नाम: यशवन्त कोठारी जन्म: 3 मई, 1950, नाथद्वारा, राजस्थान शिक्षा: एम.एस.सी. -रसायन विज्ञान ‘राजस्थान विश्व विद्यालय’ प्रथम श्रेणी - 1971 जी.आर.ई., टोफेल 1976, आयुर्वेदरत्न प्रकाशन: लगभग 2000 लेख, निबन्ध, कहानियाँ, आवरण कथाएँ, धर्मयुग, साप्ताहिक हिन्दुस्तान, सारिका, नवभारत टाइम्स, हिन्दुस्तान, राजस्थान पत्रिका, भास्कर, नवज्योती, राष्ट्रदूत साप्ताहिक, अमर उजाला, नई दुनिया, स्वतंत्र भारत, मिलाप, ट्रिव्यून, मधुमती, स्वागत आदि में प्रकाशित/ आकाशवाणी / दूरदर्शन ...इन्टरनेट से प्रसारित । pocketfm .in पर ऑडियो बुक्स व् matrbharati पर बुक्स प्रकाशित पुस्तकें 1 - कुर्सी सूत्र (व्यंग्य-संकलन) श्री नाथजी प्रकाशन, जयपुर 1980 2 - पदार्थ विज्ञान परिचय (आयुर्वेद) पब्लिकेशन स्कीम, जयपुर 1980 3 - रसशास्त्र परिचय (आयुर्वेद) पब्लिकेशन स्कीम, जयपुर 1980 4 - ए टेक्सूट बुक आफ रसशास्त्र (मलयालम भाषा) केरल सरकार कार्यशाला 1981 5 - हिन्दी की आखिरी किताब (व्यंग्य-संकलन) -पंचशील प्रकाशन, जयपुर 1981 6 - यश का शिकंजा (व्यंग्य-संकलन) -प्रभात प्रकाशन, दिल्ली 1984 7 - अकाल और भेड़िये (व्यंग्य-संकलन) -श्रीनाथ जी प्रकाशन, जयपुर 1990 8 - नेहरू जी की कहानी (बाल-साहित्य) -श्रीनाथ जी प्रकाशन, जयपुर 1990 9 - नेहरू के विनोद (बाल-साहित्य) -श्रीनाथ जी प्रकाशन, जयपुर 1990 10 - राजधानी और राजनीति (व्यंग्य-संकलन) - श्रीनाथ जी प्रकाशन, जयपुर 1990 11 - मास्टर का मकान (व्यंग्य-संकलन) - रचना प्रकाशन, जयपुर 1996 12 - अमंगल में भी मंगल (बाल-साहित्य) - प्रभात प्रकाशन, दिल्ली 1996 13 - साँप हमारे मित्र (विज्ञान) प्रभात प्रकाशन, दिल्ली 1996 14 - भारत में स्वास्थ्य पत्रकारिता चौखम्भा संस्कृत प्रतिष्ठान, दिल्ली 1999 15 - सवेरे का सूरज (उपन्यास) पिंक सिटी प्रकाशन, जयपुर 1999 16 - दफ्तर में लंच - (व्यंग्य) हिन्दी बुक सेंटर, दिल्ली 2000 17 - खान-पान (स्वास्थ्य) - सुबोध बुक्स, दिल्ली 2001 18 - ज्ञान-विज्ञान (बाल-साहित्य) संजीव प्रकाशन, दिल्ली 2001 19 - महराणा प्रताप (जीवनी) पिंकसिटी प्रकाशन, जयपुर 2001 20 - प्रेरक प्रसंग (बाल-साहित्य) अविराम प्रकाशन, दिल्ली 2001 21 - ‘ठ’ से ठहाका (बाल-साहित्य) पिंकसिटी प्रकाशन, दिल्ली 2001 22 - आग की कहानी (बाल-साहित्य) - पिंकसिटी प्रकाशन, जयपुर 2004 23 - प्रकाश की कहानी (बाल-साहित्य) - पिंकसिटी प्रकाशन, जयपुर 2004 24 - हमारे जानवर (बाल-साहित्य) - पिंकसिटी प्रकाशन, जयपुर 2004 25 - प्राचीन हस्तशिल्प (बाल-साहित्य) - पिंकसिटी प्रकाशन, जयपुर 2004 26 - हमारी खेल परम्परा (बाल-साहित्य) - पिंकसिटी प्रकाशन, जयपुर 2004 27 - रेड क्रास की कहानी (बाल-साहित्य) - पिंकसिटी प्रकाशन, जयपुर 2004 28 - कब्ज से कैसे बचें (स्वास्थ्य) - सुबोध बुक्स, दिल्ली 2006 29 - नर्शो से कैसे बचें (बाल-साहित्य) सामयिक प्रकाशन, दिल्ली 2006 30 - मैं तो चला इक्कीसवीं सदी में - (व्यंग्य) सार्थक प्रकाशन, दिल्ली 2006 31 - फीचर आलेख संग्रह -सार्थक प्रकाशन, दिल्ली 2006 32 - नोटम नमामी (व्यंगय-संकलन) - प्रभात प्रकाशन 2008 33 - स्त्रीत्व का सवाल - (प्रेस) 34 - हमारी संस्कृति - वागंमय प्रकाशन-2009 35 -तीन लघु उपन्यास-सन्जय प्रकाशन-2009,अमेज़न पर भी 36 - योगासन और नेतासन नेशनल पब्लिशिंग हाउस.२०१२ दिल्ली 37-असत्यम अशिवम असुन्दरम-व्यंग्य उपन्यास-रचना प्रकाशन 2011 38 Introduction to Ayurveda- Chaukhamba Sansskrit Pratishthan, Delhi 1999 39 Angles and Triangles (Novel) –abook2read.com-london,रचना प्रकाशन जयपुर 40 Cultural Heritage of Shree Nathdwara bodhi prakashan ,jaipur-2017 सेमिनार - कांफ्रेस:--देश .विदेश में दस राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय सेमिनारों में आमंत्रित / भाग लिया राजस्थान साहित्य अकादमी की समितियों के सदस्य 1991-93, 1995-97 , ग्रामीण विकास मंत्रालय, भारत सरकार की राजभाषा समिति के सदस्य-2010-14 पुरस्कार सम्मान- 1. ‘मास्टर का मकान’ शीर्षक पुस्तक पर राजस्थान साहित्य अकादमी का 11,000 रू. का कन्हैयालाल सहल पुरस्कार -१९९९-२००० 2. साक्षरता पुरस्कार 1996 3. तीस से अधिक पी.एच.डी. /डी. लिट् शोध प्रबन्धों में विवरण -पुस्तकों की समीक्षा आदि सम्मिलित । राष्ट्रीय आयुर्वेद संस्थान, जयपुर में रसायन विज्ञान के एसोसिएट प्रोफेसर एवं जर्नल ऑफ आयुर्वेद तथा आयुर्वेद बुलेटिन के प्रबंध सम्पादक. पद से सेवा-निवृत्त। सम्पर्क: 86, लक्ष्मीनगर, ब्रह्मपुरी बाहर, जयपुर - 302002, राज. 09414461207 अमेरिका के १० विश्व्विद्ध्यालयों का भ्रमण दिस्म्बेर२०१३ से मई २०१४ विदेशों में हिंदी के पाठ्यक्रम पर चर्चा २०१७,२०१८, २०१९,२०२० में पद्मश्री हेतु नामित गृह मंत्रालय की साईट पर देखे विश्व कविता समारोह २०१७ में भाग लिया फेसबुक पर इ पत्रिका साहित्यम् के संपादक ०

