समाज में दिखाई देने वाली विसंगतियों पर मन में उपजे भावो को शब्दों के रूप में ढालने का शौक कब लेखन में बदल गया, पता ही नही लगा ...... वर्तमान में फेस बुक के विभिन्न समूहो, विशेषकर नया लेखन नए दस्तखत लघुकथा - गागर में सागर और वेब साइट्स ओपन बुक्स ऑन लाइन पत्रिका रचनकार हस्ताक्षर प्रितिलिपि आदि पर लेखन। वेब पत्रिका जय विजय प्रयास सेतु अनुक्रमणिका और अनहद कृति में समय समय पर रचनायें शामिल। कई हिंदी संकलनों का हिस्सा बनने के अतिरिक्त साहित्यिक पत्रिकाओं में प्रकाशन...........

VIRENDER VEER MEHTA मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया English सुविचार
1 महीना पहले

#DOCTORS_DAY . . . JULY 1st

"It is certainly not easy to be a doctor because. . . YOU HAVE TO THINK OF YOUR PATIENTS BEFORE YOURSELF.

HAPPY DOCTOR"S DAY to all of you... doctors (n specislly in my freinds list)

🩸 🩺🌹🩺 🩸

// VEER //

VIRENDER VEER MEHTA मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी विचार
2 महीना पहले

इसे जानना बहुत जरूरी है. . .

World Refugee Day विश्व शरणार्थी दिवस ?

हालांकि 'रिफ्यूजी' शब्द कोई नया नहीं है लेकिन 'रिफ्यूजी डे' शब्द अभी भी विश्व के कई देशों के लिए पूरी तरह परिचित नहीं है, जबकि रिफ्यूजी यानी शरणार्थी लोगों की समस्या पूरे विश्व में किसी न किसी रूप में व्याप्त है।

शरणार्थी शब्द मुख्य रूप से उन लोगों के लिए परिभाषित किया गया है, जिन्हें जाति, धर्म या किसी विशेष विचारधारा के चलते सामाजिक या राजनीतिक रूप से समूह में उत्पीड़न के भय से अपने घर, स्थान या देश को छोड़ना पड़ा हो।
इसी अवधारणा को लेकर सयुंक्त राष्ट्र के शरणार्थी सम्मलेन 1951में विचार किया गया और दिसंबर 2000 में 20 जून को 'विश्व शरणार्थी दिवस' मनाने का आह्वान किया गया।
तब से कमोबेश पूरे विश्व में आज ही के दिन मनाए जाने वाले विश्व शरणार्थी दिवस के अंतर्गत इनके संदर्भ में बनाई गई संस्थाओं द्वारा (जिनमें एक सयुंक्त राष्ट्र द्वारा बनाई गई UNHCR यानी United Nations High Commissioner for Refugees भी है) विश्व भर के शरणार्थियों के सहयोग के लिए कार्य किया जाता है।
इस संस्था द्वारा प्रतिपादित नियमों के अनुसार किसी शरणार्थी को उस देश में वापस नहीं भेजा जाना चाहिए,जहां उसकी सुरक्षा और स्वतंत्रता को खतरा है, हालांकि कोई भी वह शरणार्थी इस अधिकार की मांग नहीं जर सकता जिसे किसी अपराध का दोषी या देश की सुरक्षा के लिए खतरा माना गया हो।

