तुम दो कदम, दो साथ अगर
आसान हो जाये सफ़र
छोड़ो भी ये, दुनिया का डर
तोड़ो न दिल यूँ, इनकार से
देखो कभी तो, प्यार से ...
डरते हो क्यूँ, इक़रार से
माना हो तुम, बेहद हंसीं
ऐसे बुरे, हम भी नहीं

और पढ़े

वहाँ जहाँ तू ही मेरा लिबास है
वहाँ जहां तेरी ही बस तलाश है
वहाँ जहां तुझी पे ख़तम आस है
वहीं शुरू वहीँ पे दफ़न जान है

और पढ़े

चिंतन सारे कर गए हाँ चिंता के मारे
मन की बातें मन में रही न समझे ना सारे
समझो समझो सब करे यह घर बाहर वाले
अंदर गर जो कर
गयो हो
उसको न जाने
चंचल मन अति रैंडम
दे गयो धोखा मचल गयो रे

और पढ़े

कोई नहीं तेरे सिवा मेरा यहाँ
मंज़िलें हैं मेरी तो सब यहाँ
मिटा दे सभी आजा फ़ासले
मैं चाहूँ मुझे मुझसे बाँट ले
ज़रा सा मुझ में तू झाँक ले
मैं हूँ क्या

और पढ़े

तु जिस्मानी चाहता हैं
मैं रूहानी चाहती हूं
तु onliner जैसा प्यार हैं
मैं पूरी कहानी चाहती हूं...
तु बदन पे दाग देके खुश होता हैं
मैं जनम भर की निशानी चाहती हूं
तु जिस्मानी चाहता हैं
मैं रूहानी चाहती हूं...
तु धोखा चाहता हैं
मैं मौक़ा चाहती हूं
तुझे बड़े होने की चाहत हैं...
मैं नादानी चाहती हूं...
तु जिस्मानी चाहता हैं
मैं रूहानी चाहती हूं

और पढ़े

उनसे नज़र मिली बिच बाजार में
दिल गया लूट नज़रो की तकरार में
मुड़ मुड़ के वह देखे मुझे
जैसे की वह खुद भी मचल गए

जो कदम कदम चलूँ तुझे ही
तय करूँ मैं
साँसें बनकर तुझे ओढ़ लूं
तू ख्याल सा मिला है जिसको
गिन सकूँ मैं
आदतों में तुझे जोड़ लूं
तुझसे रौशन,रातें सारी तुझपे ही ख़तम बातें सारी
ख़ामोशियाँ रखती हैं अपनी भी एक जुबां
ख़ामोशी को चुपके से
सब कह जाने दो

और पढ़े

इतनी खताएं तू लेकर चला है दौलत ही जैसे तेरा अब खुदा
हर पल बिताये तू जैसे हवा है गुनाह के साये में
चलता रहा
समंदर सा बहकर तू चलता ही गया
तेरी मर्ज़ी पूरी की तूने हां हर दफा
तू ही तेरा मुजरिम बंदेया

और पढ़े

क्यूँ निगाहें निगाहों को शिक़वे सुनाए
मुर्दा अफ़सुर्दा लफ़्ज़ों की मानी जगाये
जो है खुद से शिकायत क्यूँ तुझको बताये
क्यों हम यादों के रंगों से ख्वाबों को सजाये
ये कैसी बात बढ़ रही है तेरे मेरे दरमियान
ये कैसी बात जग रही है तेरे मेरे दरमियान
क्यूँ सुबह खिल रही है तेरे मेरे दरमियान
क्यूँ शाम ढल रही है तेरे मेरे दरमियान

और पढ़े

आइये बंद करलें दरवाजे,
रात सपने चुरा ना
ले जाए
कोई झोंका हवा का आवारा,
दिल की बातों को उड़ा
ना ले जाये
और आहिस्ता कीजिये बातें,धड़कने कोई सुन रहा होगा
लफ्ज़ गिरने ना पाए होठों से,वक़्त के हाथ इनको चुन लेंगे
कान रखते हैं ये दरो-दीवार,राज़ की सारी बात सुन लेंगे

और पढ़े