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2 सप्ताह पहले

कभी रासलीला, कृप्णलीला और रामलीलाए होती थी, मगर समय बदला और पिछले दिनों शानदार, मालदार, चमकदार लिटफेस्टलीला देखने को मिली।टी वी ने इस लीला में चुम्बन दिखाये। अखबारों ने इस लीला में जाम छलकते दिखाये। गान्धीवादी राज्य सरकार ने गान्धीजी की पुण्यतिथि से कुछ दिनों पूर्व हुई इस लीला में शराब की नदी बहाने के लिए तीस लाख रुपये दिये। तन-मन-धन से पूरी सरकार इस लीला में मगरुर हो कर छा गई, ये बात अलग है कि सरकारी अकादमियों में लेखक-कलाकार मामूली पारिश्रमिक- पुरस्कार सहयोग राशि के लिए भी तड़प रहे है। आनन्द ही आनन्द ! कौन कहता है राजस्थान, पिछड़ा प्रदेश है, बीमारु राज्य है रेडलाइट से लेकर रेडवाइन, वोदका, व्हिस्की, बीयर, पानी की तरह बह रही है। गीतो के घाट पर शराब की नदिया बही,कुछ ने केवल आचमन किया। कुछ ने खूब पी और मटके भरकर घर पर भी ले गये। कौन जानता है कि इस कार्यक्रम के असली प्रायोजको के तार कामन वेल्थ गेम्स तक जूडे हुए है। हिन्दी राजस्थानी के नाम से कुछ लेखक बुलाये गये। एक भूतपूर्व कवि-नौकरशाह अपने ठसके से हर जगह पहुच जाते है। हास्यस्पद रस के एक कवि ने एक नेता की कविताओं का ऐसा अनुवाद सुनाया कि कविता शरमा गई।

