Rajeev kumar की किताबें व् कहानियां मुफ्त पढ़ें

लुका-छीपी

by Rajeev kumar
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बचपन के निराले दिन, कब लौट के आने वाले दिन। घुमना-फिरना, मिलना-मिलाना, हंसी-ठहाके, सब यादों में बसे हैं। मेरे ...

नया रास्ता

by Rajeev kumar
  • 618

कहीं कोई रास्ता न दिखे फिर भी रास्ता तो निकालना ही पड़ता है। सारे लोग एक दुसरे का मुंह ...

मझधार

by Rajeev kumar
  • 762

प्रेमी युगल अपने-अपने घरों में करवटें बदल रहे थे, नींद किसी को भी नहीं आ रही थी क्योंकि एक ...

दोस्त

by Rajeev kumar
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दर-बदर भटकते हुए मंगरू अब हिम्मत हार चुका था ,उसके हाथ में कई बार मुड़ा और फटा कागज इस ...

मन का विरोधाभाष

by Rajeev kumar
  • 678

विरोधापभाष कम होता प्रतीत नहीं हो रहा था, बल्कि बढ़ता ही जा रहा था। बाहर का विरोधाभाष होता तो ...

मालिक

by Rajeev kumar
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कोड़ा बरसाने के बाद भी बैलों का जोड़ा टस से मस नहीं हुआ तो हरमू ने आकाश की ओर ...

और एक बार की सनक

by Rajeev kumar
  • 1k

अपनी असफलता के लिए सिर्फ भाग्य को कोसते-कोसते, वह अपने आप को हीन और तुच्छ समझने लगा था। इच्छा ...

प्रेम के ईर्ष्यालु

by Rajeev kumar
  • 3k

अमवा के पेड़ के मुंडेर पर बैठी कोयलिया ’’ कुहू- कुहू ’’ की आवाज से गीत गा रही थी। ...

प्यार का इम्तहान

by Rajeev kumar
  • 2.3k

नज़रें इनायत हो रही थी, सारी बातें आँखों आँखों में ही हो रही थी। किसी को भी इश्क की ...

बँटवारा

by Rajeev kumar
  • 5k

बँटवारा बुधन बँटवारा का नाम सुनते ही आग बबूला हो गए। वो इस तरह बौखला उठे जैसे कि समन्दर ...