शरणार्थी दिवस को यदि हमारे देश के संदर्भ में देखा जाए तो भारत 1951 रिफ्यूजी कन्वेंशन का हस्ताक्षरकर्ता नहीं है, इसलिए इसके नियम और सिद्धांत किसी भी रुप में भारत में लागू नहीं होते।
भारत में शरणार्थियों को केवल वैध और अवैध प्रवासियों के रूप में वर्गीकृत किया गया है।
1955 में पारित भारतीय राष्ट्रीयता कानून, नागरिकता अधिनियम (भारत के संविधान के अनुच्छेद 5 से 11) के अंतर्गत नागरिकों का एक राष्ट्रीय रजिस्टर (NRC) बनाया गया था जिसे 1986, 1992, 2003, 2005, 2015 और अंतिम बार 2019 में संशोधन किया गया था।
पिछले 72 वर्षों में (2019 तक) भारत में केवल तिब्बत और श्रीलंका के कानूनी अप्रवासियों को मान्यता दी गई, लेकिन 12 दिसंबर 2019 को संसद से नागरिकता संशोधन विधेयक पारित (citizenship amendment bill) होने के बाद 31 दिसंबर 2014 से पहले, भारत के पड़ोसी देश अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आये हिन्दू, जैन, पार्सिस, क्रिस्चियन, सिख और बुद्धिस्ट जैसे उत्पीड़त अल्पसंख्यक समुदायों के प्रवासी लोग भी भारतीय नागरिकता के पात्र होंगे। यहां यह बात बहुत ग़ौरतलब है कि इसमें मुस्लिम समाज, को जो इन देशों में बहुसंख्यक हैं को इस कानून से बाहर रखा गया है।
अतः शरणार्थी दिवस की उपयोगिता समझने के साथ-साथ भारत में इस पर की जानी वाली राजनीति को समझना भी बहुत जरूरी है।

// वीर //

(रिकॉर्ड और तिथियां गूगल से साभार)

और पढ़े

#होलिका_दहन

जल जाती है होलिका अभिमान के रूप में,
बच जाते हैं प्रह्लाद एक आस्था के रूप में।

धार्मिक दृष्टि से आस्था व पवित्रता के महापर्व
होलीका दहन की बहुत बहुत शुभकामनाएं. . .!

🌾🌴☘️ सुप्रभात ☘️🌴🌾
🙏🏻

और पढ़े
VIRENDER VEER MEHTA मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी शायरी
6 महीना पहले

#LoveGuru


#LoveGuru

"आँखों की भाषा" उनकी, हम कभी पढ़ नहीं पाए।
इसीलिए, #मोहब्बत में आगे कभी बढ़ नहीं पाए।।
दिनों से महीनों, महीनों से सालों में बदल गए दिन।
इंतहा हो गई न भुल पाए हम न लौटकर वो आए।।

:¨·.·¨:
`·. .🌷 .⋆*ೄ.•*¨*•.🌸🌿🌸.⋆*ೄ.•*¨*•.

// वीर //

और पढ़े
VIRENDER VEER MEHTA मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी विचार
6 महीना पहले

आज 30 जनवरी है. . .
इतिहास में दर्ज है, आज ही के दिन आज़ाद भारत में एक विरोधी 'नाथू राम गोड़से' ने महात्मा गांधी की गोली मारकर हत्या कर दी थी।

यह इतिहास का सच है और इससे इंकार नहीं किया जा सकता, भले ही इसके पीछे बहुत से कारण रहे हों। देश में अब दो विचारधाराएं समांतर रूप से चल रही हैं। कौन कितना ग़लत था और कौन कितना सही था इस बात का निर्णय पूर्ण रूप कर पाना एक टेढ़ा प्रश्न बन गया है। हालांकि किसी भी हत्या को किसी भी सभ्य समाज में किसी भी तर्क से उचित नहीं ठहराया जा सकता लेकिन 'गांधी और गोडसे' ये सिर्फ दो नाम नही बल्कि दो अलग-अलग विचार बनते जा रहे हैं। गांधी विचारधारा को नकार पाना बहुत कठिज है और इसके सम्मुख 'गोडसे विचाधारा' को भी दबा पाना सहज नहीं है।
अतः आज का सत्य यही है कि इसका निर्णय तो अब व्यक्तिगत ही हो जाना चाहिए कि कौन व्याक्ति किसके विचारों के साथ है ?
लेकिन. . .
अंततः इस समर्थन-विरोध को किसी भी हालत में एक नए युद्ध का ज़रिया तो नहीं बनने देना चाहिए।

/वीर/

और पढ़े
VIRENDER VEER MEHTA मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी विचार
6 महीना पहले