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2 सप्ताह पहले

कभी रासलीला, कृप्णलीला और रामलीलाए होती थी, मगर समय बदला और पिछले दिनों शानदार, मालदार, चमकदार लिटफेस्टलीला देखने को मिली।टी वी ने इस लीला में चुम्बन दिखाये। अखबारों ने इस लीला में जाम छलकते दिखाये। गान्धीवादी राज्य सरकार ने गान्धीजी की पुण्यतिथि से कुछ दिनों पूर्व हुई इस लीला में शराब की नदी बहाने के लिए तीस लाख रुपये दिये। तन-मन-धन से पूरी सरकार इस लीला में मगरुर हो कर छा गई, ये बात अलग है कि सरकारी अकादमियों में लेखक-कलाकार मामूली पारिश्रमिक- पुरस्कार सहयोग राशि के लिए भी तड़प रहे है। आनन्द ही आनन्द ! कौन कहता है राजस्थान, पिछड़ा प्रदेश है, बीमारु राज्य है रेडलाइट से लेकर रेडवाइन, वोदका, व्हिस्की, बीयर, पानी की तरह बह रही है। गीतो के घाट पर शराब की नदिया बही,कुछ ने केवल आचमन किया। कुछ ने खूब पी और मटके भरकर घर पर भी ले गये। कौन जानता है कि इस कार्यक्रम के असली प्रायोजको के तार कामन वेल्थ गेम्स तक जूडे हुए है। हिन्दी राजस्थानी के नाम से कुछ लेखक बुलाये गये। एक भूतपूर्व कवि-नौकरशाह अपने ठसके से हर जगह पहुच जाते है। हास्यस्पद रस के एक कवि ने एक नेता की कविताओं का ऐसा अनुवाद सुनाया कि कविता शरमा गई।

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4 महीना पहले

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Journey of Ram and other stories: ---- (----------------)
A coolection of works of yashwant kothari -noted writer from India .the bok contains abrief story of valmiki ramayan ,followed by anovel anf other short stories.

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4 महीना पहले

आरोग्य के देवता भगवान धन्वंतरि

यशवन्त कोठारी

दीपावली से दो दिन पूर्व के दिन को हम सभी धन तेरस के रूप में मनाते हैं । इसी दिन आरोग्य, स्वास्थ्य के देवता भगवान धन्वंतरि का भी जन्म हुआ था । भगवान धन्वंतरि आयुर्वेद शास्त्र के प्रणेता भी थे । आयुर्वेद जीवन विज्ञान है धन्वंतरि त्रयोदशी को स्वास्थ्य दिवस के रूप में भी मनाया जाता है । वैसे भी स्वास्थ्य धन सब धनों से श्रेष्ठ है, अस्वस्थ जीवन तो मृत्यु से भी बदतर है । आइये, स्वास्थ्य - लक्ष्मी की पूजा करें ।
श्रीमद्भागवत के अनुसार धन्वंतरि का जन्म पुरुरवा के वंश में हुआ था । यही चंद्रवंश था ।
हरिवंश पुराण के अनुसार धन्वंतरि का आविर्भाव समुद्र मंथन से हुआ । पौराणिक मान्यताओं के अनुसार धन्वंतरि भगवान विष्णु के अवतार थे । वे अमृत-कलश लेकर अवतीर्ण हुए थे । कथा के अनुसार देवों और दानवों ने मिलकर समुद्र मंथन किया । इस समुद्र मंथन से चंद्रमा, लक्ष्मी, सुरा, उच्चैश्रवा (घोड़ा), ऐरावत (हाथी), कौस्तुभ मणि, कामधेनु, कल्पवृक्ष, अप्सराएं और विष सबसे पहले निकला जिसे दानवों ने लेने से इंकार कर दिया लेकिन समुद्र लक्ष्मी और अमृत पर अपना अधिकार जमाने के लिए असुरों ने देवताओं पर आक्रमण कर दिया । इधर धन्वंतरि ने देवताओं को अमृत देकर अमर कर दिया ।
सुश्रुत संहिता मंे भी धन्वंतरि को अमृत का जनक बताया गया है । अमृत बनाने की कला कालांतर में केवल धन्वंतरि के पास रह गयी । वास्तव में भगवान धन्वंतरि ने ही आगे चलकर आरोग्य, स्वास्थ्य और वायु के वेद ‘आयुर्वेद’ को बनाया ताकि पूरी मानव जाति निरोग रह सके और स्वास्थ्य से भरपूर जीवन जी सके । धन्वंतरि केवल मानव चिकित्सा विज्ञान के ज्ञाता ही नही थे, वरन् अन्य विषयों के भी ज्ञाता थे । उन्होंने घोड़ों के लिए शालिहोत्र शास्त्र, पेड़-पौधों के लिए वृक्षायुर्वेद तथा हाथियों के लिए पालकाप्य शास्त्र, पक्षियों के लिए शकुनि विज्ञान आदि शास्त्रों का प्रणयन किया ।
एक अन्य मान्यता के अनुसार धनवंतरि का कार्य क्षेत्र काशी रहा । उन्हें कई ग्रंथों में काशीराज भी कहा गया है । चूँकि धन्वंतरि को विष्णु का अवतार माना गया है, इसलिए लक्ष्मी उनकी सहज अनुगामिनी रही । धन्वंतरि वीर, विद्वान तथा प्राणाचार्य चिकित्सक थे ।
आयुर्वेद की वैज्ञानिक प्राण प्रतिष्ठा करने में भगवान धन्वंतरि का योगदान अभूतपूर्व है । धन्वंतरि रचित ‘धन्वंतरि संहिता’ अब अप्राप्य है । मगर संपूर्ण आयुर्वेद वाड.ग्मय इसी संहिता पर आधारित है ।
धन्वंतरि के अनुसार मृत्यु 101 प्रकार की है इनमें से एक केवल एक मृत्यु ही काल मृत्यु है, बाकी सब अकाल मृत्यु हैं । इन अकाल मृत्युओं का रोकने का प्रयास ही चिकित्सा है । धन्वंतरि के अनुसार परमार्थ के लिए आयुर्वेद से बढ़कर अन्य कोई साधन नही है ।

