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सृष्टि ज़ब वेद से मिलती है तब उनका सामना बिल्कुल अच्छा नहीं था लेकिन उनके दोस्तों...
वह रात जो सुहागरात नहीं, सज़ा की रात बन गई थी, धीरे-धीरे सीख की रात बन गई थी। बा...
जैसे ही शैलजा और कैलाश हवेली में पहुँचे… सब कुछ अचानक गायब हो गया। दीवारें, खिड़...
अब उसके पास लोकेशन भी थी और वक्त बहुत कम। उसने बाहर खड़ी कार स्टार्ट की और अलेक्...
भाग : 10तापस दा के घर का वातावरण कुछ देर पहले की अपेक्षा अब शांत था।बरामदे में ब...
अध्याय 1: धुंध में लिपटा अतीत"यह उन दिनों की बात है..."जब कसौली के पहाड़ों पर धु...
इंजन रूम के उस भयानक, धड़कते हुए मांसल कमरे में, जहाँ दीवारों से खून रिस रहा था...
"बेटा, जब तक यह साइकिल चल रही है, तब तक तेरा बाप खड़ा है।" पिता के इन शब्दों की...
कॉलेज का पहला हफ्ता बीत चुका था। रोहन अब कैंपस के माहौल में थोड़ा-बहुत ढलने लगा...
SCENE 3."इसमें मेरी बेटी की तज़लील क्यों हुई, उसकी क्या ग़लती थी?" रेड कोर्ट पर...
लखनऊ, नवाबों का शहर। शाम के सात बज रहे थे। हजरतगंज की रौशनी, चौक की चाट की खुशबू और गोमती नगर की ठंडी हवा, सब कुछ रोज की तरह ही था। पर आयशा के लिए आज कुछ भी रोज जैसा नहीं था। आय...
शैलजा सिंह की एंट्री – नया कमरा, नई शुरुआत… या कुछ और?शाम का धुंधलका धीरे-धीरे शहर पर उतर रहा था। आसमान में हल्की बैंगनी छटा थी और हवा में अजीब सी ठंडक घुली हुई थी।शैलजा सिंह ऑटो स...
काहिरा के रेगिस्तानी इलाके में रात का गहरा सन्नाटा था। बंद पड़ी सीमेंट फैक्ट्री के अंदर पीली बत्तियों की रोशनी में दर्जनों लोग अत्याधुनिक हथियार और हेरोइन के पैकेट बड़े-बड़े कंटेनर...
भारत को आज़ाद हुए अभी कुछ ही वर्ष हुए थे। देश स्वतंत्र हो चुका था, लेकिन गाँवों की गरीबी अभी भी वैसी ही थी, जैसे आज़ादी की किरण पहाड़ों के उस पार कहीं रुक गई हो। पेट की आग, कर्ज क...
रात के ठीक ग्यारह बज चुके थे। यूपी से बिहार जाने वाली इस एक्सप्रेस ट्रेन का थर्ड एसी कोच लगभग पूरी तरह से शांत हो चुका था। ट्रेन के पहियों की पटरियों से टकराने वाली छुक-छुक की लयबद...
"क्या है जिंदगी हक़िक़त या छलावा या कोई भ्रम? इतनी मुद्दत की जिंदगी जिसे हम हक़िक़त समझते रहे क्या वो छलावा थी, क्या सबकुछ सिर्फ एक भ्रम था? क्या हक़िक़ि ज़िंदगी अब शुरू हुई है...
उत्तर प्रदेश के छोटे से गांव मेहनूपुर की मिट्टी की खुशबू कहानीकहानी की शुरुआत: मेहनूपुर की गलियांमेहनूपुर एक ऐसा गांव है जहां सूरज की पहली किरण के साथ ही हल की आवाजें गूँजने लगती ह...
एक अनजान मुलाकातशहर की भीड़ हमेशा की तरह अपने काम में व्यस्त थी।सड़कों पर गाड़ियों का शोर था। लोग जल्दी-जल्दी अपने ऑफिस जा रहे थे। कोई फोन पर बात कर रहा था, तो कोई अपने काम के लिए...
शादी से बचने का आख़िरी रास्ता सुबह के आठ बजे। दिल्ली की सड़कें रोज़ की तरह भाग रही थीं। हॉर्न, मेट्रो की आवाज़, चाय की दुकानों पर भीड़ और लोगों के चेहरों पर काम पर पहुँचने की...
28 साल की मीशा अपने काम से जाने की घर वालों से विदा लेकर अपनी कार में बैठी। उसने अपने परिवार वालों की तरफ एक हल्की मुस्कुराहट के साथ देखा... जैसे मानो वह उनसे कुछ कहना चाहती हो, पर...
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