EPISODE 2
(ज़ोरदार टकराव)
जब अभिमान अपनी बात कहकर बैठ जाता है, तो अन्वेषा खड़ी होती है। उसने फ़ाइल का एक हिस्सा उठाया।
अन्वेषा (शांत, पर आवाज़ में दम): "राठौड़ जी, आपकी भावनाएँ समझती हूँ। पर मेरी रिपोर्ट के हिसाब से, इस योजना के क़ानूनी दस्तावेज़ों में बड़ी कमियाँ हैं। कुछ ज़मीन अधिग्रहण और पर्यावरण की मंज़ूरी में नियमों को ज़ाहिर तौर पर नज़रअंदाज़ किया गया है।"
पूरा कमरा एकदम शांत हो जाता है। सरकारी अफ़सरों के चेहरे पीले पड़ जाते हैं।
अन्वेषा (आवाज़ में सख़्ती): "मैं इस प्रोजेक्ट को पास नहीं कर सकती। मुझे हर दस्तावेज़ को पूरी ईमानदारी से जाँचने के लिए दस दिन का वक़्त चाहिए।"
अभिमान की आँखों में अहंकार की चोट साफ दिखती है। यह पहली बार था जब उसके अधिकार को किसी ने खुलेआम चुनौती दी थी।
अभिमान (धीरे से, पर आवाज़ में चेतावनी): "दस दिन? अन्वेषा जी, आप शायद नहीं जानतीं, पर मेरे एक हाँ कहने से हज़ारों लोगों को फ़ायदा होता है। यह वक़्त की बर्बादी नहीं, तो और क्या है?"
अन्वेषा (उनकी आँखों में देखती है, बिना डरे): "आप सही कह रहे हैं, राठौड़ जी। पर मेरे एक ग़लत हाँ कहने से हज़ारों लोगों के साथ अन्याय हो सकता है। मैं दस दिन ज़रूर लूँगी। क्योंकि मेरे लिए ड्यूटी पहले है, और आपकी ताक़त बाद में।"
(जुनून का जन्म और पर्सनल अटैक)
अभिमान कुछ देर तक अन्वेषा को देखता रहा। उसके चेहरे पर अब गुस्सा नहीं, बल्कि एक अजीब आकर्षण और अधिकार का भाव था।
वह मुस्कुराता है और अपने असिस्टेंट को मीटिंग ख़त्म करने का इशारा करता है। जैसे ही लोग जल्दी-जल्दी बाहर निकलने लगते हैं, अभिमान जानबूझकर अन्वेषा के पास आता है।
अभिमान (फुसफुसाता है, सिर्फ़ अन्वेषा सुन सके): "आपकी ईमानदारी... बहुत ख़ूबसूरत है, अन्वेषा जी। मैंने सुना है कि आप ओडिसी डांसर हैं। कला, ड्यूटी, ईमानदारी... ये सब चीज़ें आपको बहुत ख़ास बनाती हैं।"
अन्वेषा (थोड़ा असहज होती है, क्योंकि यह पर्सनल अटैक था): "यह मेरी ड्यूटी से जुड़ा नहीं है, राठौड़ जी।"
अभिमान (उसके नज़दीक झुकता है, उसकी साँसें अन्वेषा को महसूस होती हैं): "यह जुड़ा है। क्योंकि जो चीज़ ताक़तवर होती है, उसे कोई और नहीं, मैं कंट्रोल करता हूँ। आपने मेरी हुक़ूमत को चुनौती दी है। अब मैं यह तय करूँगा कि आपकी ईमानदारी किस चीज़ के लिए काम करेगी।"
अन्वेषा (हिम्मत जुटाकर, पर आवाज़ में डर की हल्की सी झिलमिलाहट): "मेरी आत्मा पर किसी की हुक़ूमत नहीं चलती, राठौड़ जी। आप अपनी सीमा में रहें।"
अभिमान एक पल के लिए रुकता है। उसका जुनून अब चरम पर था। वह जानता है कि इस लड़की को सिर्फ़ राजनीतिक दबाव से नहीं पाया जा सकता।
अभिमान (मन में, ज़ोरदार): "मुझे यह लड़की चाहिए। इसका आत्म-विश्वास, इसका अधिकार... यह सब मेरा होगा। अब यह खेल ड्यूटी का नहीं, मेरे जुनून का होगा।"
वह मुस्कुराता है, अपने कोट को ठीक करता है और दरवाज़े की तरफ़ जाने लगता है।
दरवाज़े से बाहर निकलने से ठीक पहले, अभिमान रुकता है, पलटता है और अन्वेषा की आँखों में देखता है।
अभिमान (एकदम ठंडी, फ़ाइनल लाइन): "दस दिन नहीं, अन्वेषा जी। आपके पास कल सुबह तक का वक़्त है। अगर मेरी योजना पास नहीं हुई... तो मैं वादा करता हूँ... आपका ईमानदार करियर और आपका यह शांत जीवन... दोनों हमेशा के लिए ख़त्म हो जाएंगे। अब देखते हैं, आपकी ड्यूटी ज़्यादा मज़बूत है, या मेरी हुक़ूमत।"
वह दरवाज़ा खोलकर, अपने असिस्टेंट के साथ, तेज़ी से निकल जाता है।
अन्वेषा वहीं खड़ी रह जाती है। उसके हाथ में फ़ाइल काँप रही थी। उसे पता था, आज उसकी मुलाक़ात किसी राजनेता से नहीं, बल्कि एक जुनूनी, ताक़तवर तूफ़ान से हुई थी। वह तूफ़ान, जो उसे अपने सफ़र-ए-दिल पर ज़बरदस्ती खींचने वाला था।
मेरी कलम से...✍️🦋
नमस्ते प्यारे पाठकों!
आज मैंने 'सफ़र-ए-दिल' की अपनी कलम से पहली कड़ी आप सबके सामने रखी है। यह कहानी सिर्फ कागज़ पर लिखे हुए शब्द नहीं हैं, बल्कि दो अलग-अलग संस्कृतियों, दो जिद्दी विचारधाराओं और एक अटूट जुनून का संगम है।
अन्वेषा और अभिमान—एक पूरब की शांति है, तो दूसरा पश्चिम का तूफान। मैंने कोशिश की है कि आप राजस्थान की उस तपती रेत की गर्मी और ओडिशा के समुद्र की उस ठंडी हवा को एक साथ महसूस कर सकें।
क्या सच में सत्ता के आगे ईमानदारी झुक जाती है? या फिर कभी-कभी ईमानदारी ही सत्ता का सबसे बड़ा जुनून बन जाती है? अभिमान राठौड़ ने अन्वेषा को कल सुबह तक का समय दिया है, पर उसे शायद अंदाज़ा नहीं है कि उसने जिस आग को चुनौती दी है, वह उसे भी जला सकती है। यह तो बस एक शुरुआत है, आगे-आगे देखिए कैसे नफ़रत अपना रंग बदलती है।
अपनी रेटिंग और कमेंट के ज़रिए मुझे ज़रूर बताइएगा। आपके शब्द मुझे इस 'सफ़र' को और भी खूबसूरत बनाने की ताकत देंगे।
जुड़े रहिए, क्योंकि असली जंग तो अभी शुरू हुई है!
शुक्रिया और ढेर सारा प्यार,
आपकी Abantika 🦋🌸