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अगले ही पल...लियो ने धीरे से मेरे माथे पर अपने होंठ रख दिए।वह सिर्फ एक चुंबन नही...
संघर्ष अभी जारी है...खुशबू दो दिन से अस्पताल में भर्ती थी। प्रसव की घड़ी नजदीक थ...
शहर में चारो तरफ़ ठंड का सन्नाटा छाने लगा, सड़को पर गहरे अंधेरे ठंडे माहौल को और...
गोदाम की सर्द और घनी हवा में खून की सोंधी महक फैल चुकी थी।उम्र के इस पड़ाव पर भी...
कुछ देर बाद…शिवांश…श्रेया की बाहों में ही सो गया…उसकी धीमी-धीमी साँसें…और मासूम...
18 जॉय का खोना थोड़ी देर बाद , आकाश मे काले बादल देखकर वह अपने ख्याल से बाहर आता...
मुंबई की बारिश और शाम की लोकल ट्रेन—दोनों का मिज़ाज एक जैसा था, कभी भी किसी की ज...
चार दिन की शान।एक बेटे की ज़िद… और एक परिवार की कीमत️ लेखककान्तिभाई राठौड़ '...
(नूरगढ़ के मुख्य चौराहे पर पसरा सन्नाटा अब तनाव में बदल चुका था। हवा में अभी भी...
भाग १० — डूबते सूरज को अर्घ्यसुबह की पहली किरण अभी गाँव की गलियों तक पहुँची भी न...
एक ऐसी दुनिया जहां कमजोरो की कोई जगह नहीं बस ताकतवर लोग ही हुकूमत चलते है और ताकत का मतलब है "पैसा" अगर तुम्हारे पास पैसा है तो तुम दुनिया की हर चीज हासिल कर सकते हो। लोग आ...
"क्या है जिंदगी हक़िक़त या छलावा या कोई भ्रम? इतनी मुद्दत की जिंदगी जिसे हम हक़िक़त समझते रहे क्या वो छलावा थी, क्या सबकुछ सिर्फ एक भ्रम था? क्या हक़िक़ि ज़िंदगी अब शुरू हुई है...
चारों तरफ एक ऐसी रोशनी थी जो धूप से छनकर, हल्की सी अयान के चेहरे पर पड़ रही थी। अयान रॉय, अपनी कोठी की बालकनी में खड़ा था। हवा में, एक शाही रसूख की महक थी। उसने अपनी शर्ट की आस्तीन...
बड़ा सा फ्लैट…जहाँ पहले हँसी गूंजती थी, वहाँ अब एक अजीब-सी खामोशी थी। 7 साल का शिवांश दौड़ता हुआ अपने पापा करण के पास आया…उसकी आँखों में मासूम खुशी थी। लेकिन जैसे ही वो करीब पहुँचा...
मैं... अपने ऑफिस का काम जल्द से जल्द निपटाने में व्यस्त था तभी मुझे कुछ हल्की सी चिल्लाने की आवाज सुनाई दी, पर मुझे अपने ऑफिस का काम जल्दी खत्म करना था इसलिए मैंने उस आवाज को नजर...
(नूरगढ़ की चौड़ी पक्की सड़क पर ढलती हुई धूप ने एक अजीब सी चमक बिखेर रखी थी। हवा में हल्की ठंडक और आसपास के खेतों से आती हुई सौंधी खुशबू घुली हुई थी। गाँव के बाहर से गुजरने वाले मुख...
गंगा के किनारे बसा वह छोटा-सा गाँव सूर्योदय के साथ ही जाग जाता था। सुबह के पाँच बजे थे। आसमान अभी अँधेरा था, लेकिन पूरब की दिशा में हल्की लालिमा दिखाई देने लगी थी। दूर मंदिर...
रात के ठीक ग्यारह बज चुके थे। यूपी से बिहार जाने वाली इस एक्सप्रेस ट्रेन का थर्ड एसी कोच लगभग पूरी तरह से शांत हो चुका था। ट्रेन के पहियों की पटरियों से टकराने वाली छुक-छुक की लयबद...
बचपन की पहली यादें कुछ यादें ऐसी होती हैं जिन्हें हम चाहकर भी भूल नहीं पाते। वे यादें किसी तस्वीर की तरह हमारे मन में टंगी रहती हैं। वक्त गुजरता जाता है, उम्र बढ़ती जाती है,...
समर्पित उन सभी स्त्रियों को जो किसी न किसी बंधन में जकड़ी हुई हैं। प्रस्तावना यह कहानी मेरा पहला सह-लेखन प्रयास है। मेरे और पृथ्वी गोहेल के विचारों को प्रस्तुत करने की एक...
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