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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई By Ramesh Desai

उस वक़्त मैं तीन साल का था, मेरा बड़ा भाई सुखेश पांच साल का था औऱ मेरी छोटी बहन भाविका केवल छह महिने की थी. उस वक़्त मेरी मा असाध्य बीमारी का शिकार हो गई थी.

उन्हें कांदिव...

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लाल दाग़ By ARTI MEENA

कक्षा में अचानक ठहाकों की आवाज़ गूँज उठी।Sneha ने इधर-उधर देखा तो पाया कि सब बच्चे उसी की ओर घूर-घूरकर देख रहे थे और हँस भी रहे थे।लड़कियाँ Sneha को देख कर अजीब-सी मुस्कान लिए खड़ी...

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सदियों से तुम मेरी By Pooja Singh

सुबह की हल्की धूप खिड़की से होकर दिव्या के कमरे में फैल रही थी। अलार्म बजने से पहले ही उसकी आँख खुल गई थी। वह कुछ पल यूँ ही छत को देखती रही, जैसे किसी अधूरे सपने को याद करने की कोश...

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मैं दादा-दादी की लाड़ली By sapna

मैं अपने बचपन में दादा-दादी की लाड़ली थी।उनकी आँखों का नूर, उनके आँगन की सबसे प्यारी हँसी।घर में अगर कोई सबसे पहले मेरी ओर देखता था,तो वे दादा-दादी ही होते थे।उनके लिए मैं केवल उनक...

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वेदान्त 2.0 By Vedanta Life Agyat Agyani

1. प्रारंभिक स्वरूप
परंपरागत मानसिकता में पूजा–पाठ धर्म का आरंभिक और सबसे प्रचलित रूप है।
यह वह अवस्था है जहाँ व्यक्ति बाह्य देवताओं या प्रतीकों की आराधना करता है,
मंत्रोच्चार औ...

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मन के अल्फाज - ख्वाहिश की कविताएं। By khwahishh

1.स्याही का दामन। मेरे लफ्जो ने स्याही का दामन थाम लिया है। अब लिखूँगी मैं अपनी किश्मत अपने ही हाथो से। लिखूँगी अपना हर ख्वाब कायम,कोई अधूरी ख्वाहिश ना छूटने दूंगी।भर दूंगी रंग आशम...

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बिल्ली जो इंसान बनती थी By Sonam Brijwasi

Heroine: शानवी सिंह
Hero: कार्तिकेय (दिन में बिल्ली, रात में इंसान)

शानवी सिंह को अकेलापन काटने दौड़ता था।
बड़े शहर में छोटी सी नौकरी, छोटा सा कमरा और दिन भर का शोर… लेकिन रात...

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त्रिशा... By vrinda

यह शब्द सुना तो बहुत था, बचपन में इस पर निबंध भी बहुत लिखे थे पर मेरे लिए यह शब्द तब तक अस्तित्व में नहीं था जब तक की मुझे मेरी सहेली ने इसका असल अर्थ समझाया नहीं था।

मेरे पिताज...

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अदृश्य पीया By Sonam Brijwasi

सुनीति ऑफिस से वापस आती है। उसके चेहरे पर थकान और उदासी साफ झलक रही है।
आज ऑफिस में बॉस ने उसे डाँट दिया था। पहली बार उसे अपने आप पर भरोसा टूटा हुआ लगा।
कमरे में आते ही वो ज़मीन पर...

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अधूरा इश्क़ एक और गुनाह By archana

निधि की नन्ही उम्मीद”

(श्रृंखला: निधि – मौन प्रेम की कहानी)

सुधांशु की अनुपस्थिति में जब निधि ने बेटी को जन्म दिया, तब पहली बार उसके चेहरे पर शांति की झलक आई थी।
वो मुस्कुरा...

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यादो की सहेलगाह - रंजन कुमार देसाई By Ramesh Desai

उस वक़्त मैं तीन साल का था, मेरा बड़ा भाई सुखेश पांच साल का था औऱ मेरी छोटी बहन भाविका केवल छह महिने की थी. उस वक़्त मेरी मा असाध्य बीमारी का शिकार हो गई थी.

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लाल दाग़ By ARTI MEENA

कक्षा में अचानक ठहाकों की आवाज़ गूँज उठी।Sneha ने इधर-उधर देखा तो पाया कि सब बच्चे उसी की ओर घूर-घूरकर देख रहे थे और हँस भी रहे थे।लड़कियाँ Sneha को देख कर अजीब-सी मुस्कान लिए खड़ी...

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सदियों से तुम मेरी By Pooja Singh

सुबह की हल्की धूप खिड़की से होकर दिव्या के कमरे में फैल रही थी। अलार्म बजने से पहले ही उसकी आँख खुल गई थी। वह कुछ पल यूँ ही छत को देखती रही, जैसे किसी अधूरे सपने को याद करने की कोश...

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मैं दादा-दादी की लाड़ली By sapna

मैं अपने बचपन में दादा-दादी की लाड़ली थी।उनकी आँखों का नूर, उनके आँगन की सबसे प्यारी हँसी।घर में अगर कोई सबसे पहले मेरी ओर देखता था,तो वे दादा-दादी ही होते थे।उनके लिए मैं केवल उनक...

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वेदान्त 2.0 By Vedanta Life Agyat Agyani

1. प्रारंभिक स्वरूप
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मन के अल्फाज - ख्वाहिश की कविताएं। By khwahishh

1.स्याही का दामन। मेरे लफ्जो ने स्याही का दामन थाम लिया है। अब लिखूँगी मैं अपनी किश्मत अपने ही हाथो से। लिखूँगी अपना हर ख्वाब कायम,कोई अधूरी ख्वाहिश ना छूटने दूंगी।भर दूंगी रंग आशम...

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बिल्ली जो इंसान बनती थी By Sonam Brijwasi

Heroine: शानवी सिंह
Hero: कार्तिकेय (दिन में बिल्ली, रात में इंसान)

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सुनीति ऑफिस से वापस आती है। उसके चेहरे पर थकान और उदासी साफ झलक रही है।
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कमरे में आते ही वो ज़मीन पर...

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(श्रृंखला: निधि – मौन प्रेम की कहानी)

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वो मुस्कुरा...

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