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मां निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम्" ||
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धरती को प्रणाम ,आकाश को प्रणाम,सूर्य को प्रणाम,चाँद तारों को प्रणाम,नदियों को प्रणाम,अग्नि को प्रणाम , ब्रह्माण्ड को प्रणाम, दसों दिशाओं को प्रणाम,आदि कवि वाल्मीकि को प्रणाम,आदि आशु लेखक गणेश को प्रणाम,साहित्य कला के ईश्वर शिव को प्रणाम .

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लक्ष्मी के प्रकार
यशवन्त कोठारी
शास्त्रों में लक्ष्मी का बड़ा महत्व है, और जीवन में गृहलक्ष्मी का। इन दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय। वैसे लक्ष्मी को श्री, पदमा, कमला, नारायणी, तेजोमयी, देवी आदि अनेकों नामों से जाना गया है। और कालान्तर में ये सभी नाम गृहलक्ष्मियों को सुशेभित करने लगे।
शास्त्रों के अनुसार लक्ष्मीजी क्षीरसागर नरेश विष्णुजी की पत्नी है और एक वरिष्ठ कवि के अनुसार पुरूष पुरातन की वधु क्यों न चंचला होय। मगर यह उक्ति गृहलक्ष्मियों पर ठीक नहीं उतरती क्योंकि भारतीय परिवेश में गृहलक्ष्मी डोली में बैठ कर आती है और अर्थी पर जाती है ।

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राजस्थान की लोक संस्कृति :एक विहंगम द्रष्टि

यशवंत कोठारी

रंगीले राजस्थान के कई रंग हैं. कहीं रेगिस्तानी बालू पसरी हुई है तो कही अरावली की पर्वत श्रंखलायें अपना सर ऊँचा कर के ख ड़ी हुई है .इस प्रदेश में शोर्य और बलिदान ही नहीं साहित्य और कला की भी अजस्र धारा बहती है.चित्र कलाओं ने भी मानव की चिंतन शैली को विकसित व् प्रभावित किया है .संस्कृति व् लोक संस्कृति के लिहाज़ से राजस्थान वैभवशाली प्रदेश हैं.राजस्थान में साहित्य ,संस्कृति कला की त्रिवेणी बहती हैं, जीवन कठिन होने के कारण इन कलाओं ने मानव को जिन्दगी से लड़ने का होसला दिया है. यहीं पर महाराणा प्रताप हुए.संत कवयित्री मीरा,कलाप्रेमी कुम्भा, चतरसिंह जी बावजी,भरथरी, बिहारी और अन्य सैकड़ों नाम हैं. पद्मश्री कोमल कोठारी , विजय दान देथा , देवीलाल सामर आदि ने राजस्थानी संस्कृति को सहेजने व् एकत्रित करने में बड़ा योग दान दिया.बोरुन्दा के रूपायन संसथान , व् उदय पुर के भारतीय लोक कला मंडल में काफी का म किया गया. देवेन्द्र सत्यार्थी ने जो काम उत्तर प्रदेश,बिहार व् अन्य जगहों पर किया वहीँ काम विजय दान देथा ने किया , वाता री फुलवारी में

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गरीबी पर चिंतन
यशवंत कोठारी
बिल गेट्स ने कहा है की गरीब राष्ट्र कम हो रहे हैं लेकिन गरीबी बढ़ रही है.अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बुश ने कहा है की हम ने गरीबी के ख़िलाफ़ युद्ध छेड़ा और गरीबी जीत गयी.भारत में बहस गरीबी पर नहीं गरीबी रेखा पर हो रही है .योजना आयोग का नया रूप निति आयोग इस बात पर ही दो साल से चर्चा कर रहा है ,नए आयोग अध्यक्ष भारत की गरीबी को अमरीकी चश्में से देख रहे है. उन को नहीं मालूम की भारत में गरीबी के मापदंड वे नहीं हो सकते जो अमेरिका में हैं.गरीबी नहीं हटा सको तो गरीब को हटा दो, उसे फुटपाथ से हटाओ, उसे झोपडी से हटाओ ,उसे कच्ची बस्ती से हटाओ , उसे शहरों से हटाओं , उसे जनपथ व् संसद मार्ग से हटा दो.
निति आयोग गरीब और गरीबी पर रोज़ नई परिभाषा बनाता है ,जो सत्ता के तो अनुकूल होती है ,मगर गरीब के अनुकूल नहीं होती.गरीब को सोचने समझने का कोई अधिकार नहीं सरकार कहे सो सही . रोटी तक नसीब नहीं .एक वक्त की रोटी के भी लाले है लेकिन सरकार माने तो.शहर में रहने वाला अलग गाँव में रहने वाला अलग तरह का गरीब, दोनों मिल कर अमीर. होना तो यह चाहिए की सरकार अमीरी रेखा तय करे, उसके नीचे के सब गरीब.सब को मदद मिले, सब को रोटी कपडा मकान मिले .लेकिन बुद्धिजीवी गरीबी पर बहस करते हैं ,सेमिनार करते हैं ससुरी गरीबी बढती जाती हैं और अमीरों की अट्टालिकाएं भी बढती जाती हैं .खुद जिओ गरीब को जीने मत दो.चलो भागो यहाँ से, तुम गरीब भिखारी तुम्हारी हिम्मत केसे हुई यहं तक आने की ?