#RepublicDay

किसी भी देश की स्वतंत्रता उस देश लिए एक बड़ी उपलब्धि होती है और इस उपलब्धि को पूर्णता मिलती है, उस देश द्वारा स्वयं के बनाए संविधान को लागू करने के बाद। भारत में यह महत्वपूर्ण दिन 26 जनवरी 1950 को आया था, जब हम एक गणतंत्र देश के वासी कहलाए। तब से हम भारतवासी इस दिन को गणतंत्र दिवस के रुप में मनाते आ रहे हैं।
हर वर्ष इस उत्सव का उत्साह चरम पर होता है। लेकिन क्या कभी हमने सोचा है कि हम इस 'गणतंत्र' को सही रूप से कितना जी पाए हैं? ये एक बहुत बड़ा प्रश्न है।
गणतंत्र अर्थात 'अपना तंत्र', यानि कि एक ऐसी व्यवस्था जिसके अन्तर्गत देशवासियों के हित में समुचित विकास और कल्याण के कार्य किए जा सकें। या सरल शब्दों में कहें; जनता द्वारा नियंत्रित, जनता पर किया गया शासन। और वस्तुतः इसके अर्थ रूप में, निश्चित तौर पर राजनीतिक नज़रिए से हम गणतंत्र को सफलतापूर्वक जी रहे हैं। लेकिन सामाजिक स्तर पर हम भारतीय गणतंत्र को जी नहीं रहे बल्कि ढो रहे हैं। बात थोड़ी कठोर है, लेकिन सत्य है।
गणतंत्र का उत्सव सहभागिता का उत्सव है। किसी भी देश की सफलता का दारोमदार जिन दो बिंदुओं पर निर्भर होता है, वह है अधिकारों और कर्तव्यों की समान रूप से भागीदारी। जहां तक अधिकार की बात करें तो सरकारी उपक्रमों के माध्यम से इस क्षेत्र के लिए यथा संभव प्रयास किए ही जाते हैं, लेकिन यदि बात कर्तव्यों की करें तो शायद देश के एक बड़े भाग में उदासीनता का माहौल ही मिलेगा।
संविधान में मौलिक कर्तव्‍यों के तहत संविधान स्पष्ट रूप से अधिकारों के साथ नागरिकों को कर्तव्यों का पालन करने का भी आदेश देता है। लेकिन यदि हम आसपास देखें, तो एक अजीब सी अनुभूति होती है कि हम भारतवासी वास्तव में क्या कर रहे हैं? अधिकारों के लिए आए दिन झंडा लेकर खड़े होने वाले 'हम लोग' क्या कभी कर्तव्यों के बारे में विचार करते हैं. . . शायद नहीं।
यदि देखा जाए तो इस वस्तुस्थिति के मूल में जो कारण सर्वाधिक अहम है, वह है अशिक्षित समाज और हमारी असंगत शिक्षा प्रणाली। देश में आज भी शिक्षा की कमी एक बड़ी समस्या है। और जिन क्षेत्रों में शिक्षा का विस्तार हुआ भी है, वहां भी यह केवल क़िताबी ज्ञान और आजीविका का स्त्रौत बन कर रह गया है। जब तक राष्ट्र के हर घर तक एक सार्थक शिक्षा का उजाला नहीं पहुँचेगा। हम वास्तविक लोकतंत्र की सफलता से दूर ही रहेंगें। भले ही इसके लिए सरकारी प्रयास चलते रहते है लेकिन हम शिक्षित लोग चाहें तो व्यक्तिगत स्तर पर भी काफी कुछ कर सकते हैं। हम व्यवस्था की अनदेखी नहीं कर सकते। व्यवस्था में लगातार सुधार की गुंजाईश है। और यदि हमें अपने देश की वास्तविक प्रगति चाहिए तो हमें इन कर्तव्यों के प्रति जागरूक रहने के साथ देश के राष्ट्रीय चरित्र के प्रति भी सजग होना ही पड़ेगा। शायद तभी, इस गणतंत्र उत्सव की सही मायनो में सार्थकता मिलेगी और सहभागिता के इस उत्सव को हम एक सफल ढंग से मना पाएंगें।
// वीर //

