दरमियाना - 26 Subhash Akhil द्वारा सामाजिक कहानियां में हिंदी पीडीएफ

दरमियाना - 26

दरमियाना

भाग - २६

तभी एक दिन क्नॉट प्लेस की सलमा गुरू अपनी मंडली के साथ वहाँ आ धमकी थी और इसे आपने साथ ले जाने की ज़िद करने लगी थी। बहुत हंगामा हुआ था उस दिन यहाँ। आस-पास के बच्चों, महिलाओं और शोहदों की अच्छी-खासी भीड़ जमा हो गर्इ थी। आखिर सलमा और उसके साथ आए लोगों ने इसे गाड़ी में डाल लिया था। इसने कुछ न-नुकर तो जरूर की थी मगर ज्यादा विरोध भी नहीं किया था। निशा तब बहुत छोटी थी। वह सहम कर माँ से चिपट गर्इ थी। आस-पास के लोगों ने भी उनकी कोर्इ मदद नहीं की थी। अकेले मोहन लाल के बस में नहीं था कि वे इतने लोगों का मुकाबला कर पाते।

लगभग दो महीनें तक इसकी कोर्इ खोज-खबर किसी को नहीं थी। सलमा गुरु इसे अपने घर ले गर्इ थी। दो महीनें के बाद जब यह सांगली मैस लौटी, तो सारा हुलिया ही बदल गया था। अब पहली बार यह सात्रे (स्त्री के कपड़ों) में घर आर्इ थी।... बाल कटे हुए जरूर थे, मगर बीच की माँग से विभाजित कर दायें-बायें कर दिये गये थे। माथे पर लाल बिंदिया, आँखों में काजल और होठों पर लाली के साथ ही इसके कान भी छिदवा दिये गये थे। महंगे-से सूट-टुपट्टे के साथ हाथों में चूढ़ियाँ भी आ गर्इ थीं।

घर में घुसते ही, एक बारगी किसी ने इसे नहीं पहचाना था। माँ ने देखा -- तो अवाक् रह गर्इ। मुँह खुला का खुला ही रह गया। निशा भी पास आने में झिझक रही थी। यह बिना किसी से कुछ कहे, सीधे रसोर्इ में गर्इ और एक गिलास पानी लेकर पिया। पानी पीते ही मुड़ी, तो सामने पिता खड़े थे। उन्होंने आव देखा न ताव, इसे बेतहाशा मारना शुरू कर दिया। माँ ने बचाना भी चाहा, तो उन्हें धक्का दे दिया। वे जब तक इसे मार सकते थे -- लात-घूँसों से मारा, लेकिन बीमारी के कारण फिर खूद ही थक गये थे। यह चुपचाप पिटती रही, मगर एक चूँ तक नहीं की।... रात को माँ ने खाना बना कर थाली इसके सामने पटक दी थी। इसने भी चुपचाप खाना खाया, फिर यहाँ आँगन में खटिया डालकर सो गर्इ थी।

सुबह उठी, तो हाथ-मुँह धोकर तैयार हो गर्इ। चलने से पहले इसने देखा कि माँ रसोर्इ घर में है। यह वहीं चली आर्इ। फिर अपनी ब्रा में से एक हजार रुपये निकाल कर माँ के हाथ पर रख दिये, "आती रहूँगी!" इसने कहा और पलट कर मुड़ने लगी, तो देखा कि माँ ने रुपये वहीं फेंक दिये थे। इसने एक बार फेंके गये रुपयों की तरफ देखा, फिर माँ की तरफ।... धीरे-धीरे आँगन पार कर बाहर निकल गर्इ थी।