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नवरात्र की मंगल कामनाएं

पौराणिक साहित्य का पुनर्प्रस्तुतीकरण
यशवंतकोठारी

पिछले कुछ वर्षों में पौराणिक साहित्य की तरफ फिर ध्यान दिया गया है.इन रचनाओं का पुनर्लेखन हो रहा है,धारावाहिक बन रहे हैं, फ़िल्मी उद्योग भी ध्यान दे रहा है.सबसे बड़ी बात विदेशी रचनाकार भी भारतीय पौराणिक साहित्य की और आ रहे हैं. मेक्स मुलर के बाद पीटर ब्रुक्स के महा भारत ने सबका ध्यान खीचा है.रामानंद सागर की रामायण ,व् चोपड़ा की महाभारत चर्चित रही थी.कन्हयालाल मुंशी जी की कृष्णावतार की सीरीज भी काफी पढ़ी गयी थी. नरेंद्र कोहली की राम कथा,महासमर भी चर्चित रहे.यह परम्परा टी वि पर भी खूब चली.खूब फिल्मे बनी .बाद में कुछ समय के लिए अन्तराल आ गया.
लेकिन अंग्रेजी में अमिश त्रिपाठी, अशोक बेंकर, देवदत्तपटनायक जैसे लेखकों ने भारतीय पौराणिक साहित्य को वापस लिखना शुरू किया और नए पाठक व् दर्शक पैदा हुए.प्राचीन साहित्य को नया आयाम मिला.

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--ययाति-एक अनोखी प्रेम गाथा ,वैसे विश्व की हजारों भाषओंमे हजारों प्रेम कहानियां हर वर्ष लिखी जाती हैं लेकिन पौराणिक प्रेम गाथाओं की बात ही अलग है.भारतीजी का गुनाहों का देवता,मनोहर जोशीजी का कसप भिआधुनिक प्रेम उपन्यास है
ययाति में ययाति,देवयानी,शर्मिष्ठा ,कुच के प्रेम का वर्णन है.बाद में पुरु उर्वशी का भी है.शुक्राचार्य के क्रोध का भी वर्णन है.

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५-लाईन में खड़े रहो
ओसत भारतीय को लाईन खड़े रहने का बड़ा व्यापक अनुभव हैं .राशन, बैंक,अस्पताल सिनेमा,की लाईनों का अनुभव का म आरहा हहैं ,पूरा भारत क्यू मेंखड़ा है .क्यू में ही चाय पी रहा हैं , क्यू में ही पिजजा आर्डर कर रहा हैं ,वही सोने का जुगाड़ कर रहाहैं.क्यू ही जिन्दगी बन गयी हैं , मेने किसी बड़े आदमी , पेसे वाले को क्यू में खड़ा नहीं देखा .
सरकार की नियत साफ हो सकती हैं ,लेकिन व्यवस्था असफल हैं .

