता। मैंने लापरवाही से कहा। -तो टेसे मिलटा है?...
हम सब बच्चपन से ही अलादीन और उसके जीनी की रोमांचक कहानी बड़े चाव के साथ सुनते हैं किन्तु क्या आप जानते हैं की समान्य रूप से जीनों का रहन सहन किसी चिराग में नहीं होता बल्कि वह तो भव...
एबॉन्डेण्ड - प्रदीप श्रीवास्तव भाग 1 इसे आप कहानी के रूप में पढ़ रहे हैं, लेकिन यह एक ऐसी घटना है जिसका मैं स्वयं प्रत्यक्षदर्शी रहा हूं। चाहें तो आप इसे एक रोचक रिपोर्ट भी कह सकते...
कभी अलविदा न कहना डॉ वन्दना गुप्ता सारांश प्रस्तुत उपन्यास मुख्यतः प्रेम के धरातल पर लिखा गया है। संयुक्त परिवार में रह रही नायिका जब नौकरी करने दूसरे शहर में जाती है, तब बदलते परि...
आज से करीब बीस-इक्कीस साल पहले कॉलेजिस में लड़कियां बहुत कम हुआ करती थीं और इसी कारण वह हमेशा आकर्षण का केंद्र रहती थीं | उस ज़माने में कॉलेजिस में रैगिंग एक आम बात थी और कॉलेज प्रशा...
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