***

गुरु सलमा ने इसकी खूबसूरती को देखा तो कहने लगी कि तेरी शक्ल तो रेखा से मिलती है। अभिनेत्री रेखा की लोकप्रियता उस समय चरम पर थी। वह इसकी भी पसंदीदा अभिनेत्री थी। बस, तभी से रजिन्दर का नया नामकरण रेखा हो गया था।... रेखा अब रहती तो गुरु सलमा के साथ ही, मगर कभी-कभार सांगली मैस भी चली आती। जब भी आती -- माँ के हाथ में कुछ रुपये रख जाती... अब माँ ने भी वे रुपये फेकने कि हिम्मत नहीं दिखार्इ थी, क्योकि पिता कि बढ़ती बीमारी से घर कि आमदनी बहुत सिमट गर्इ थी। निशा के लिए भी चॉकलेट या कोर्इ फ्रॉक वगैरा ले आती। पिता ने तो उस दिन के बाद से इसे देखना भी बंद कर दिया। सामने पड़ भी जाती, तो वे मुँह फेर लेते। माँ भी, बस उतना ही बोलती, जितना जरूरी होता। निशा जरूर धीरे-धीरे घुलने-मिलने लगी थी। इसने उसे समझा दिया था कि मै तेरा भार्इ नहीं, बड़ी बहन हूँ।

यह कभी-कभार कुछ घंटे रुकती या कभी एकाध रात। आस-पास वाले आँखें फाड़े देखते, मगर साथ के घर में रहने वाली शर्मा आंटी इसे जरूर प्यार करने लगीं थीं। यह भी उन्हें आदर के साथ नमस्ते करती। अब वह कहाँ रहती हैं -- उनके यह सवाल पूछने पर इसने अपनी गुरु सलमा के घर के बारे में इसने शर्मा आंटी को जरूर बता दिया था। वह नर्इ दिल्ली रेलवे स्टेशन के पास, इसी तरह से बने एक अवैध स्लम एरिया में रहती है। शर्मा आंटी से माँ या पिता को भी पता चल गया होगा, इसका अनुमान था, मगर इसने सीधे-साधे उन्हें कुछ नहीं बताया था। उन्होंने पूछा भी नहीं। शायद किसी को जानने की जरूरत भी नहीं थी।

सांगली मैस के जो लड़के बचपन में कभी साथ खेला करते थे, वे जरूर हाय-हैलो कर लेते, मगर छिछोरों और शोहदों की हिम्मत अब इसे छेड़ने की नहीं पड़ती। एकाध बार इसके साथ चले आये संगी-साथी या खुद इसकी तालियों की टंकार भी उन्होंने सुन ली थी... और ये तालियाँ उनमें खौफ भी पैदा करने लगी थीं। यूँ भी अब तक इसकी खूबसूरती और कदकाठी निखर कर उभर आर्इ थी। यानी एक खूबसूरत कसे हुए बदन के साथ इसकी अदाओं में भी गजब का निखार आ गया था -- और बेशर्मी भी बढ़ गर्इ थी। इसे देखते ही लगने लगा था कि अब यह पहले-सा कोर्इ नाजुक लड़का नहीं रह गया था। गुरु सलमा कि संगत में अच्छा खाना, पहनना, ओढ़ना, श्रृंगार करना भी इसे आ गया था... और 'इनके वाले' लटके-झटके भी आ गए थे।

तभी एक दिन शर्मा आंटी का बेटा इसे तलाश करता हुआ, सलमा गुरु के घर तक पहुँच गया था। रेखा उस समय वहाँ नहीं थी, इसलिए सलमा गुरु को ही उसने इत्तला दी थी कि रेखा के पिताजी नहीं रहे। सूचना मिलते ही सलमा ने रेखा को बुलवा भेजा था और इसके हाथ में कुछ रुपये रख कर कहा था, "जा बेटा, जाकर संभाल।" रेखा के साथ मोहिनी और एक अन्य साथी को भी भेज दिया था। पिता के संस्कार की सारी जिम्मेदारी इसी ने उठार्इ थी। तेरहवीं तक वे लोग यहीं रुके थे। उसके बाद, जब ये लोग जाने लगे, तो माँ ने कहा था, "यहीं रुक जा बेटा!"

