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आपत्ति क्यों आख़िर ??
द्वारा Pranava Bharti

आपत्ति क्यों आख़िर ??---------------------------      भ्रमित होने की कोई बात तो नहीं थी ,मन ही तो है ---हो जाता है भ्रमित ! होता ही रहता है ---दुःख -सुख ...

लहराता चाँद - 2
द्वारा Lata Tejeswar renuka

लहराता चाँद लता तेजेश्वर 'रेणुका' 2 शादी के 2 साल के बाद डॉ.संजय ने खुद का एक क्लिनिक खोला। हड्डियों और नशों के बड़े से बड़े ऑपरेशन बहुत ही ...

उलझन - 5
द्वारा Amita Dubey

उलझन डॉ. अमिता दुबे पाँच एक दिन पापा घर पर ही थे। आज सुबह से ही उनकी तबियत कुछ खराब थी। इसी कारण बादल भी रहमान के साथ नहीं ...

गूगल बॉय - 9
द्वारा Madhukant

गूगल बॉय (रक्तदान जागृति का किशोर उपन्यास) मधुकांत खण्ड - 9 अपनी दिनचर्या पूरी करने के बाद गूगल एक बार बाँके बिहारी के मन्दिर में गया और गिन्नियों की ...

जिंदगी मेरे घर आना - 12
द्वारा Rashmi Ravija

जिंदगी मेरे घर आना भाग – १२ उदास चेहरा लिए वह घर भर में घूमती रहती है... पर किसी को कोई गुमान ही नहीं। सब समझते हैं एग्जाम की ...

फिर महकेगा जीवन
द्वारा padma sharma

उपहार सतीश ने बिस्तर पर लेटे - लेटे दीवार घड़ी पर नजर डाली सात बज गये थे । आज बिरजू नहीं आया वर्ना बर्तनों की आवाज आने लगती । ...

इक समंदर मेरे अंदर - 14
द्वारा Madhu Arora

इक समंदर मेरे अंदर मधु अरोड़ा (14) उस समय कामना को मैनापॉज का अर्थ पता ही नहीं था। उसे यह भी नहीं पता था कि एक उम्र के बाद ...

जय हिन्द की सेना - 14
द्वारा Mahendra Bhishma

जय हिन्द की सेना महेन्द्र भीष्म चौदह बीस जनवरी, उन्नीस सौ बहत्तर की प्रातः आठ बजे पाँच सदस्यीय दल मध्यप्रदेश की पुरानी रियासत सूरजगढ़ पहुँचा। इस दल में एक ...

गवाक्ष - 32
द्वारा Pranava Bharti

गवाक्ष 32== अक्षरा शनै:शनै: सामान्य होने का प्रयत्न कर रही थी किन्तु आसान कहाँ होता है इस प्रकार की दुर्घटना के पश्चात सामान्य होना। वह दर्शन की छात्रा थी इसीलिए इतनी ...

बात बस इतनी सी थी - 14
द्वारा Dr kavita Tyagi

बात बस इतनी सी थी 14. सुबह उठकर मैंने अपनी दिनचर्या का पालन वैसे ही किया, जैसे पिछले एक सप्ताह से करता आ रहा था । मैं सुबह जल्दी ...

पटना से चिट्ठी आई
द्वारा Dr Shilpi Jha

हर कहानी की किस्मत में एक अदद शुरुआत और मुकम्मल अंत नहीं होता। कुछ वृत में तरह घूमते रहने को अभिशप्त भी होती हैं। छोटे शहर के अनाम मुहल्ले ...

लीव इन लॉकडाउन और पड़ोसी आत्मा - 2
द्वारा Jitendra Shivhare

लीव इन लॉकडाउन और पड़ोसी आत्मा जितेन्द्र शिवहरे (2) धरम अपने घरवालों से फोन पर बात कर रहा था। यह देखकर टीना ने भी पिता विश्वनाथ को अपनी खैरियत ...

छठी
द्वारा Deepak sharma

छठी गाड़ी अभी बालामऊ में ही थी जब माँ ने सीट के नीचे से सारा सामान निकालकर हमें सब समझा दिया- दोनों थैले सुमन के जिम्मे रहेंगे और खाने ...

आखा तीज का ब्याह - 12
द्वारा Ankita Bhargava

आखा तीज का ब्याह (12) वासंती के तलाक के बाद से ही उसके परिवार का कोई भी सदस्य उससे बात ही नहीं कर रहा था| यहाँ तक की उसने ...

दास्तानगो - 4
द्वारा Priyamvad

दास्तानगो प्रियंवद ४ दरवाजे पर तेज दस्तक हुयी। यह लड़की की दस्तक से अलग थी। इसमें संकोच और विनम्रता नहीं थी। यह कई हाथों की धमक से भरी थी। ...

30 शेड्स ऑफ बेला - 19
द्वारा Jayanti Ranganathan

30 शेड्स ऑफ बेला (30 दिन, तीस लेखक और एक उपन्यास) Day 19 by Sumita Chakrobarty सुमिता चक्रवर्ती कुछ तेरी-कुछ उसकी कहानी फिर दादी… दादी के अलावा जिंदगी के ...