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4 महीना पहले

तिजोरी पर चर्चा
यशवंत कोठारी

दीपावली के अवसर पर सभी चर्चाएं बिना तिजोरी की चर्चा के अधूरी है तथा धन के देवता कुबेर ने भी धन को तिजोरी में ही रखा होगा। सरकारी खजाना हो या व्यक्तिगत धन तिजोरी में ही रखा जाता है तथा रखा जाना चाहिए।
पुराने समय में भी धन को लोहे या लकड़ी की तिजोरी में ही रखा जाता या घर के अन्दर तहखाने में या एक विशेप कमरे में एक लोहे या लकड़ी की मजबूत पेटी रखी रहती है, जिसमे नकदी, सोना, चांदी तथा अन्य मूल्यवान वस्तुओं को सुरक्षित रखा जाता है। इसी प्रकार व्यावसायिक प्रतिप्ठानों, दुकानों आदि में धन को तिजोरी या गल्ले में रखने की परम्परा है। तिजोरी मजबूत लोहे की बनी होती है, गुल्लक या गल्ला लकड़ी या चदर की बनी पेटी होती है। आजकल लोहे की अलमारियों में ही एक खण्ड को तिजोरी का रुप दिया जाता है।
व्यापारिक वर्ग इसी गल्लेया तिजोरी पर गणेश तथा लक्ष्मी के चित्र बनाकर पूजा करते है।

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दीपावली क्या आई। छोटे बड़े सभी व्यस्त हो गये। आजकल एक नई संस्कृति का विकास हो रहा है, जिसके अन्तर्गत दिवाली पर महंगे उपहारों का लेन देन हो रहा है। उपहार-संस्कृति का विकास अपनी आर्थिक हैसियत के आधार पर तय हो रहा है। गरीब को कोई उपहार नहीं देता मगर जिसके पास पहले से ही काफी है उसी के पास उपहारों का जखीरा जा रहा है, गरीब बच्चों को आतिशबाजी के लिए कोई पटाखे नहीं देता, मगर सम्पन्न वर्ग एक दूसरे को उपहारों से लाद देते हैं, क्योकि वे काम के आदमी हैं। बड़े आदमी हैं, उनको उपहार देने से आज नही ंतो कल फायदा पहुंचेगा। कुछ न कुछ लाभ अवश्य मिलेगा। गये वे दिन जब उपहारों के साथ भावनाएं, संवेदनाएं जुड़ी होती थी, लोग एक दूसरे को उपहार देकर खुश होते थे। अब उपहार विनिमय चाहता है, मैंने मिठाई दी, तुम भी मिठाई दो या प्रमोशन दो या आर्थिक लाभ दो। नहीं दे सकते तो फिर तुम्हें उपहार देने का फायदा क्या ? और चूंकि अधिकांश गरीब, बेसहारा लोग कुछ नहीं दे सकते उन्हें कोई उपहार भी नहीं देता। मिठाई, मेवे के पैकेटस,सूटलेन्थ, मंहगे पैन, कलेण्डर, डायरियां, घड़ियां, जूते, आभूपण और नकदी तक। एक किलो मिठाई के डिब्बे मे दस हजार का गिफ्ट चैक रख कर दे आइये, कैसे नहीं होगाआपका प्रमोशन या साली का स्थानान्तरण या बैंक से ऋण। यह कैसी संस्कृति का विकास हो रहा है। हमने एक सीधी सादी सांस्कृतिक परम्परा के खोल में रिश्वत, कमीशन का नया काम शुरु कर दिया है।