तब उस समय तो इसने कुछ नहीं कहा था, मगर दो-तीन दिन बाद यह मोहिनी को साथ लेकर यहीं चली आर्इ थी।

यहाँ चली तो आर्इ थी, मगर इलाका और गुरु को इसने नहीं छोड़ा था। इस बीच नर्इ चेली चंदा और गुलाबो भी इसके साथ यहीं रहने लगी थीं। आमदनी थोड़ी बढ़ी, तो इसने स्कूटी खरीद ली थी। मोबाइल भी आ गया था। इन्हीं के जरिये ये अपने गुरु और अन्य लोगों के साथ सम्पर्क में बनी रहती। माँ और निशा की जिम्मेदारी अब रेखा ने ही संभाल ली थी।

***

उस दिन वहाँ से लौट आने के बाद मैंने एक फीचर 'इन पर' तैयार किया और संपादक जी को सौंप दिया। फीचर में अब तक की अपनी सारी जानकारी को मैंने बहुत ही खूबसूरती के साथ साझा किया था। फीचर एक 'रविवारी संस्करण' के लिए सचित्र छापा जाना तय हुआ, तो मैंने इसकी जानकारी रेखा को मोबाइल पर ही दे दी थी, ताकि वह उस दिन का अखबार कहीं से खरीद सके।

फीचर छपने के बाद मैंने उसे फोन किया था। वह सब पढ़कर और अपनी तस्वीरें देख कर रेखा और उसकी चेलियाँ भी काफी प्रसन्न थीं। उसने मुझे 'थैक्यू' बोल कर आभार जताया था।

इसके बाद कुछ महीने तक उससे मेरा कोर्इ संपर्क नहीं हो सका। न ही मेरा उधर जाना हो पाया और न ही उसका कोर्इ फोन ही आया। मैं भी अन्य फीचर व खबरों में ही खोया रह गया।... तभी एक दिन जब मैं ऑफिस पहुँचा, तो एक साथी ने बताया, "तेरी उस रेखा का मर्डर हो गया!... जिस पर तूने फीचर किया था!"

"क्या बकवास कर रहा है?" मैं अचकचा गया था, "यह कैसे हो सकता है?"

"फोन आया था किसी मोहिनी का !... तेरा मोबाइल नम्बर शायद उनके पास नहीं था।... मैंने भी नहीं दिया -- सोचा, पता नहीं तू देना चाहेगा या नहीं।" साथी ने बताया, तो मेरे होश फाख्ता हो गये। पिछली सभी मुलाकातें और उसका बताया गया घटनाक्रम आँखों के सामने कौंध गया।

मैंने तुरंत रेखा के मोबाइल पर ही फोन लगाया।

"हैलो!" एक रुआँसा-सा स्वर सुनार्इ दिया था। यह रेखा की आवाज नहीं थी।

मैंने अपना परिचय दिया फिर पूछा, "कौन बोल रही हो?"

"सर जी मैं मोहिनी बोल रही हूँ..." इसी के साथ दूसरी ओर से फफक कर रोने की आवाज आने लगी थी। मैंने मोहिनी को ढाँढस बँधाया।

"कब हुआ, यह सब?... क्या हुआ था?" पूछा, तो मोहिनी ने बताया कि परसों रात रेखा स्कूटी से अकेली पहाड़गंज गर्इ थी। वहाँ से लौटते समय एक सुनसान सी गली में किसी ने उसकी स्कूटी रोकी और चाकुओं के ताबड़तोड़ वार से उसकी हत्या कर दी। मोहिनी का मानना था कि यह काम कोर्इ अकेला नहीं कर सकता था। एक-दो पर तो वह अकेली ही भारी पड़ सकती थी।

"अच्छा, मैं आता हूँ -- तुम फोन रखो!" मैंने कहा और अपने सहयोगी मुकेश को लेकर सांगली मैस पहुँच गया। घर में मातम पसरा हुआ था। माँ का तो रो-रो कर बुरा हाल हुआ था। निशा, चंदा और गुलाबो का भी बुरा हाल था।

मोहिनी को मैं बाहर ले आया था। फिर उससे पूछा, "क्या हुआ था, कुछ पता चला?"

