Rakesh Kumar Sharma की किताबें व् कहानियां मुफ्त पढ़ें

जग्गू - द डिटैक्टिव - 1

by Rakesh Kumar Sharma
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‘‘हे भगवान इसको भी अभी टूटना था’’ - हाथ से पुराना शिशा गिरने पर जग्गू बड़बड़ाया। टेबल पर रखा ...

सावन

by Rakesh Kumar Sharma
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सावन की दोपहर लगभग आधी खत्म हो चुकी थी और ढलते सूरज की सुन्हरी रोशनी से नीम की काली ...

हन्सु के प्रेम की नैया

by Rakesh Kumar Sharma
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हमारे सभ्य समाज में प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी प्रकार से अपनी आजिविका कमाने के लिए प्रयासरत है। कुछ ...

मेरा साहित्य लेखन

by Rakesh Kumar Sharma
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आज दोपहर को घर के आंगन मे बैठा में आराम कर रहा था। अचानक दिमाग में कुछ लिखने का ...

हमसफ़र

by Rakesh Kumar Sharma
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बदन पर किसी ठंडी चीज का एहसास पाकर मेरी तंद्रा टूटी। विचारों के भंवर से बाहर निकल कर देखा ...