और पढ़े

#नेताजी__जयंती
वर्ल्ड वार का दौर था वह।
नेता जी सुभाष चन्द्र बोस, जब पहली बार 'हिटलर' से मिलने जर्मनी गये, तो उन्हें विश्रामालय में बैठाया गया। प्रतीक्षा करने के साथ वह पढ़ने में व्यस्त हो गये।
यह वह समय था जब किसी भी आने वाले से, सतर्कतावश कई जर्मन आफिसर हिटलर बनकर आने वाले से मिला करते थे। लिहाजा थोड़ी-थोड़ी देर बात, जर्मन आफिसर हिटलर बन के नेता जी से मिलने आता और नेताजी उन्हें, ... "हिटलर साहब को भेजिये।" कहकर फिर पढ़ने में व्यस्त हो जाते। अंततः एक जर्मन आफिसर आया और आकर नेताजी के कंधे पर हाथ रखकर बोला। "नेताजी!"
और नेता जी "हिटलर साहब!" बोल कर खड़े हो गए।
हिटलर आश्चर्यचकित हो गए और उन्होंने पूछा, "आप को पता कैसे चला कि मै ही हिटलर हूँ।"

नेता जी का जवाब था। "जिसके नाम से सारे अंग्रेज कांपते हो, उसके कंधे पर हाथ 'हिटलर' ही रख सकता है।

ऐसे थे नेता जी।

जय हिंद 🇮🇳

सादर नमन:
💐💐

// वीर //

और पढ़े
VIRENDER VEER MEHTA मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी सुविचार
7 महीना पहले

आशा एक सुंदर सपना ही नहीं
बल्कि भविष्य में
साकार होने वाली सत्य की
परछाई है, इसलिए आशा का दामन न छोड़ें. . . !
‼️🌷 शुभ प्रभात 🌷‼️
☘️__ 🙏🙏 __ ☘️

और पढ़े
VIRENDER VEER MEHTA मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी सुविचार
7 महीना पहले

🚩⚜️ 🕉️⚜️🚩

क्या जानते हैं आप. . .
भारतीय पंचांग प्रणाली में प्रत्येक वर्ष मध्य अप्रैल से शुरू होता है और उसका एक विशिष्ट नाम होता है।

प्रति 60 वर्षों को कहते हैं #संवत्सर , और प्रत्येक नाम 60 साल बाद फिर से आता है।

वर्ष 2019-20 का नाम #विकारी रखा गया, जो एक बीमारी वर्ष बनकर अपने नाम पर खरा उतरा।

वर्ष 2020-21 का नाम #शर्वरी रखा गया, जिसका अर्थ है 'अंधेरा'।

और अब #प्लावा वर्ष 2021-22 प्रारंभ हो रहा है। जिसका अर्थ है, 'पार करा देने वाला'। 'वराह संहिता' के अनुसार आता समय दुनिया को असहनीय कठिनाइयों के पार ले जाएगा। अगले वर्ष 2022-23 का नाम #शुभकृत रखा गया है, जिसका अर्थ है 'शुभता पैदा करने वाला। करता है।

_/\_ . . .

/ वीर /

और पढ़े
VIRENDER VEER MEHTA मातृभारती सत्यापित कोट्स पर पोस्ट किया गया हिंदी सुविचार
7 महीना पहले

√ क्रिसमस
√ तुलसी_पूजन,
√ अटलजी, मालवीय जी का जन्म दिवस,
√ भारतीय मेट्रो की शुरुआत,
√ ग्रेट 'चार्ली' का निधन. . . . या फिर

√ 'गुरु गोविंदजी' के बच्चों का बलिदान दिवस. . . 😢

जैसे चाहे 'फील' करें आज का दिन।
पर बेहतर होगा, बिना किसी बहस के मनाया जाए #पच्चीस_दिसंबर के दिन; क्योंकि भारत में हर 'भारतीय' के लिये जगह है।

/ वीर /

और पढ़े