"नहीं सर जी... पुलिस तो आर्इ थी। हमें भरोसा दिला कर चली गर्इ कि करते है कुछ!" मोहिनी ने बताया।"किसी से रंजिश तो नहीं हुर्इ थी?" मैंने पूछा

"नहीं, रंजिश जैसा तो कुछ नहीं था।... हाँ, कोर्इ महीने-भर पहले खबर लगी थी कि दो लड़के जनाना लिबास में कहीं बधार्इ मांग रहे हैं। ये गर्इ थीं स्कूटी पर, तब तो वे नहीं मिले।... फिर एक दिन वो दोनों इन्हें बंगाली मार्केट में मिल गये, तो इन्होंने उन्हें जमकर बजाया था।... यह बात हमने पुलिस को भी बतार्इ थी।... अभी आज सुबह नगमा गुरु भी आर्इ थीं। उन्होंने ही कहा था आपको फोन करने के लिए। आपका मोबाइल नम्बर हमारे पास नहीं था। ऑफिस का नम्बर एक डायरी में लिखा था। तभी मैंने आपके ऑफिस फोन किया था।" मोहिनी ने संक्षेप में मुझे बता दिया था। "कुछ पता चला -- वो लड़के कौन थे... कहाँ के थे?" मैंने जानना चाहा। "नहीं सर जी, वो यहाँ आसपास के तो नहीं हैं। यहाँ के होते, तो हमें पता ही होता।" तभी चंदा एक गिलास में पानी ले आर्इ थी।

पानी पीकर मैंने पुलिस हेडक्वाटर में अपने मित्र ए.सी.पी. राजीव रंजन को फोन मिलाया था। उन्हें मोहिनी व्दारा दी गर्इ सभी जानकारी साझा कर, उनसे इस केस को सुलझाने में मदद करने का आग्रह किया था।

चौथे दिन राजीव जी का फोन मेरे पास आ गया था।... जो कुछ उन्होंने बताया, वह इस प्रकार था -- ये दोनों अपराधी किस्म के लड़के थे। 'किन्नर' के भेष में ये उगाही और लूटपाट करते थे। इन्हें दबोचने में ज्यादा परेशानी नहीं हुर्इ थी, क्योंकि ऐसा वे काफी दिनों से अलग-अलग इलाकों में कर रहे थे। इन्हें उठाने के बाद पता चला कि साँगली मैस के भी दो लड़के इनके साथ मिले हुए थे, जो रेखा से रंजिश मानते थे, मगर उसे इसका आभास भी नहीं था।... कर्इ साल पहले इलाके में नशा बेचने कि उनकी शिकायत रेखा ने पुलिस से कि थी।... मगर तब तो यह बात आर्इ-गर्इ हो गर्इ थी उन्होंने माफी माँग ली थी और इसने उन्हें छुड़वा भी दिया था। मगर इससे उनका धन्धा चौपट हो गया था। पुलिस की निगरानी उनपर रहती। इसीलिए वे भी हत्या कि इस वारदात में, मुखबरी के साथ ही, शामिल भी हो गए थे। पकड़े गए उन दो लड़कों ने अपना अपराध कबूल कर, उनके नाम भी बता दिए थे। जब उनके यहाँ दबिश दी गर्इ, तो वे फरार मिले। किन्तु बाद में उन्हें भी सराय रोहिल्ला से गिरफ्तार कर लिया गया था।

दरअसल इन दोनों ने ही मुखबरी कर और जान-पहचान होने के कारण ही रेखा को रोका था। फिर चारों ने मिलकर उसकी हत्या कर दी थी।

***

यह सारा घटनाक्रम बताने के लिए मैं रेखा के घर गया था। तभी मैंने मोहिनी से रेखा की माँ और बहन की सुरक्षा और इनकी जिम्मेदारी संभालने का आग्रह किया था।... उसने मुझे यह आश्वासन दिया था कि इन्हें वह अपनी माँ और छोटी बहन की तरह ही संभालेगी।

यह जानकर मेरे मन को थोड़ा संतोष मिला था। मैंने किसी भी परेशानी में मुझे फोन कर लेने का आश्वासन भी दिया था।

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