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दीपावली क्या आई। छोटे बड़े सभी व्यस्त हो गये। आजकल एक नई संस्कृति का विकास हो रहा है, जिसके अन्तर्गत दिवाली पर महंगे उपहारों का लेन देन हो रहा है। उपहार-संस्कृति का विकास अपनी आर्थिक हैसियत के आधार पर तय हो रहा है। गरीब को कोई उपहार नहीं देता मगर जिसके पास पहले से ही काफी है उसी के पास उपहारों का जखीरा जा रहा है, गरीब बच्चों को आतिशबाजी के लिए कोई पटाखे नहीं देता, मगर सम्पन्न वर्ग एक दूसरे को उपहारों से लाद देते हैं, क्योकि वे काम के आदमी हैं। बड़े आदमी हैं, उनको उपहार देने से आज नही ंतो कल फायदा पहुंचेगा। कुछ न कुछ लाभ अवश्य मिलेगा। गये वे दिन जब उपहारों के साथ भावनाएं, संवेदनाएं जुड़ी होती थी, लोग एक दूसरे को उपहार देकर खुश होते थे। अब उपहार विनिमय चाहता है, मैंने मिठाई दी, तुम भी मिठाई दो या प्रमोशन दो या आर्थिक लाभ दो। नहीं दे सकते तो फिर तुम्हें उपहार देने का फायदा क्या ? और चूंकि अधिकांश गरीब, बेसहारा लोग कुछ नहीं दे सकते उन्हें कोई उपहार भी नहीं देता। मिठाई, मेवे के पैकेटस,सूटलेन्थ, मंहगे पैन, कलेण्डर, डायरियां, घड़ियां, जूते, आभूपण और नकदी तक। एक किलो मिठाई के डिब्बे मे दस हजार का गिफ्ट चैक रख कर दे आइये, कैसे नहीं होगाआपका प्रमोशन या साली का स्थानान्तरण या बैंक से ऋण। यह कैसी संस्कृति का विकास हो रहा है। हमने एक सीधी सादी सांस्कृतिक परम्परा के खोल में रिश्वत, कमीशन का नया काम शुरु कर दिया है।

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4 महीना पहले

मां निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम्" ||
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धरती को प्रणाम ,आकाश को प्रणाम,सूर्य को प्रणाम,चाँद तारों को प्रणाम,नदियों को प्रणाम,अग्नि को प्रणाम , ब्रह्माण्ड को प्रणाम, दसों दिशाओं को प्रणाम,आदि कवि वाल्मीकि को प्रणाम,आदि आशु लेखक गणेश को प्रणाम,साहित्य कला के ईश्वर शिव को प्रणाम .

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4 महीना पहले

लक्ष्मी के प्रकार
यशवन्त कोठारी
शास्त्रों में लक्ष्मी का बड़ा महत्व है, और जीवन में गृहलक्ष्मी का। इन दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय। वैसे लक्ष्मी को श्री, पदमा, कमला, नारायणी, तेजोमयी, देवी आदि अनेकों नामों से जाना गया है। और कालान्तर में ये सभी नाम गृहलक्ष्मियों को सुशेभित करने लगे।
शास्त्रों के अनुसार लक्ष्मीजी क्षीरसागर नरेश विष्णुजी की पत्नी है और एक वरिष्ठ कवि के अनुसार पुरूष पुरातन की वधु क्यों न चंचला होय। मगर यह उक्ति गृहलक्ष्मियों पर ठीक नहीं उतरती क्योंकि भारतीय परिवेश में गृहलक्ष्मी डोली में बैठ कर आती है और अर्थी पर जाती है ।

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