राम रचि राखा - 6 - 7
द्वारा Pratap Narayan Singh

राम रचि राखा (7) लगभग एक सप्ताह गुजर चुका था उन्हें इस गाँव में आये। एक दिन संकठा सिंह पड़ोस के गाँव से किसी पंचायत का फैसला करके अपनी ...

प्रतिदान
द्वारा Raja Singh

प्रतिदान राजा सिंह साहेब का ट्रान्सफर हो गया था, उनके चेहरे से प्रसन्नता निकल-निकल रही थी। शारीरिक भाषा बया कर रही थी कि वह कितने प्रसन्न है। वह अपने ...

अपने-अपने इन्द्रधनुष - 8
द्वारा Neerja Hemendra

अपने-अपने इन्द्रधनुष (8) मैं समझ चुकी थी कि विक्रान्त मुझसे निकटता बढ़ाने के लिए ही ऐसा करता है। अपनी पत्नी को तलाक दे चुका है, संपन्न घर का है, ...

सुरतिया - 3
द्वारा vandana A dubey

आप सोच रहे होंगे कि हम इतना सब क्यों बता रहे? अरे भाई! न बतायें, तो आप बाउजी को जान पायेंगे? नहीं न? तो चुपचाप पढ़िये उनके बारे में.  ...

छल
द्वारा Pavitra Agarwal

छल पवित्रा अग्रवाल "दीदी मेरी एक सहेली मुसीबत में है। असल में वह एक धोखे का शिकार हो गई है। आपसे कुछ सलाह-मशवरा करना चाहती है। आपसे बिना पूछे ...

सड़क पार की खिड़कियाँ - 3
द्वारा Nidhi agrawal

सड़क पार की खिड़कियाँ डॉ. निधि अग्रवाल (3) स्वर मासूम है। मैं अपने द्वंद से स्वयं ही आहत। सपने भी हमें रुला सकते हैं। आभासी दुनिया यथार्थ से अधिक ...

गूगल बॉय - 8
द्वारा Madhukant

गूगल बॉय (रक्तदान जागृति का किशोर उपन्यास) मधुकांत खण्ड - 8 सुबह-सुबह गूगल माँ के साथ उठ बैठा। माँ की आदत थी सुबह साढ़े चार बजे से पाँच के ...

एनीमल फॉर्म - 10 - अंतिम भाग
द्वारा Suraj Prakash

एनीमल फॉर्म जॉर्ज ऑर्वेल अनुवाद: सूरज प्रकाश (10) वर्ष़ों बीत गए। मौसम आए और गए। अल्पजीवी पशु अपनी जीवन-लीला समाप्त कर गए। एक ऐसा भी वक्त आया जब क्लोवर, ...

जिंदगी मेरे घर आना - 11
द्वारा Rashmi Ravija

जिंदगी मेरे घर आना भाग – ११ सर ने क्या पढ़ाया कुछ भी नहीं गया दिमाग तक... बेल लगते ही... डेस्क फलांगती पहुँच गई, अपनी पसंदीदा जगह पर। केमिस्ट्री ...

इक समंदर मेरे अंदर - 13
द्वारा Madhu Arora

इक समंदर मेरे अंदर मधु अरोड़ा (13) बादल एक दूसरे को धकियाते हुए तैरते से लगते थे और उनसे जब पानी बरसता था, तो लगता था मानो वे मोती ...

गवाक्ष - 31
द्वारा Pranava Bharti

गवाक्ष 31== डॉ. श्रेष्ठी एक ज़हीन, सच्चरित्र व संवेदनशील विद्वान थे। वे कोई व्यक्ति नहीं थे, अपने में पूर्ण संस्थान थे 'द कम्प्लीट ऑर्गेनाइज़ेशन !'उनका चरित्र शीतल मस्तिष्क व गर्म ...

गूंगा गाँव - 14 समाप्त
द्वारा रामगोपाल तिवारी (भावुक)

                          चौदह गूंगा गाँव 14      जनजीवन से जुड़ी कथायें ही भारत की सच्ची तस्वीर है।’ यह बात हमारे मन-मस्तिष्क में उठती रही है। किन्तु इस प्रश्न को हल ...

मुक्ति-धाम
द्वारा Nisha chandra

मुक्ति-धाम कहते हैं, एक बार मुक्ति ने भगवान से प्रार्थना करते हुए प्रश्न किया कि ‘ हे गोपाल! हे कृष्ण ! मैं सबको मुक्ति दिलाती हूँ, लेकिन मेरी मुक्ति ...

लहराता चाँद - 1
द्वारा Lata Tejeswar renuka

लहराता चाँद लता तेजेश्वर 'रेणुका' लहराता चाँद, (उपन्यास) सिर दर्द से फटा जा रहा था। आँखें भारी-भारी -सी लग रही थी। वह उठने की कोशिश कर रही थी पर ...

क्या नाम दूँ ..! - 2
द्वारा Ajay Shree

गातांक से आगे.... क्या नाम दूँ ..! अजयश्री द्वितीय अध्याय सूरज आज भी अपने समय और जगह पर था, बस दिन बदल गया| पण्डित जटाशंकर मिश्र की टन-टन घंटी ...

उलझन - 4
द्वारा Amita Dubey

उलझन डॉ. अमिता दुबे चार अंशिका बहुत दुविधा में है। यह बात वह सौमित्र को बताये या न बताये। यदि वह सौमित्र को बताती है तो कहीं वह मैम ...