जिंदगी से मुलाकात - भाग 14 Rajshree द्वारा लघुकथा में हिंदी पीडीएफ

जिंदगी से मुलाकात - भाग 14

रिया की आंखें अचानक से साइझ से कुछ ज्यादा ही बड़ी हो गई और आश्चर्य से मुंह खुल गया। आँखे कुछ सोचकर मिचमिचाने लगी। यह मिसेज जोशी का लड़का है विजय जोशी, लेकिन वह तो 15 साल पहले... आंटी इसके लिए इतने आंसू बहा रही थी। अंकल आंटी को छोड़कर विदेश भाग गया। रिया के चेहरे की रंगत हर एक सोच के साथ गुस्से में परिवर्तित होती जा रही थी। अचानक रिया के ख्यालों से विजय ने उसे बाहर निकाला।
"तुम.. तुम विजय हो?" अपने चेहरे के भाव नियंत्रण में रखते हुए रिया ने पूछा।
"हा.."
विजय ने धैर्य और हिकीचहाट के साथ जवाब दिया। "ओके.." सिर्फ रिया इतना ही बोल पाई। "क्यों? क्या हुआ?" विजय को पता था कि रिया को किस बात का झटका लगा है, और क्यों?
विजय जब घर पर आया तो उसने पहली बार रिया का नाम सुना की रिया ऐसी है वैसी है। रिया ने हमें फिर से हंसना सिखाया, रिया के साथ जिंदगी ने बहुत बुरा किया, धाड़सी लड़की है। ये वो और ना जाने क्या-क्या?
एक वक्त के लिए विजय को ऐसा लगने लगा कि वह किसी अनजान घर में घुस आया हो। पर वो करता भी क्या गलती भी तो उसकी थी वही तो छोड़ कर गया था सबकुछ।
"कुछ नहीं वो.. कल मुझे ऑफिस में एक जरूरी प्रेजेंटेशन देना है, उसके लिए मुझे आज प्रिपरेशन करना होंगा
"में चलती हूं।" इतना बोल वहां से खिसकने लगी।
विजय हस दिया रिया के रविवार के दिन प्रेजेंटेशन देने के झुठ पर।
और तुम कहती हो की "जिंदगी जीना सुसाइड करने से ज्यादा इजी है।"
मुझे पता है कि तुम क्यों जा रही हो?
रिया रुक कर पीछे मुड़ी।
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"तुम्हें भी लगता होगा इतने साल मां-बाप से दूर रहें और जब कंपनी ने निकाल बाहर फेंका तो वापस आ गया।"
रिया की आंखें यह सुनकर बड़ी हो गई पर खुद को संभालते उसने फेंका। एक आखरी सवाल दागा-
"फिर क्यों छोड़ कर गए थे अंकल आंटी को?"
"निवेदिता"
"निवेदिता!?"
"रिया ने आश्चर्य जताया फिर कुछ सोचकर "वो वही लड़की है जिससे तुम प्यार करते थे?"
पहले तो विजय को आश्चर्य हुआ कि आखिर कर रिया को कैसे पता है, लेकिन मां का ख्याल आते ही उसने मन से ख्याल को फेंक दिया।
उसे पता था की निवेदिता के बारे में रिया को इतना ही पता है जितना बताया गया है।
निवेदिता और मैं एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे।
मेरी बारहवीं की एग्जाम सिर पर थी पर उसी वक्त निवेदिता की मां की तबीयत खराब हो गई।
निवेदिता का पिता नशेड़ी था, माँ ही घर संभालती थी।
पर उन्हें पेट दर्द के कारण हॉस्पिटल भर्ती करवाना पड़ा।
हॉस्पिटल में पता चला कि उन्हें ओवेरियन कैंसर है तब कैंसर का इलाज हो पाना मुश्किल था।
लेकिन डॉक्टर ने कहा अगर उनकी ओवरी निकाल दी जाए, तो उनके बचने के 25%चांस है।
उसी 25 पर हमारी दुनिया टिकी थी।
उसके पिता ने सारे जिम्मेदारी से पल्लू झाड़ लिया।
वो करती भी तो क्या करती? उसने डॉक्टर को आश्वासन दिया कि वह जल्द से जल्द पैसों का इंतजाम करेगी, पर दो लाख रुपए का खर्चा कहा से लाती वो? इसलिए हमने मेरे दोस्त प्रशांत के पिता की मदद से हॉस्पिटल में अंडर पॉवर्टी लेवल वालों का प्रमाणपत्र जोड़ा जिससे कि कुछ फीस कम हो सके।
ऊपर से निवेदिता के पिता एक खेती-बाड़ी करते थे, और खेतीबाड़ी में नुकसान होने और सावकार का बयान ना चुकाने के कारण वो नशे के अधीन हो गए यह भी जोड़ा। इससे निवेदिता की मां की कैंसर की रकम दो लाख से 90,000 हो गयी। पर इतना पैसा कहां से लाते?
इसलिए मैंने आई को सारी बात बताई ,उन्होंने खुद के गहने गिरवी रखने को दे दिए इस बात का पता बाबा को नहीं था। पर जब सराव में मेरे मार्कस कम आते गए और सीधा में फेल हो गया तब कॉलेज के सर ने बाबा को बुलाया। निवेदिता की मां को ऑपरेशन सक्सेसफुल रहा पर, उन्होंने यह भी हिदायत दी कि उन्हें किसी भी चीज का स्ट्रेस ना दिया जाए क्योंकि यह एक परमनेंट सलूशन नहीं था।