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नाम: यशवन्त कोठारी
जन्म: 3 मई, 1950, नाथद्वारा, राजस्थान
शिक्षा: एम.एस.सी. -रसायन विज्ञान ।
प्रकाशित पुस्तकें
1 - कुर्सी सूत्र (व्यंग्य-संकलन) श्री नाथजी प्रकाशन, जयपुर 1980
2 - पदार्थ विज्ञान परिचय (आयुर्वेद) पब्लिकेशन स्कीम, जयपुर 1980
3 - रसशास्त्र परिचय (आयुर्वेद) पब्लिकेशन स्कीम, जयपुर 1980
4 - ए टेक्सूट बुक आफ रसशास्त्र (मलयालम भाषा) केरल सरकार कार्यशाला 1981
5 - हिन्दी की आखिरी किताब (व्यंग्य-संकलन) -पंचशील प्रकाशन, जयपुर 1981
6 - यश का शिकंजा (व्यंग्य-संकलन) -प्रभात प्रकाशन, दिल्ली 1984
7 - अकाल और भेड़िये (व्यंग्य-संकलन) -श्रीनाथ जी प्रकाशन, जयपुर 1990
8 - नेहरू जी की कहानी (बाल-साहित्य) -श्रीनाथ जी प्रकाशन, जयपुर 1990
9 - नेहरू के विनोद (बाल-साहित्य) -श्रीनाथ जी प्रकाशन, जयपुर 1990
10 - राजधानी और राजनीति (व्यंग्य-संकलन) - श्रीनाथ जी प्रकाशन, जयपुर 1990
11 - मास्टर का मकान (व्यंग्य-संकलन) - रचना प्रकाशन, जयपुर 1996
12 - अमंगल में भी मंगल (बाल-साहित्य) - प्रभात प्रकाशन, दिल्ली 1996
13 - साँप हमारे मित्र (विज्ञान) प्रभात प्रकाशन, दिल्ली 1996
14 - भारत में स्वास्थ्य पत्रकारिता चौखम्भा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली 1999
15 - सवेरे का सूरज (उपन्यास) पिंक सिटी प्रकाशन, जयपुर 1999
16 - दफ्तर में लंच - (व्यंग्य) हिन्दी बुक सेंटर, दिल्ली 2000
17 - खान-पान (स्वास्थ्य) - सुबोध बुक्स, दिल्ली 2001
18 - ज्ञान-विज्ञान (बाल-साहित्य) संजीव प्रकाशन, दिल्ली 2001
19 - महराणा प्रताप (जीवनी) पिंकसिटी प्रकाशन, जयपुर 2001
20 - प्रेरक प्रसंग (बाल-साहित्य) अविराम प्रकाशन, दिल्ली 2001
21 - ‘ठ’ से ठहाका (बाल-साहित्य) पिंकसिटी प्रकाशन, दिल्ली 2001
22 - आग की कहानी (बाल-साहित्य) - पिंकसिटी प्रकाशन, जयपुर 2004
23 - प्रकाश की कहानी (बाल-साहित्य) - पिंकसिटी प्रकाशन, जयपुर 2004
24 - हमारे जानवर (बाल-साहित्य) - पिंकसिटी प्रकाशन, जयपुर 2004
25 - प्राचीन हस्तशिल्प (बाल-साहित्य) - पिंकसिटी प्रकाशन, जयपुर 2004
26 - हमारी खेल परम्परा (बाल-साहित्य) - पिंकसिटी प्रकाशन, जयपुर 2004
27 - रेड क्रास की कहानी (बाल-साहित्य) - पिंकसिटी प्रकाशन, जयपुर 2004
28 - कब्ज से कैसे बचें (स्वास्थ्य) - सुबोध बुक्स, दिल्ली 2006
29 - नर्शो से कैसे बचें (बाल-साहित्य) सामयिक प्रकाशन, दिल्ली 2006
30 - मैं तो चला इक्कीसवीं सदी में - (व्यंग्य) सार्थक प्रकाशन, दिल्ली 2006
31 - फीचर आलेख संग्रह -सार्थक प्रकाशन, दिल्ली 2006
32 - नोटम नमामी (व्यंगय-संकलन) - प्रभात प्रकाशन 2008
33 - स्त्रीत्व का सवाल - (प्रेस)
34 - हमारी संस्कृति - वागंमय प्रकाशन-2009
35 -तीन लघु उपन्यास-सन्जय प्रकाशन-2009
36 - योगासन और नेतासन नेशनल पब्लिशिंग हाउस.२०१२ दिल्ली
37-असत्यम अशिवम असुन्दरम-व्यंग्य उपन्यास-रचना प्रकाशन 2011
38 Introduction to Ayurveda- Chaukhamba Sansskrit Pratishthan, Delhi 1999
39 Angles and Triangles (Novel) –abook2read.com-london,रचना प्रकाशन जयपुर
40 Cultural Heritage of Shree Nathdwara bodhi prakashan ,jaipur-2017

पुरस्कार सम्मान-
1. ‘मास्टर का मकान’ शीर्षक पुस्तक पर राजस्थान साहित्य अकादमी का 11,000 रू. का कन्हैयालाल सहल पुरस्कार ।
अमेरिका के १० विश्व्विद्ध्यालयों का भ्रमण दिस्म्बेर२०१३ से मई २०१४ विदेशों में हिंदी के पाठ्यक्रम पर चर्चा
२०१७,२०१८, २०१९,२०२० में पद्मश्री हेतु नामित गृह मंत्रालय की साईट पर देखे

