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*शीर्षक: हां हम अंध भक्त हैं देश सबसे पहले है मोदी का विरोध सह लेंगे लेकिन देशद्...
एपिसोड 43 समाधि का श्राप और अंधेरे की शहर की बेचैनीसमाधि के अंतिम द्वार से लौटने...
ऑफिस का शुरुआती माहौलकांच के बड़े केबिन में विराट बैठा हुआ था।फाइलें खुली थीं, ल...
अधूरी किताब: एक रूहानी दास्तानएपिसोड 42: सातवाँ द्वारप्रतिध्वनि झील का काला जल अ...
लेखक की कलम से…कहानियाँ सहज ही मन से जुड़ जाया करती हैं। पढ़ते-पढ़ते किरदार अपने...
(एम्बुलेंस के सायरन की आवाज़ जो धीमे-धीमे एक हाई-पिच टोन में बदल रही है। आर्यन क...
(काली रात... जंगल के पेड़ों से हवा टकरा रही है। झींगुरों की आवाज़ गूँज रही है।सि...
नया सफ़रअगली सुबह ठीक दस बजे का समय था।लखनऊ मेडिकल कॉलेज का कैंपस हमेशा की तरह...
शहद की गुड़िया - प्रकरण 74 "50 साल पहले क...
यजुर्वेद सूक्ति (4) की व्याख्या मा भेर्मा संविक्था अऊर्ज धतस्व"यजुर्वेद --6/35 भ...
"अर्धांगिनी"----- कहने को अर्धांगिनी कहा जाता है परंतु आधा हिस्सा दिया किसने, आधा हक दिया किसने, और आधा अधिकार/मान-सम्मान दिया किसने, आधा तो क्या उसे हर मोड़ पर छला जाता...
अमर प्रेम प्रेम और विरह का स्वरुप (1) प्रेम और विरह का स्वरुपप्रेम ----एक दिव्य अनुभूति --------कोई प्रगट स्वरुप नही,कोई आकार नही मगर फिर भी सर्व्यापक ।प्रेम के बिना न संसार है न भ...
सत्या पहला पन्ना 1970 के दशक के प्रारंभ की बात है. तब मैं काफी छोटा था. एक दिन सुबह सवेरे मेरे पिता के एक जूनियर कुलीग हमारे घर पर आए और उन्होंने पूरे उत्साह के साथ बीती रात उनके स...
चिरइ चुरमुन और चीनू दीदी (कहानी पंकज सुबीर) (1) इस कहानी में जो चिरइ चुरमुन हैं वो ही ‘हम’ हैं । ‘हम’ का मतलब वो जो कहानी सुना रहा है । यहाँ पर ‘मैं’ की जगह पर ‘हम’ इसलिये सुना रहा...
शहर के प्रसिद्ध व्यापारी शिव टंडन का शव हाईवे के पास के जंगल में मिलता है। उनकी पत्नी मेघना टंडन ने इस कत्ल का इल्ज़ाम अपने पर्सनल जिम ट्रेनर अंकित सिन्हा पर लगाया। उनका कहना था कि...
इस दश्त में एक शहर था अमिताभ मिश्र स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी परिघटना संयुक्त परिवारों का टूटना और एकल परिवार का बनना है गजानन माधव मुक्तिबोध प्रस्तावना या भूमिका (इतिहास और भूगो...
फिल्म रिव्यू – ‘ठग्स ओफ हिन्दोस्तान’… दर्शको को वाकइ में ठग लेगी ये वाहियात फिल्म कई सालों से ये होता चला आ रहा है की दिवाली के त्योहार पर रिलिज हुई फिल्म इतनी बुरी होती है की दिव...
24 सितम्बर, 1992। कैलेंडर एक बार फिर वही महीना और वही तारीख दर्शा रहा है। सितम्बर और 24 तारीख। हर साल यही होता है। यह तारीख मुझे चिढ़ाने, परेशान करने और वो सब याद दिलाने के लिए मेर...
बचपन से ही भारतीय सेना के जवानों के लिए मेरे मन में बहुत आदर था। मेरे परिवार में कोई भी सेना में नहीं है। मैंने सिर्फ सिनेमा में सैनिकों के बहादुरी भरे कामों को देखा और हमेशा ही उन...
शाम हों चली थी, सूरज वसुंधरा को कल आने का वादा करके जा चूका था.. शहर की सड़कों पर दिन की अपेक्षा शाम कुछ ज्यादा ही रंगीन दिखाई देने लगी थी... कहते हैं किसी के जीवन में जिंदगी भी दिन...
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