दूसरी तरफ बाबा ने मेरे दोस्तों से पूछताछ करने पर उन्हें निवेदिता के बारे में पता चला।
मेरे कम मार्क्स लाने का जिम्मेदार बाबा ने निवेदिता को ठहराया। घर पर आए तो उन्हें गहनों के बारे में पता चलते ही उन्होंने निवेदता के पिता से बात की, निवेदिता के पिता को बाबा ने पैसे दिए कि वह निवेदिता को मुझसे दूर रखें।
निवेदिता और मैं एक दूसरे से बहुत प्यार करते थे।
"जीवन!"
रिया के मुंह से सिर्फ यही शब्द फूटा इतनी बातों के बाद। विजय नाम सुन कुछ देर के लिए रुक गया।
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विजय के आंखों के आंसू मात्र आंखों से लेकर गले तक रास्ता पकड़ चुके थे, कंठ अपने आप पीड़ा से दुखने लगा था।
इस दुनिया में कुछ नहीं था उसकी बेख्याली और अंदर मरने पर उसे मजबूर कर रही थीं।
रिया ने खुद के यादों को कुछ देर के लिए शांति देते हुए, विजय को बोलने का मौका दिया। उसकी पीठ पर हाथ फेरते हुए वह बोली- "फिर क्या हुआ प्लीज बताओ।"
"दुनिया में अक्सर खुद का दुखड़ा सुनाने के लिए सबको वक्त चाहिए, इंसान चाहिए।
पर दूसरे का दर्द सुनने और पचाने की ताकत बहुत कम लोगों पायी जाती है।"
यह सुनते ही विजय एकाएक भावुक हो मन पीड़ा से बाहर निकलने के लिए उछलने लगा।
काश कोई पहले उसे यह सब पूछ लेता तो आज शायद सब ठीक होता। वो अपने ही सिर पर हात मार रोने लगा।
निवेदिता तभी भी मुझसे मिलती रही। बाबा ने तंग आकर निवेदिता के घर की हालत देखते हुए उसके पिता के सामने शादी का प्रस्ताव रखा।
'अगर जोशी अंकल ने शादी का प्रस्ताव रखा तो आखिर निवेदिता और विजय की शादी का क्यों नहीं?'
रिया के मन मे उभड़ रहे इन सारे प्रश्नों को विक्रम ने आगे चलकर पूर्णविराम दिया।
निवेदिता शादी नहीं करना चाहती थी, वह आगे पढ़ना चाहती थी। मुझे यह पता चलते ही की उनके बिरादरी के किसी लड़की के साथ उसकी शादी होने वाली है मैं बोखला गया। विजय को अब यह बातें सहन होने जैसी नहीं थी, अब बिना आवाज़ आंसू आक्रोश और गर्जना से भर चुके थे।
पर रिया स्तब्ध थी, बस वो विजय को खुद के हालात में छोड़ उससे वह हिस्सा बाहर फेंकने की कोशिश कर रही थी जिसके बाद विजय का मन खाली हो जाता पूरी तरह निच्छल।
मेरी परीक्षा में बिल्कुल मन नहीं लगा। हम दोनों ने भाग जाने की नाकाम कोशिश के बारे में निवेदता के पिता को पता चलते ही उन्होंने मेरे एग्जाम के चलते निवेदिता की शादी कर दी।
मेरे साइड किसी ने नहीं सुननी चाही, सारे सपने एक झटके में चूर हो गए। फाइनल एग्जाम फेल होते ही बाबा ने मुझे हॉस्टल में पढ़ने भेज दिया, मैंने भी ज्यादा कुछ बोलना ठीक नहीं समझा।
"तुम कभी मिले नहीं निवेदिता से?"- रिया ने नीचे बैठे विजय के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा।
मिला था 2 साल बाद लेकिन मैंने उसे देखा उस हालत मैं सब्जी मंडी में सब्जी बेच रही थी। दिवाली की छुट्टियों पर तब मैं घर आया था। पूरी बदल चुकी थी वो जिस हंसमुख, कॉन्फिडेंट निवेदिता को देखता था वह कहीं गुम सी हो चुकी थी।
हाथों पर लाल निशान और सिर पर पट्टी नाक भी सूज कर लाल ही चुकी थी पूछने पर बताया फिसल गई, पर इतना फालतू झूठ था यह कि मैंने उसे झट से पकड़ लिया।
मुझ में और हालत नहीं बची थी उससे उस हालत में देखने की, माता-पिता के बारे में पूछने पर बताया कि मां ट्रीटमेंट के बाद प्रॉपर डायट और हाइजीन ना मिलने के कारण चल बसी।
उसके पति किशोर और उसके पिता ने मिलकर उसे आत्महत्या साबित कर दिया इसके कारण 3,00,000 का मुनाफा हुआ हरामजादो को। आधा- आधा बांट लिया सालों ने, लेकिन अचानक कुछ ही हफ्तों में जहरीली शराब पीने के कारण उसका बाप भी मर गया।
रिया तब भी कुछ नहीं बोली बहुत सारे सवाल थे पर विजय का उसके साथ अपने जिंदगी का इतना बड़ा सच बताना उसके लिए काफी था।
क्योकि अब दोनों एक ही कश्ती पर बैठे दो मुसाफिर थे।


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Shivanaya

Shivanaya 1 साल पहले

S Nagpal

S Nagpal 1 साल पहले