विश्व कविता समारोह अहमदाबाद २०१७ में भाग लिया
फेसबुक पर इ पत्रिका साहित्यम् के संपादक ० मो-९४१४४६१२०७
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बिना अल्पना चौखट सूनी याने मांडने की कला

राजस्थान हो या गुजरात। मालवा या निमाड़ या दक्षिण भारत लगभग हर घर में द्वार चौखट को पूजने की समृद्ध परंपरा है। त्योहार हो या कोई अन्य शुभ अवसर। घर की स्त्रियां आंगन और मुख्य द्वार पर अल्पना अवश्य अंकित करती हैं। दीपावली तो त्योहारों का त्योहार है। मां लक्ष्मी की अनुकम्पा कौन नहीं चाहता। लक्ष्मी आए घर-द्वार उसके स्वागत में अल्पना का अंकन आवश्यक हैं।
लोक संस्कृति की समृद्ध सांस्कृतिक विरासत का एक उज्जवल पक्ष है माण्डणा। वास्तव में माण्डणा कला-कलात्मक सौन्दर्य की सार्थक अभिव्यक्ति है। माण्डणे स्थान की शोभावृद्धि करते हैं। उमंग, उत्साह, उल्लास का सृजन भी करते है और वातावरण को रस से भर देते हैं।
उत्तर प्रदेश में ‘चौक पूरना’, बंगाल में अल्पना, बिहार में ‘एपन’, महाराष्ट्र का ‘रंगोल’, माण्डणों के ही विविध रूप हैं।
माण्डणों की प्राचीनता स्वयंसिद्ध हैं। वेदों-पुराणों में हवनों और यज्ञों में वेदी और आसपास की भूमि पर हल्दी, कुमकुम आदि से विभिन्न आकृतियां बनाई जाती थी। भगवान राम के अयोध्या आगमन पर अयोद्धवासियों में अपने घरों को माण्डणों से सजाया था। प्राचीन समय में घर-आंगन सजाने का एकमात्र साधन यही था। ग्रामीण अंचलों में आज भी इस विधा का बहुत महत्व है।
माण्डणे की तैयारी -ः चूंकि माण्डणा भूमिचित्र है इसलिए घर के प्रवेश द्वार के बाहर से लेकर अन्दर चौक और हर कमरे की भूमि को साफ लीप-पोत कर उस पर धान के दाने बिखेर कर माण्डणों की तैयारी की जाती है। जहां-जहां धान के दाने हैं उन स्थानों से होकर लक्ष्मी जी आएंगी ऐसी मान्यता है और उन स्थानों पर माण्डणे अवश्य मांडे जाते हैं। माण्डणों के लिए स्थान तय कर लेने के बाद रंगों और माण्डणों की डिजाइन का चयन किया जाता है। साधारणतया अल्पना के लिए कपडे़ की बारीक कुची बनाई जाती है। हाथ की अंगुलियों और अंगूठे की मदद से भी भांति-भांति के माण्डणे विभिन्न अवसरों के अनुरूप बनाए जाते हैं।
लाल गेरू से मुख्य आकृति बनाकर उसमें सफेद चूने (खड़िया) से रेखाएं भर कर माण्डणों को पूरा किया जाता है। माण्डणे की बाहरी भाग को भी कलात्मक सज्जा दी जाती है।
लक्ष्मी के पूजा-स्थल पर लक्ष्मी-पाटवा बनाया जाता है। उसके चारों और अन्य मंगलसूचक चिन्ह मांडे जाते हैं।
आजकल आधुनिक और पढ़ी लिखी महिलाएं भी तैल रंगों से भी माण्डणे बनाने लगी हैं, लेकिन फिर भी घर-आंगन में एकाध माण्डणा गेरू व खड़िया का अवश्य बनाया जाता हैं।
बचपन से ही कन्याओं को माण्डणे की कलाएं सिखा दी जाती हैं। भरा-पूरा परिवार, भरा-पूरा आंगन और भरे-पूरे माण्डणे मां लक्ष्मी को हर पल आमंत्रित करते रहते हैं। माण्डणे की कला हृदय की भावनाओं की सशक्त अभिव्यक्ति हैं।
दिवाली पर माण्डे जाने वाले माण्डणों पर किसी को पांव नहीं रखने दिया जाता है। इन्हें कभी मिटाया भी नहीं जाता। यह अपने आप लगाता र चलने से मिट जाते हैं।

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यशवन्त कोठारी
86, लक्ष्मीनगर, ब्रह्मपुरी बाहर
जयपुर - 302002

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