सिमटती दुनिया, बढ़ते दायरे

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             मई के महीने में बहुत गर्मी हो गई थी, विद्यालयों का सत्रांत होने में कुछ ही दिन बचे थे। तृष्णा चिलचिलाती धूप में बस से उतरी, मुंह पर स्कार्फ बांधे, पैदल ही घर की ओर चल पड़ी । सड़क बिल्कुल सुनसान पड़ी थी, मानो सब लोग प्रचंड आग से बचने के लिए अपने घरों में दुबके बैठे थे, बीच-बीच में स्कार्फ से गर्दन के पसीने पोंछ लेती थी, सड़क पर दो-चार दुकान खुली नजर आती थी, लेकिन उनका भी मुंह मानो प्लास्टिक के पर्दों या बांस और सरकंडे की चिको से बंद था ।