कक्षा 12वी तक एक सीधी सादी जिंदगी थी, तब न तो लिखने का शौख था और न ही लिखने की कभी सोची थी, फिर बुक्स पढ़ने का चस्का लगा और बाद में कहानिया लिखने का ख्याल दिमाग मे आया. अब मातृभारती पर लेखक के तौर पर लिख रहा हूं और आशा है कि कहानी खत्म होने के बाद पब्लिश भी होगी. एक और बात यह नयी वाली हिंदी है, पुरानी पीढ़ी के व्यस्को को मेरी कहानी पसंद न भी आये ऐसा हो सकता है. हिंदी कभी भी कोई विद्वान की भाषा नही रही है, तो चलो इस सफर में हिंदी को महान बनाये. मेरे भारत पर और मेरी हिंदी पर मुझे गर्व है.